<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763</id><updated>2012-01-16T06:10:02.849+05:30</updated><title type='text'>मंजरी</title><subtitle type='html'>मत पूछो मतलब...</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>39</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-6252400869400557945</id><published>2011-12-09T11:32:00.000+05:30</published><updated>2011-12-09T11:32:03.053+05:30</updated><title type='text'>'फिलहाल' छुट्टी वाले दिन की हकीकत!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: solid windowtext 1.0pt; border: none; mso-border-bottom-alt: solid windowtext .75pt; mso-element: para-border-div; padding: 0cm 0cm 1.0pt 0cm;"&gt;  &lt;div class="MsoNormal" style="border: none; mso-border-bottom-alt: solid windowtext .75pt; mso-padding-alt: 0cm 0cm 1.0pt 0cm; padding: 0cm;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 10.0pt; line-height: 115%; mso-ansi-font-size: 11.0pt; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;"&gt;&lt;b&gt;ये जो हफ्ते &lt;/b&gt;में एक दिन की छुट्टी मिलती है उसके फायदे कम घाटा ज्यादा है। आपके लिए तो मैं बिल्कुल ही नहीं कह रहा ये सिर्फ मैं अपने बारे में कह रहा हूं। महीने में 4-5 साप्ताहिक छुट्टियां मिलती हैं। पहला हफ्ता वाला तो मान लीजिए कभी बैंक तो कभी बिजली बिल या दिस दैट करके बारह एक बजे तक का टाइम निकल जाता है। यहां के बाद अब शुरू होती है समय बीताने के रास्ते खोजने की परीक्षा। अभी फिलहाल तीन-चार दोस्त हैं जिनके साथ होने पर छुट्टी का मतलब छुट्टी हो पाता है। लेकिन ये भी कब महीने की पहली छुट्टी के दिन । वो भी दोपहर बाद। किसी तरह से खा-पीकर, कुछ खरीदारी करके, सिनेमा देखकर टाइम निकाल लिया। लेकिन फिर छे दिन बाद सब कुछ ठीक रहने पर छुट्टी का दिन आ धमकता है। अब क्या... न बिजली बिल बचा...न किराया का...राशन और सब्जी तो समझिए रोज टाइप आइटम है । उसका तो साप्ताहिक मामलों से कोई लेना देना ही नहीं । अब ऐसा भी नहीं कि छुट्टी का दिन है तो ज्यादा देर तक सोते रहिए। नींद तो अपने टाइम पर ही खुलेगी । दफ्तर के दिन हड़बड़ी में सब कुछ करके निकल जाना पड़ता है लेकिन छुट्टी है तो इत्मीनान से करते रहिए...टाइम भी धीरे धीरे बीतता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="border: none; mso-border-bottom-alt: solid windowtext .75pt; mso-padding-alt: 0cm 0cm 1.0pt 0cm; padding: 0cm;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 10.0pt; line-height: 115%; mso-ansi-font-size: 11.0pt; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;"&gt;&amp;nbsp;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red;"&gt;&lt;b&gt;अब आइए&lt;/b&gt;&lt;/span&gt; बुनियादी मुद्दे पर। चूंकी दिल्ली में दोस्त हो गए हैं कम। जो थे पुराने साथी-सहपाठी सबकी अपनी टाइमिंग है। सबकी अपनी गृहस्थी है। सो उधर से हाथ निकल गया। बचे अब तीन-चार करीबी वाले। अब छुट्टी असल में यही खलती है । अब चूंकि ज्यादा लोगों के साथ तो उठना-बैठना है नहीं.. जो लोग होते हैं साथ में उनकी भी अपनी दुनिया है। अपनी जान पहचान है तो उसमें दखल देना किसी सूरत में मुनासिब नहीं है। क्योंकि उसके पास भी वही महीने में 4-5 छुट्टी है। उसी में सबको अपनी अपनी प्लानिंग करनी होती है। किसी को शादी में जाना तो किसी को पुराने दोस्त के पास तो किसी को कहीं. किसी को कहीं...कहने का मतलब सीधा और साफ शब्दों में ये है कि आपकी दुनिया छोटी है इसलिए आपको दिक्कत होती है और होती रहेगी। फिलहाल...&lt;/span&gt;!!!&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 10.0pt; line-height: 115%; mso-ansi-font-size: 11.0pt; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;"&gt; बहुत कम लोग जानते हैं कि कई बार तो कमरे में अकेले बोर हो जाने पर मार्केट जाकर पान खाकर टाइम बीताना पड़ता है ताकि पान खाने के दौरान उसी में कुछ देर उलझा रहूं...और फिर उसके बाद उसके असर में कुछ देर। कई बार यूं ही गाड़ी लेकर निकल जाना पड़ता है ताकि शरीर में थोड़ा बहुत धूप वगैरह भी लग जाए और कुछ समय भी...वैसे टीवी पर साउथ इंडियन फिल्में देखना और किताब पढ़ना भी रूटीन में शामिल होता है लेकिन कुछ देर बाद इससे भी मन उचट जाता है। चार-पांच छुट्टियों में से एक-दो तो ऐसी भी होती है जब पुराने पंद्रह बीस अखबारों को पलट पलट कर कुछ खास लेख, खबरें खोजने और फिर उसको पढ़ने का भी सहारा लेना पड़ता है। लेकिन इसमें भी उतना समय नहीं लगता। जिस वक्त ये लिख रहा हूं उस वक्त मैं घर में गैस सिलेंडर वाले का इंतजार कर रहा हूं। पान खाने के लिए बाहर जाने का मन था लेकिन गैस सिलेंडर वाले को फोन किया तो बोला कि मैं आ रहा हूं। तो इसी दौरान इसे छाप रहा हूं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="border: none; mso-border-bottom-alt: solid windowtext .75pt; mso-padding-alt: 0cm 0cm 1.0pt 0cm; padding: 0cm;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 10.0pt; line-height: 115%; mso-ansi-font-size: 11.0pt; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red;"&gt;एक दिन की छुट्टी &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;होने की वजह से भी शायद ऐसा है अगर दफ्तर में दो दिन की छुट्टी होती.. तो कहीं घूमने-फिरने भी निकल जाया जाता तो उसमें भी मन लगता...हो सकता है दो दिन की छुट्रटी का कुछ ज्यादा ही घाटा होता। वैसे परिचित लोग तो छुट्टी लेकर घूम फिर भी आते हैं यहां कहां मौका मिलता है। छे साल के दौरान इसी साल दो दो दिन के लिए शिमला और नैनीताल जाने का मौका मिला। वो भी तब जब साल में एक बार सिर्फ घर जाने की छुट्टी ली। इस महीने तो पार्टनर भी घर गया है। उसका भी टाइम टेबल अपना है। दूसरे मूड का है सो उसका समय ज्यादातर तो निकल जाता है। कभी कभी उसको भी उलझन होती है। जब 2006-2007 के दौरान दो दिन की छुट्टी मिलती थी उस वक्त मेरे बड़े भाई भी नॉर्थ में रहते थे... उस दौरान हर छुट्टियों में वहीं चला जाया करता था। लेकिन अब वो बिहार में ही हैं सो नॉर्थ कनेक्शन भी कट गया । एक रायजी मित्र हैं तो वो बिहार में ही हैं । बालक भी परिवार वाला आदमी है। धीरे-धीरे लोग कम होते गए न...जैसे जैसे नए लोग जुड़ना शुरू होते हैं तो पुराने अपने आप कम होने लगते हैं...लेकिन यहां नया पुराना सब माइनस में ही है। अब आज का रूटीन पता ही नहीं है करना क्या है....गैस वाला अब भी नहीं आया । आता तो इसको रोकता...अब कल तो ठीक रहा...मैच भी था... सब थे भी...लेकिन कल तो छुट्टी नहीं थी न... छुट्टी तो आज है...चलिए देखिए....क्या कर सकते हैं....कोई बात नहीं&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt; &lt;/span&gt;!!! &lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 10.0pt; line-height: 115%; mso-ansi-font-size: 11.0pt; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;"&gt;&amp;nbsp;थोड़ा यूपी चुनाव पर टाइम देना है। अब वही देखने जा रहा हूं। चलिए। आपको छुट्टी मिले तो फोन कीजिएगा। मैसेज कीजिएगा। हो सके तो बताकर मिलने भी आ सकते हैं। बुला भी सकते हैं।&amp;nbsp;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-6252400869400557945?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/6252400869400557945/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=6252400869400557945' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/6252400869400557945'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/6252400869400557945'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='&apos;फिलहाल&apos; छुट्टी वाले दिन की हकीकत!'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' 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src="http://4.bp.blogspot.com/-iu2ZshlI3_M/ToRzOgQiLoI/AAAAAAAAAHM/HMSAxpBvtXc/s320/advani-somnath-se-ayodhya.jpg" width="320px" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;एक बार फिर से देश में यात्राओं का दौर शुरू हो गया है। बाबा रामदेव स्वाभिमान यात्रा पर निकल चुके हैं। अगले महीने से आडवाणी अपने राजनीतिक जीवन की एक और यात्रा शुरू कर रहे हैं। उसके बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी सेवा यात्रा शुरू करने वाले हैं। इन यात्राओं से फायदा लेने की होड़ में हर नेता लगा हुआ है। बाबा रामदेव का मुद्दा काला धन है तो आडवाणी भ्रष्टाचार के खिलाफ यात्रा करने वाले हैं। नीतीश की यात्रा सुशासन का सच जानने के लिए हो रही है। सवाल ये है कि क्या इन यात्राओं से देश की जनता का भी कोई भला होने वाला है? &lt;br /&gt;जो भी शख्स राजनीतिक रूप से थोड़ा भी जागरूक है उनको इन यात्राओं के फायदे और नुकसान की समझ है। लेकिन इसमें समझने वाली बात ये है कि आखिर कांग्रेस नेतृत्व के गठबंधन वाली सरकार को इसका कोई नुकसान भी होगा। लोकसभा चुनाव वैसे तो दो हजार चौदह में होने हैं। लेकिन भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ देश में जो माहौल बना है उसने कहीं न कहीं मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार की सूरत को बिगाड़ जरूर दिया है। कुछ लोग आज के हालात की तुलना चौहत्तर-पचहत्तर के हालात से कर रहे हैं। उस वक्त इंदिरा गांधी के नेतृत्व की सत्ता को जेपी के आंदोलन ने चुनौती दी थी। नतीजा दुनिया ने देखा था जब कांग्रेस का देश से सफाया हो गया था। सच्चाई के चश्मे से आज के हालात को देखे तो कमोबेश सूरत तो वैसी नहीं है लेकिन हालात उसी ओर के इशारे जरूर कर रहे हैं। &lt;br /&gt;इन दिनों देश में अनायास ही जेपी चर्चा के विषय बन चुके हैं। जेपी की चर्चा हर ओर हो रही है। चाहे बाबा रामदेव के समर्थकों की पिटाई का मुद्दा हो या फिर अन्ना के आंदोलन का। किसी ने रामदेव पर लाठीचार्ज की तुलना जेपी मूवमेंट के वक्त के हालात से की है तो कोई अन्ना के आंदोलन में जेपी की तस्वीर देखता है। शायद इसी का फायदा उठाने के लिए आडवाणी भी जेपी जयंती के मौके पर रथयात्रा की शुरुआत कर रहे हैं। 11 अक्टूबर को जेपी की जयंती है और जेपी की जन्मस्थली बिहार के सिताब दियारा से आडवाणी भ्रष्टाचार के खिलाफ यात्रा शुरू कर रहे हैं। कहीं न कहीं जेपी एक बार फिर से नेताओं के लिए प्रेरणा बन गये हैं। बीच के दिनों को याद करें तो जेपी के शिष्य कहे जाने वाले नेता जेपी के अरमानों को अपने हाथों से कुचल चुके हैं। लेकिन जेपी इन सबके बीच जीवंत हैं।&lt;br /&gt;बिहार से यात्रा को लेकर आडवाणी की सोच चाहे जो कुछ भी हो लेकिन एक सच ये भी है कि आडवाणी ने उस बिहार को अपनी यात्रा के लिए चुना है जिस बिहार में कभी लालू ने उनकी रथयात्रा रोक दी थी। 1990 का वो साल था जब समस्तीपुर में आडवाणी की यात्रा को लालू ने ये कहकर रोक दिया था कि देश में इस यात्रा से माहौल बिगड़ रहा है। कुछ लोग मानते हैं कि आडवाणी उस टीस को भूल नहीं पाए हैं। और उसी को पाटने के लिए बिहार के छपरा से यात्रा की शुरुआत कर रहे हैं। जेपी छपरा से निकलकर बिहार के कुछ जिलों का सफर तय करने के बाद झारखंड और फिर यूपी में दाखिल होंगे। उस यूपी में जहां अगले साल चुनाव होने हैं। और यूपी की लड़ाई में दम दिखाने के लिए बीजेपी को पसीना बहाना ही पड़ेगा क्योंकि बीजेपी आज यूपी में प्रासंगिक नहीं है। आडवाणी इस चीज को समझते हैं और इसिलिए मौके की नजाकत का फायदा उठाने की फिराक में हैं। इस बीच एक नया विवाद उठा है कि नरेंद्र मोदी को मोदी की ये यात्रा पसंद नहीं है। कारण जो भी हो लेकिन पीएम पद की दावेदारी को लेकर बीजेपी में उठे विवाद को जानकार इसकी वजह मान रहे हैं। 11 अक्टूबर को शायद ये भी साफ हो जाए। संघ के सूत्रों ने संकेत दिये हैं कि आडवाणी उस दिन शायद पीएम पद की दावेदारी छोड़ने का एलान कर दें। यहां ये बताना जरूरी है कि आडवाणी पहले गुजरात के सोमनाथ से यात्रा शुरू करने वाले थे लेकिन किन्हीं कारणों से उन्हें बिहार से शुरू करने का फैसला करना पड़ा। अब ये कहा जा रहा है कि नरेंद्र मोदी के विरोध के चलते उन्हें बिहार जाना पड़ा है। वैसे एक बात और दिलचस्प है कि मोदी की काट के लिए आडवाणी ने उस बिहार की धरती से यात्रा शुरू करने का फैसला किया जहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को नरेंद्र मोदी का सार्वजनिक मंचों पर साथ दिखने का विरोधी माना जाता है। 18 राज्य और तीन केंद्र शासित प्रदेशों की यात्रा करने के बाद आडवाणी 20 नवंबर को दिल्ली पहुंचेंगे जहां एक रैली होगी। अब इस रैली में मोदी रहेंगे या नहीं ये नहीं मालूम। नीतीश रहेंगे या नहीं ये भी नहीं मालूम। इंतजार बीस नवंबर का करना होगा जब आडवाणी अपनी यात्रा खत्म करेंगे तो उस दिन दिल्ली के मंच की क्या तस्वीर होगी। क्या नीतीश और मोदी आडवाणी के इस समापन समारोह के साक्षी बनेंगे या फिर कोई एक आएगा और दूसरा दूर से ही ताली बजाएगा?&lt;br /&gt;यात्रा पर इन दिनों यूपी में मायावती भी ही हैं जो नए जिले बनाने में जुटी हैं। समाजवादी पार्टी के युवराज अखिलेश यादव भी यूपी में क्रांति का अलख जगाते फिर रहे हैं। गुजरात में कांग्रेस के वाघेला भी चुनावी यात्रा पर मोदी के खिलाफ मोर्चा बनाकर निकल चुके हैं। कुल मिलाकर सच्चाई ये है कि सब कोई अपने फायदे की यात्रा में जुटा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-8473444976838117408?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/8473444976838117408/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=8473444976838117408' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/8473444976838117408'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/8473444976838117408'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='यात्राओं के दौर में देश'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-iu2ZshlI3_M/ToRzOgQiLoI/AAAAAAAAAHM/HMSAxpBvtXc/s72-c/advani-somnath-se-ayodhya.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-1064251600637576183</id><published>2011-08-22T22:20:00.001+05:30</published><updated>2011-08-23T20:44:07.758+05:30</updated><title type='text'>अन्ना की 'शांतिपूर्ण क्रांति'</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: left; margin-right: 1em; text-align: left;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-pFM1Xvwt8ds/TlKGy8AqHMI/AAAAAAAAAHI/rQ_qC4nW2To/s1600/annnnnn.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/-pFM1Xvwt8ds/TlKGy8AqHMI/AAAAAAAAAHI/rQ_qC4nW2To/s320/annnnnn.jpg" width="282" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red;"&gt;अन्ना एक आंदोलन&lt;/span&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Mangal, serif; font-size: 13px; line-height: 14px;"&gt;&lt;b&gt;हिन्दुस्तान में हवा का रुख इस वक्त रामलीला मैदान से शुरू&lt;/b&gt; होकर देश भर में फैल रहा है। इस वक्त मैं जब लिख रहा हूं मेरे पीछे जिन्दाबाद के नारे लगाए जा रहे हैं। रोड पर छोटे छोटे बच्चों से लेकर बड़े तक सब हाथों में मोमबत्ती लिए भारत माता की जय के नारे बुलंद कर रहे हैं। देश भर की गलियों में पिछले पांच-छे दिनों से ये आवाज गूंज रही है। आज की इस पीढ़ी ने इतना बड़ा जनआंदोलन जो बिना किसी बवाल के सात दिनों से हिन्दुस्तान की सड़कों पर चल रहा है नहीं देखा। अतीत के पन्ने को पलटे तो इस पीढ़ी को याद है तो मंदिर आंदोलन और वीपी सिंह की लगाई आरक्षण की आग वाला हिंसक आंदोलन। बीते पच्चीस तीस सालों में कई तरह के आंदोलन भले ही देश में हुए लेकिन आज का ये आंदोलन कई मामलों में अलग है। पुराने आंदलोनों में मीडिया का ये हुजूम नहीं था। आज देश के कोने कोने की तस्वीरें इस कोने से लेकर उस कोने तक जा रही है। देश का एक बड़ा तबका जो देश की तकदीर और तस्वीर को बदलने में अहम भूमिका निभाता है वो आज सड़कों पर है। अपनी आगे की पीढ़ी को संस्कार और शिक्षा देने के लिए। जिन लोगों ने बदलते हिन्दुस्कान की तस्वीरें नहीं देखी वो एक बार रामलीला मैदान जरूर हो आएं। क्योंकि आंदोलन जब अतीत बन जाएगा तो खुद को गुनहगार मानने के अलावा कुछ न कर सकेंगे। आज के इस आंदोलन में हर वो रंग है हर वो तस्वीर है हर वो लोग है जिसे देखना सुनना और समझना चाहता है सवा सौ करोड़ का हिन्दुस्तान। मंच से जब अन्ना हजारे की आवाज नहीं सुनाई देती तो लगता है देश में मातमी सन्नाटा पसरा हुआ है। 74 साल का नौजवान तीस साल के नौजवानों के लिए प्रेरण बनकर सात दिनों से भूखा है। सात घंटे में इन लोगों को पसीना आ जाए। आखिर रामलीला मैदान के मंच पर बैठा शख्स भी आपके और हमारे बीच का इंसान ही है। उसे भी खाना पसंद है शौक से कोई सात दिनों तक भूखा नहीं रहता। आप और हम सात घंटे भूखे रह जाएं तो पूरे खानदान को पता चल जाता है। लेकिन सात दिनों से एक शख्स भूखा है और आपके लिए लड़ रहा है। सिर्फ आपके लिए। सब कुछ ठीक भी रहा तो पांच साल से दस साल और इससे ज्यादा उनकी उम्र नहीं होगी। लेकिन आज हिन्दुस्तान उनके दीर्घायु होने की कामना कर रहा है। देश भर में जन्माष्टमी का उत्सव आज इस आंदोलन के आगे फीका पड़ गया। मुंबई में दही हांडी फोड़ने की तस्वीरें आज के दिन स्कीन से हटती नहीं थी लेकिन शायद ही आज देश ने मुंबई के उत्सव को देखा होगा। सिर्फ इसलिए कि आंदोलन के रंग के आगे उत्सव का रंग फीका पड़ गया, सेना का सिपाही जनता का जनरल बनकर दिलों पर राज कर रहा है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: right; margin-left: 1em; text-align: right;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-NarbN-b0LEk/TlKGrx6IHlI/AAAAAAAAAG0/5lI1nGoSDQU/s1600/annas.bmp" imageanchor="1" style="clear: right; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="219" src="http://1.bp.blogspot.com/-NarbN-b0LEk/TlKGrx6IHlI/AAAAAAAAAG0/5lI1nGoSDQU/s320/annas.bmp" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red;"&gt;मैं भी अन्ना हजारे&lt;/span&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif; font-size: 10pt; line-height: 115%;"&gt;आज भी इस देश में मध्यमवर्गीय परिवार राजनीति को गंदी नजरों से देखता है। परिवार का कोई बच्चा राजनीति में चला जाए। झंडा बैनर और भाषण की बात करने लगे तो घरवालों से उसे न जाने क्या क्या सुनना पड़ता है। लेकिन आज तस्वीर बदली हुई है। रामलीला मैदान में एक साथ तीन तीन पीढ़ी के लोग पहुंच रहे हैं। ताकत को बढ़ाने के लिए। मुझे नहीं लगता कि जिसे लोग गली मोहल्ले में नेता कहते हैं, या फिर जो राजनीतिक दलों का कार्यकर्ता है वो किसी आंदोलन, धरना, प्रदर्शन, बंदी में अपने बच्चों, बीवी और बेटा-बेटियों को लेकर सड़क पर जिन्दाबाद मुर्दाबाद के नारे लगाने के लिए उतरता है। लेकिन इस आंदोलन में नेता नहीं हर कोई नायक बनकर सड़क पर उतरा है। तीन महीने की बच्ची से लेकर तिहत्तर साल के बुर्जग तक में वही जोश है जो मंच से दिखता है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif; font-size: 10pt; line-height: 115%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif; font-size: 10pt; line-height: 115%;"&gt;&lt;b&gt;एक आदमी की&lt;/b&gt; आवाज के पीछे लोग भाग रहे हैं। फिर भी अंधे और बहरे लोगों को न तो दिखाई दे रहा है और ना ही कुछ सुनाई दे रहा है। वक्त हमेशा एक जैसा नहीं होता। लीबिया, सीरिया, ट्यूनिशिया और मिस्र जैसा आइटम गवाह है जहां तीस साल-चालीस साल तक पके पकाए जमींदारों को जमीन में लिटा दिया गया। यहां तो फिर भी सब कुछ सामान्य है। खामोश है हिन्दुस्तान। मन में चिंगारी है लेकिन दबी हुई। लोग उसे हवा नहीं दे रहे। लेकिन सन्नाटा तो कभी भी मजबूर कर सकता है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: left; margin-right: 1em; text-align: left;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-p9Y-0So_mFw/TlKGvF4W3QI/AAAAAAAAAG8/zgXmFgHTfss/s1600/annna3.bmp" imageanchor="1" style="clear: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/-p9Y-0So_mFw/TlKGvF4W3QI/AAAAAAAAAG8/zgXmFgHTfss/s1600/annna3.bmp" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red;"&gt;19 अगस्त, दिल्ली की सड़कों पर जनसैलाब&lt;/span&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif; font-size: 10pt; line-height: 115%;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;चालीस साल&lt;/b&gt; बाद टीम इंडिया की ऐसी शर्मनाक हार हुई है । वो भी उस कप्तान की कप्तानी में जिसने इस टीम को नंबर वन बनाया था। उसी कप्तान की कप्तानी में टीम की नैया डूब गई। टीवी पर कुछ देर के लिए माहौल बनाने की कोशिश भी हुई लेकिन रामलीला मैदान के मंच पर छाए सन्नाटे ने इन्हें आज बख्श दिया। जिस कप्तान की तारीफ में कसीदे पढ़ पढ़ करके थकते नहीं थे उसे भी हार का सामना करना पड़ा है। संयोग है कि आज कल में वापस नहीं लौटना है नहीं तो उनको भी माफी मांगने के लिए रामलीला मैदान जाना होता। कहने के मतलब ये कि आज हिन्दुस्तान रामलीला मैदान की ओर देख रहा है। आज की ये पीढ़ी पहली बार दिल्ली की सड़कों पर लाखों की भीड़ देख रही है। छुट्टी लेकर लोग रामलीला मैदान का रुख कर रहे हैं। लड़ाई है। जो लड़ी जा रही है। अन्ना इस लड़ाई में जनता के जनरल हैं और सड़क पर उतरी ये सेना इस लड़ाई में उनका साथ दे रही है। और इतिहास गवाह है कि शासन को झुकना ही पड़ा है। शांति अहिंसा और सदाचार के नारे के साथ जो शांतिपूर्ण क्रांति की शुरुआत हुई है उसका असर सिर्फ इस पीढ़ी को नहीं कई पीढ़ियों पर पड़ने वाला है। बात सिर्फ अब कानून बनने और न बनने को लेकर नहीं हो रही । बात अब सच और झूठ की है। धोखे में रखने की है। सच को छिपाने की है।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif; font-size: 10pt; line-height: 115%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-1064251600637576183?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/1064251600637576183/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=1064251600637576183' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/1064251600637576183'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/1064251600637576183'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2011/08/blog-post_22.html' title='अन्ना की &apos;शांतिपूर्ण क्रांति&apos;'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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कदम पर है। आदमी रोज खुशियों की तलाश करता है। बहाने खोजता है खुश रहने के। लेकिन खुशियां इंतजार कराती हैं। बहुत कम लोग होते हैं जिनपे आप भरोसा करते हैं या फिर बहुत कम लोग होते हैं जो आप पर भरोसा करते हैं। लोग कहते हैं कि भरोसा बहुत बड़ी चीज है, मुझे भी ऐसा लगता है। खुशियां बांटने के वक्त बहुत से लोग आपके करीबी हो जाते हैं। लेकिन परेशानी में शायद ही कोई साथ देने वाला मिलता है। मेरे कहने का ये मतलब ये नहीं है कि अपकी हर खुशी में हर कोई आपके जितना ही खुश होता है। इस संदर्भ में कुछ खुशी दिखाने की होती है तो कुछ लोगों की खुशी मजबूरी में। लेकिन जो आपके साथ वाकई में खुश होता है या फिर आपकी खुशी में आपसे ज्यादा उसे खुशी मिलती है तो वो आपका परिवार होता है। परिवार का मतलब सिर्फ मां-बाप, भाई-बहन ही नहीं है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;﻿ &lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: right; margin-left: 1em; text-align: right;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-KSEzDZvCBu8/TgSqsA8PUYI/AAAAAAAAAFE/N07kMeIhRz0/s1600/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="240" i$="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-KSEzDZvCBu8/TgSqsA8PUYI/AAAAAAAAAFE/N07kMeIhRz0/s320/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;strong&gt;करोगे याद....&lt;/strong&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;﻿ &lt;div class="MsoNormal" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; margin: 0cm 0cm 10pt;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 10pt; line-height: 115%; mso-ansi-font-size: 11.0pt; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;"&gt;&lt;strong&gt;परिवार का मतलब वो साथी जो आपके साथ हर वक्त खड़ा है&lt;/strong&gt;, आपके दुख-सुख में, सपनों में, हकीकत में, खाने में, पीने में। असल में आपके जीने का असली साथी, असली दोस्त, असली भाई, असली परिवार यही है। जो लोग इस मौके पर आपके साथ हैं वो लोग आपकी परेशानी में भी आपके सहभागी बनने के काबिल हैं। घर से कोसों दूर भागमभाग भरी जिंदगी में रोज लड़ाई होती है, कभी अपने से कभी अपने काम से तो कभी अपनों से। लेकिन इस भागमभाग में आपको अपनों की कमी खलती है। घर से कोसों दूर घरवाले यानी मम्मी-पापा, भाई-भाभी आपकी रोज रोज की परेशानियों को बांट नहीं सकते। खुशियां तो बांट लेते हैं। लेकिन परेशानी आप घरवालों को नहीं बताना चाहते इसलिए कि आप अपने घरवालों से प्यार करते हैं। उनको आपकी परेशानियों के बारे में पता चलेगा तो वो आपसे ज्यादा परेशान हो जाएंगे। यही सोचकर हम में से ज्यादा लोग घरवालों से हर परेशानी पर परिचर्चा नहीं करते। ऐसी ही परेशानियों पर चर्चा के लिए आपको करीबी दोस्त, साथी, सहपाठी, सहयोगी की कमी महसूस होती है या जिनके पास इतने करीबी मौजूद हैं तो वो इनसे चर्चा कर लेते हैं। लेकिन जिनके पास इनमें से कोई नहीं है, उनको और ज्यादा परेशानी होती है। इसलिए ही परेशानी से बचने के लिए हमें बेहद करीबी की जरूरत महसूस होती है। यहां ये साफ करना जरूरी है कि बेहद करीबी का मतलब केवल आपकी प्रेमिका, प्रेमी या पत्नी, पति से ही नहीं है। कुछ दोस्त ऐसे भी होने चाहिए जिनकी अहमियत प्रेमी, प्रेमिका, पार्टनर, पति, पत्नी से ज्यादा हो। वैसे सच्चाई ये है कि बहुत कम लोग ऐसे किस्मत वाले हैं। कोशिश कीजिए शायद मेरी तरह कमी महसूस नहीं करेंगे। मैं भी बहाने खोज रहा हूं। धन्यवाद। बहुत दिन हो गये थे कुछ लिखा नहीं था। मेरे लिए भी ये कहानी पुरानी है लेकिन आज सोचा इसी से शुरुआत करूं। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-6520269909478277406?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/6520269909478277406/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=6520269909478277406' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/6520269909478277406'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/6520269909478277406'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='तलाश कीजिए... शायद मिल जाए।'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-KSEzDZvCBu8/TgSqsA8PUYI/AAAAAAAAAFE/N07kMeIhRz0/s72-c/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-7063741778811575442</id><published>2011-02-21T20:48:00.000+05:30</published><updated>2011-02-21T20:48:05.452+05:30</updated><title type='text'>सदी के 'सबसे बड़े कांड' पर फैसला</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;﻿ &lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: left; margin-right: 1em; text-align: left;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-c3urJgHJhSE/TWJ_ybQsmhI/AAAAAAAAAEY/H1Dwb10MfKc/s1600/godhra.bmp" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="213" j6="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-c3urJgHJhSE/TWJ_ybQsmhI/AAAAAAAAAEY/H1Dwb10MfKc/s320/godhra.bmp" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;अब लोग गोधरा कांड के लिए जानते है...&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;﻿ &lt;strong&gt;वैसे तो 9 साल&lt;/strong&gt; पूरे होने में तकनीकी तौर पर पांच दिन कम है। लेकिन गिनती के जोड़-घटाव को छोड़ दें तो 9 साल पूरे मानिए। तो पूरे नौ साल बाद आ रहा है कल फैसला। वैसे तो हाल के दिनों में कई बड़े फैसले आए, लेकिन कल के फैसले का मतलब अलग है। कल जिस केस में फैसला आ रहा है उस घटना से पहले इस देश में एक अलग हिन्दुस्तान था और उस घटना के बाद अब इस देश में एक अलग हिन्दुस्तान है। 27 फरवरी 2002 बहुत लोगों को याद नहीं होगा, लेकिन लोग भूले भी नहीं होंगे। एक ट्रेन में कुछ उपद्रवी टाइप के लोग आग लगा देते हैं। आग लगना&amp;nbsp;महज एक&amp;nbsp;संयोग भी हो सकता है या फिर साजिश भी। तर्क और बहस अपनी जगह पर है। कुछ तो हुआ ही था तभी तो 58 लोग जिंदा जल गए। कई स्टिंग ऑपरेशन भी हो चुके, कई गवाह और कई तरह के लोग घटना के आगे और पीछे की कहानी कबूल चुके हैं। वैसे कोर्ट का फैसला कल आएगा, डिटेल में जानकारी मिल जाएगी।&lt;br /&gt;﻿﻿ &lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: left; margin-right: 1em; text-align: left;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-PRKRWPeeIMY/TWKAJ6bTp_I/AAAAAAAAAEc/YXjkD2ZVWTM/s1600/godhara1.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" j6="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-PRKRWPeeIMY/TWKAJ6bTp_I/AAAAAAAAAEc/YXjkD2ZVWTM/s1600/godhara1.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;गोधरा कांड के बाद का गुजरात&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;﻿﻿ &lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;9&lt;/strong&gt; साल पहले इस घटना के बाद जो घटना हुई उसने देश के एक बड़े प्रदेश की चरित्र का अलग चित्रण संपूर्ण ब्रह्मांड के सामने पेश किया। खैर, कारण जो भी रहा... कोशिश सब ने की। कहीं कोई. तो कहीं कोई... राजनीति करने वाले अपनी राजनीति करते रहे...सत्ता ने सत्ता का फायदा उठाया, तो विपक्ष उस फायदे पर अपना राग गाकर अपने फायदे की सियासत में जुटा रहा। देश में जब भी कोई चुनाव आता है “गोधरा और गोधरा के बाद” मुद्दा जरूर बनता है... वोट के लिए। बिहार हो तब चाहे यूपी हो तब। &lt;/div&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: right; margin-left: 1em; text-align: right;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-Jlp9twXKwFs/TWKAqcqvTII/AAAAAAAAAEg/1AlAoMLtlgA/s1600/godhra2.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" j6="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-Jlp9twXKwFs/TWKAqcqvTII/AAAAAAAAAEg/1AlAoMLtlgA/s1600/godhra2.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;सियासी फायदे के लिए मजबूरी का इस्तेमाल&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;ब&lt;/strong&gt;ताया जाता है कि &lt;strong&gt;27 फरवरी 2002&lt;/strong&gt; अयोध्या से लौट रहे कार सेवकों के जत्थे पर उपद्रवियों ने हमला किया था.. हमला इस शक्ल में था कि साबरमती एक्सप्रेस जब गोधरा में रुकी तो बोगी नंबर एस-6 में आग लगा दी गई। देखते ही देखते आग ने विकराल रूप लिया.. और उस बोगी में मौजूद 58 लोग मारे गये। बाद में इस घटना ने सांप्रदायिक रूप लिया और फिर गोधरा सिर्फ गोधरा नहीं.. गोधरा कांड के रूप में देश में जाना जाने लगा। बाद में नरोडा पाटिया, गुलबर्गा सोसायटी और न जाने क्या क्या नाम देश को सुनने को मिले...बाद में कई जांच कमेटियां बनीं... रिपोर्ट भी तरह तरह के। किसी ने कहा बाहर से किसी ने कहा अंदर से। किसी ने साजिश किसी ने संयोग। सत्य क्या है...सामने आएगा...वैसे रेल चलाने वाले नेताओं ने भी अपने अपने हिसाब से इन नौ सालों में मन भर सियासत की। वोट बैंक से जुड़ा मामला तो था ही। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाने पर रोक लगा दी थी...हालांकि फिर 26 अक्टूबर 2010 को&amp;nbsp; हरी झंडी दे दी थी । 94 आरोपी 2002 से ही जेल में बंद हैं। अब गोधरा कांड की हकीकत से कल पर्दा उठने वाला है। साबरमती सेंट्रल जेल में विशेष जज पी.आर. पटेल कल फैसला सुनाएंगे। मामला ज्यादा न बिगड़े इसके लिए गोधरा के ये&amp;nbsp; ट्रेन वाले वीडियो... नहीं दिखाने का आदेश जारी हो चुका है, सो वो तस्वीरें फिर से नहीं दिखेगी।&amp;nbsp; &lt;/div&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: left; margin-right: 1em; text-align: left;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-Pn89ZOJNfSc/TWJ_eP5zcxI/AAAAAAAAAEU/xWv-keB_o5A/s1600/godhra+4.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" j6="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-Pn89ZOJNfSc/TWJ_eP5zcxI/AAAAAAAAAEU/xWv-keB_o5A/s1600/godhra+4.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;यही है वो तस्वीर... जिसने....&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;strong&gt;बीते कुछ सालों&lt;/strong&gt; में कई बड़े फैसले देश ने देखे और सुने हैं। चाहे मुंबई का 93 बम ब्लास्ट का मामला हो। या फिर अयोध्या की विवादित जमीन का मामला। देश अब दस साल पुरानी तस्वीरों से ऊपर उठ चुका है। अयोध्या के विवाद ने ही देश में कई ‘कांड’ कराए थे। लेकिन जब पिछले साल फैसला आया तो देश ने धैर्य और हिम्मत के साथ उसे स्वीकार किया... किसी ने भी कल्पना नहीं की थी। फैसले की नहीं, इस तरह स्वीकार करने की। अब कल भी इसी टाइप से जुड़े मामले में फैसला आ रहा है। न्यूज चैनलों पर कवरेज सुबह से ही लाइव रहने के आसार है...क्योंकि 21वीं सदी के ‘सबसे बड़े कांड’ पर फैसला जो आना है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-7063741778811575442?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/7063741778811575442/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=7063741778811575442' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/7063741778811575442'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/7063741778811575442'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='सदी के &apos;सबसे बड़े कांड&apos; पर फैसला'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' 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imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" h5="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-ZBYyPBxWkG4/TVVZry2BxfI/AAAAAAAAAEI/Ot_h3epezrc/s1600/GANGA+MAIYA.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;पहली भोजपुरी फिल्म&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;﻿ &lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;बुधवार यानी &lt;strong&gt;16 तारीख&lt;/strong&gt; को पचास साल का हो रहा है भोजपुरी फिल्मों का इतिहास। इन पचास सालों में भोजपुरी फिल्म कहां से शुरू होकर कहां तक पहुंचा है इसको लेकर बड़ी बहस हो सकती है। क्योंकि सवाल कई हैं। सवाल ये कि कल की भोजपुरी और आज की भोजपुरी के मिजाज में कितना फर्क आया है। जिस दिन भोजपुरी इंडस्ट्री की पटना में नींव रखी गई थी उस दिन भी उद्देश्य व्यवसायिक ही था और आज भी पचास साल बाद मतलब व्यवसायिक ही है। फर्क सिर्फ इतना है कि सिनेमा देखने और दिखाने वाले दोनों बदल गए हैं। उन दिनों लोग गांव-गांव से बैलगाड़ी, तांगा और साइकिल रिक्शा से सफर करके तीन घंटे का मनोरंजन करने ही सिर्फ लोग कोसों दूर नहीं जाते थे। ये तीन घंटे महीनों गांव के चौपाल और पनघट पर लोगों को जोड़ने का जरिया होता था। जिस सोच के साथ भोजपुरी इंडस्ट्री की शुरुआत हुई थी वो सोच क्या आज भी जिंदा है? क्या पचास साल बाद भी भोजपुरी सिनेमा की चर्चा गांव के चौपाल और पनघट पर उसी तरह होती है जैसे 60-70-80 के दशकों में होती थी। सवाल कई हैं। मैं ये नहीं कह रहा कि भोजपुरी फिल्मों का विकास नहीं हुआ है, लेकिन जिस दिशा में विकास होना चाहिए था क्या उस दिशा में उस रफ्तार से भोजपुरी का पहिया आगे बढ़ा है ? हिंदी फिल्मों के बाद सबसे बड़ा बाजार भोजपुरी इंडस्ट्री का कहा जाता है। सवाल ये कि क्यों इसे बड़ा बाजार माना जाए ? सिर्फ इसलिए की यहां हर हफ्ते फिल्में बनती हैं ? &lt;/div&gt;﻿﻿ &lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: right; margin-left: 1em; text-align: right;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TVVaylOTfwI/AAAAAAAAAEM/JUtV8QTIAcA/s1600/EMU9CAMXTWRXCA67XCHXCAX8BM2OCAUO7188CA91VTSJCALYBHJ6CAJ698K1CA2HIIIMCAEQYQDOCAAEAXHOCA8S5KX3CAGZ7Y1FCAFE85G6CAUZEG4ACAMM7YGUCA0LLFYICAL7XAADCA3KVDCPCA4SGYH1.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" h5="true" src="http://1.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TVVaylOTfwI/AAAAAAAAAEM/JUtV8QTIAcA/s1600/EMU9CAMXTWRXCA67XCHXCAX8BM2OCAUO7188CA91VTSJCALYBHJ6CAJ698K1CA2HIIIMCAEQYQDOCAAEAXHOCA8S5KX3CAGZ7Y1FCAFE85G6CAUZEG4ACAMM7YGUCA0LLFYICAL7XAADCA3KVDCPCA4SGYH1.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;भोजपुरी सिनेमा के बड़े चेहरे&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;﻿ &lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;क्या कारण&lt;/strong&gt; है कि मनोज तिवारी और रवि किशन के अलावा किसी भी भोजपुरी हीरो-हीरोइनों की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर नहीं है? &amp;nbsp;क्यों आज भी हिंदी फिल्मों की तरह भोजपुरी फिल्मों के गाने घर के भीतर नहीं सुने और सुनाए जाते ? सवाल बहुत सारे हैं। सच्चाई भी यही है कि जवाब किसी के पास नहीं है। एक उदाहरण देता हूं आपको पिछले दिनों भोजपुरी अभिनेत्री रानी चटर्जी से जुड़ी एक खबर राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां बनी थीं। लेकिन रानी चटर्जी को मेरे दफ्तर के 95 फीसदी लोग नहीं जानते थे। जानने का मतलब कहीं से ये नहीं कि वो कौन हैं, कहां की रहने वाली है... मतलब ये कि भोजपुरी इंडस्ट्री की आप किस बात की बड़ी हीरोइन हो कि आपकी राष्ट्रीय स्तर पर कोई पहचान नहीं है। मनोज तिवारी और रवि किशन को जानने वाले भी बहुत लोग नहीं जानते कि वो किस जिले के रहने वाले हैं लेकिन उनके बारे में 95 फीसदी लोगों को बताने की जरूरत नहीं है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;16 फरवरी 1961&lt;/strong&gt; को पटना के शहीद स्मारक पर भोजपुरी इंडस्ट्री की नींव रखी गई । फिल्म गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो के मुहुर्त के साथ। अगले दिन शूटिंग शुरू हुई और फिर साल भर बाद भोजपुरी कला के क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति की शुरुआत हुई। 1962 में पहली भोजपुरी फिल्म &lt;strong&gt;गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो&lt;/strong&gt; रिलीज हुई । सोच, संस्कृति और माटी की खुशबू के साथ बनी इस पहली भोजपुरी फिल्म के बनने की कहानी भी दिलचस्प है। नाजीर हुसैन की इच्छाशक्ति, विश्वनाथ शाहबादी (निर्माता) का साथ और कुंदन का निर्देशन। राजेंद्र बाबू की प्रेरणा से इतिहास की शुरुआत इन्हीं तीनों ने की थी। पहली भोजपुरी फिल्म में हीरो बनने का सौभाग्य असीम कुमार और हीरोइन बनने का मौका कुमकुम को मिला। गीत का भार शैलेंद्र के कंधों पर तो संगीत की जिम्मेदारी संभाली चित्रगुप्त ने। बनारस के सिनेमाघर में जब फिल्म लगी तो आसपास के गांव में कहा जाने लगा कि गंगा नहा, विश्वनाथ जी के दर्शन कर, गंगा मइया देख तब घर जा। 50 साल हो गए है । गंगा मइया... से शुरुआत और फिर गंगा किनारे मोरा गांव, नदिया के पार, सजनवां बैरी भइले हमार, माई, बलम परदेसिया, पिया के गांव, दूल्हा गंगा पार के, और न जाने क्या-क्या। कितनी आईं और गईं । धीरे-धीरे तो माहौल ऐसा बन गया कि हिंदी फिल्मों में भी भोजपुरी गाने और संवाद फिट होने लगे। मैंने प्यार किया और हम आपके हैं कौन में शारदा सिन्हा के गाए गीत शायद ही कभी भूलाए जाएंगे। लेकिन अब क्या ? लहरिया लूट ए राजा जी.. देवरा बड़ा सतावेला... निरहुआ सटल रहे....&lt;br /&gt;﻿ &lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: right; margin-left: 1em; text-align: right;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-qTv9wI3WvZY/TVVdL_WVf4I/AAAAAAAAAEQ/k8p3kJMNS-Y/s1600/jabkehu-dilme2.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" h5="true" height="320" src="http://2.bp.blogspot.com/-qTv9wI3WvZY/TVVdL_WVf4I/AAAAAAAAAEQ/k8p3kJMNS-Y/s320/jabkehu-dilme2.jpg" width="240" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;इन्हें क्यों नहीं जानते लोग...&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;﻿ &lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;इन पचास सालों&lt;/strong&gt; में कहां से शुरू हुए और कहां पहुंचे। ना तो कोई इस पर चिंतन करने वाला है और ना ही किसी को चिंता है। आखिर व्यवसायिक सोच के सामने विरासत का कोई मतलब भी नहीं रह जाता। और आज के जमाने में पचास साल पीछे मुड़कर कोई क्यों देखेगा ? लेकिन मेरा सवाल अब भी वही है कि.. आखिर ऐसा क्या नहीं हो पाया है जिसने भोजपुरी फिल्मों के समाज को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने से रोके रखा है। व्यवसायिक फायदे के लिए ही न जिनको भगवान ने आवाज दी है गाने के लिए वो गाना छोड़कर कमर लचका रहे हैं...। मनोज तिवारी के गीत को सुने उनके प्रशंसकों को जमाने बीत गये होंगे। पवन सिंह, गुड्डू रंगीला, निरहुआ और न जाने क्या.. क्या...जिनको गाना चाहिए वो बजा रहे हैं... और जिनको बजाना चाहिए वो गा रहे हैं... ये तो है आज की स्थिति। &lt;/div&gt;रिंकू घोष, रानी चटर्जी, पाखी हेगड़े, दिव्या देसाई... सब के सब बौरो प्लेयर। दूसरे टीम के खिलाड़ी को अपने साथ कब तक खेलाते रहेंगे ? अमिताभ बच्चन, अजय देवगन, भाग्यश्री, नगमा ने काम किया तो जोर जोर से बोलते हैं कि बॉलीवुड के बड़े सितारे भोजपुरी की तरफ रुख कर रहे हैं...बे काहे का रुख कर रहे हैं...तुम्हारे पास है नहीं प्लेयर तो बाहरी को खेलने के लिए बुला रहे हो... &lt;br /&gt;चूंकि सोच सिर्फ व्यवसायिक है इसलिए कोई सोच को बदलना नहीं चाहता। और इन लोगों के लिए भोजपुरी इंडस्ट्री एक बाजार भर हैं और इस बाजार में सब के सब खुद को बेच रहे हैं। किसी को न तो भोजपुरी के अतीत, वर्तमान और भविष्य की कोई चिंता हैं और ना ही अपने पहचान की। कुएं से बाहर कोई निकलना नहीं चाहता और आरोप सामने वाले पर मढ़ता है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सुन रह हैं कि पटना&lt;/strong&gt; में तीन दिनों का कोई कार्यक्रम रखा गया है। भोजपुरी के नाम पर खुद की मार्केटिंग करने वाले उस कार्यक्रम में जरूर जाएंगे। बिना किसी सोच के, बिना किसी रूपरेखा के। इतिहास पर भाषण देंगे जो कि सबसे आसान है, चाय-नाश्ता, फोटे-शोटो खिंचवा के अपनी मार्केटिंग करेंगे। भाई मार्केटिंग करने में कोई बुराई नहीं मान रहा लेकिन मार्केटिंग भी ढंग की तो करो। क्या वजह है कि कमाल खान को देश जान जाता है और पवन सिंह....&lt;br /&gt;बीते एक दशक में रही सही कसर आज के तथाकथित गायकों ने पूरी कर दी है। सुनिए "लगाइ दीही चोलिया के हुक राजा जी"... और "मोबाइल के जमाना बा चोलिये में गावत गाना बा"....इसी टाइप के गाने लिखे जा रहे हैं न... गाये भी जा रहे हैं...और सुने भी... लेकिन चौक चौराहे और जीप बस से ज्यादा इनकी उम्र नहीं है। इस बात को माननीय महोदय आपको समझना होगा, समझाना होगा। भोजपुरी सिनेमा और गाना सुनकर एक गैर भोजपुरी ही क्यों ? अब तो आपको भी एक मिनट के लिए लगता ही होगा कि इसके गाने कैसे हैं...? अश्लीलता से हटकर सार्थकता की बात अब कहीं नहीं होती। अब न तो &lt;strong&gt;"आरा हिले छपरा हिले"&lt;/strong&gt; है... और ना ही &lt;strong&gt;"फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी..."&lt;/strong&gt; विवाह गीत, देवी गीत, छठ के गीत और शंकर भगवान के गीत के अलावा घर में बजाकर सुनने वाले कोई गीत शायद ही दस सालों में किसी ने गाया होगा...कहने का मतलब ये कि पचास साल पहले जिस मंजिल की तलाश में निकले थे मुझे नहीं पता कि कौन मंजिल तक पहुंचा। बेहतर होगा कि ये पता चले कि कोई तो मंजिल तक पहुंचा। रास्ता भटक चुके हो दोस्त, व्यवसायिक हितों के लिए विरासत से समझौता तो कर चुके हो लेकिन अभी और कितना गिरोगे...पचास साल बीत चुका है....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-1879505874153307374?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/1879505874153307374/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=1879505874153307374' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/1879505874153307374'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/1879505874153307374'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2011/02/50.html' title='50 साल बाद कहां पहुंचे...'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-ZBYyPBxWkG4/TVVZry2BxfI/AAAAAAAAAEI/Ot_h3epezrc/s72-c/GANGA+MAIYA.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-6193016783184433908</id><published>2011-01-21T14:49:00.000+05:30</published><updated>2011-01-21T14:49:53.639+05:30</updated><title type='text'>विश्व कप क्रिकेट टाइम टेबल</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;DATE TIME Match Details Venue &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Feb 19,2011 14:30 Bangladesh vs India D/N Mirpur &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Feb 20,2011 09:30 New Zealand vs Kenya Chennai &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Feb 20,2011 14:30 Sri Lanka vs Canada D/N Hambantota &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Feb 21,2011 14:30 Australia vs Zimbabwe D/N Ahmedabad &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Feb 22,2011 14:30 England vs Netherlands D/N Nagpur &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Feb 23,2011 14:30 Pakistan vs Kenya D/N Hambantota &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Feb 24,2011 14:30 South Africa vs West Indies D/N Delhi &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Feb 25,2011 09:30 Bangladesh vs Ireland Mirpur &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Feb 25,2011 14:30 Australia vs New Zealand D/N Nagpur &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Feb 26,2011 14:30 Pakistan vs Sri Lanka D/N Colombo &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Feb 27,2011 14:30 India vs England D/N Kolkata &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Feb 28,2011 09:30 Canada vs Zimbabwe Nagpur &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Feb 28,2011 14:30 West Indies vs Netherlands D/N Delhi &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 1,2011 14:30 Sri Lanka vs Kenya D/N Colombo &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 2,2011 14:30 England vs Ireland D/N Bangalore &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 3,2011 09:30 South Africa vs Netherlands Mohali &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 3,2011 14:30 Pakistan vs Canada D/N Colombo &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 4,2011 09:30 New Zealand vs Zimbabwe Ahmedabad &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 4,2011 14:30 Bangladesh vs West Indies D/N Mirpur &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 5,2011 14:30 Australia vs Sri Lanka D/N Colombo &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 6,2011 09:30 South Africa vs England Chennai &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 6,2011 14:30 India vs Ireland D/N Bangalore &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 7,2011 14:30 Canada vs Kenya D/N Delhi &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 8,2011 14:30 Pakistan vs New Zealand D/N Kandy &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 9,2011 14:30 India vs Netherlands D/N Delhi &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 10,2011 14:30 Sri Lanka vs Zimbabwe D/N Kandy &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 11,2011 09:30 West Indies vs Ireland Mohali &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 11, 2011 14:30 Bangladesh vs England D/N Chittagong &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 12,2011 14:30 India vs South Africa D/N Nagpur &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 13,2011 09:30 New Zealand vs Canada Mumbai &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 13,2011 14:30 Australia vs Kenya D/N Bangalore &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 14,2011 09:30 Bangladesh vs Netherlands Chittagong &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 14,2011 14:30 Pakistan vs Zimbabwe D/N Kandy &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 15,2011 14:30 South Africa vs Ireland D/N Kolkata &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 16, 2011 14:30 Australia vs Canada D/N Bangalore &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 17,2011 14:30 England vs West Indies D/N Chennai &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 18,2011 09:30 Ireland vs Netherlands Kolkata &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 18,2011 14:30 Sri Lanka vs New Zealand D/N Mumbai &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 19,2011 09:30 Bangladesh vs South Africa Mirpur &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 19,2011 14:30 Pakistan vs Australia D/N Colombo &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 20,2011 09:30 Zimbabwe vs Kenya Kolkata &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 20,2011 14:30 India vs West Indies D/N Chennai &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 23,2011 14:30 1st Quarter Final D/N Mirpur &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 24,2011 14:30 2nd Quarter Final D/N Colombo &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 25,2011 14:30 3rd Quarter Final D/N Mirpur &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 26,2011 14:30 4th Quarter Final D/N Ahmedabad &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 29,2011 14:30 1st Semi Final D/N Colombo &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mar 30,2011 14:30 2nd Semi Final D/N Mohali &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Apr 2,2011 14:30 Final D/N Mumbai &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-6193016783184433908?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/6193016783184433908/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=6193016783184433908' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/6193016783184433908'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/6193016783184433908'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2011/01/blog-post_21.html' title='विश्व कप क्रिकेट टाइम टेबल'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-712197148628755487</id><published>2011-01-17T21:47:00.002+05:30</published><updated>2011-11-24T19:18:41.123+05:30</updated><title type='text'>जगत जननी की जन्मकथा</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;भगवान राम के जन्म को लेकर आपने कई जगह पढ़ा होगा, सुना होगा, धारावाहिकों में देखा भी होगा । लेकिन सीता के जन्म को लेकर बहुत कम लोग वाकिफ होंगे। कुछ लोग जनकपुर सुनकर ही लौट आए होंगे कुछ कहानी में घुसे होंगे तो&amp;nbsp;सीतामढ़ी से आगे नहीं बढ़े होंगे। (रिसर्च और दिलचस्पी रखने वालों को छोड़कर)। अभी दफ्तर में कल ही चर्चा हो रही थी, तो हमारे एक वरिष्ठ हैं शिवेंद्र जी, उनको और कुछ और मित्रों को मान्यताओं पर आधारित सीता जन्म की कहानी सुना रहा था। इसिलिए प्रसंगवश लगा कि इसे सार्वजनिक किया जा सकता है। वैसे कहानी में शिवेंद्र जी ने ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली और इस कहानी को उन्होंने सन्नाटे में निपटवाते हुए संपन्न करवा दिया। खैर,&amp;nbsp; मान्यताओं पर आधारित कहानी का जिक्र कर देता हूं.. &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;सुनाया जाता है&lt;/strong&gt; कि उस युग में राजा जनक के राज में भारी अकाल पड़ा था। प्रजा परेशानी में जी रही थी। अकाल से निपटने के लिए पूजा-पाठ का दौर लगातार चल रहा था। पूजा- पाठ के दौरान ही एक दिन भविष्यवाणी हुई कि “राजा अकेले जहां कभी खेती नहीं हुई है वहां की बंजर भूमि पर हल चलाएंगे तो जनकपुर का भला होगा”। भविष्यवाणी में इस बात का भी जिक्र किया गया कि भगवान शंकर के जिस हल से राजा बंजर जमीन को जोतेंगे वो हल जनकपुर से दक्षिण-पश्चिम दिशा के जंगलों में मिलेगा। खैर भविष्यवाणी के बाद प्रजा का दबाव&amp;nbsp; बढ़ा और सुख- समृद्धि के लिए राजा बंजर जमीन जोतने की तैयारी में जुटे। &lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;जनकपुर &lt;/strong&gt;बड़ा राज्य हुआ करता था लिहाजा उस जगह की तलाश होने लगी जहां कि जमीन बिल्कुल ही बंजर थी। भविष्यवाणी में ये कहा गया था कि जनकपुर से दक्षिण-पश्चिम दिशा के जंगल में ही हल मिलेगा, लिहाजा उसी इलाके में बंजर भूमि की खोज हो रही थी। खोज खत्म हुई। भविष्यवाणी में जिस हल का जिक्र किया गया था वो हल मिला। बंजर जमीन जोतने के लिए जिस जगह की खोज हुई वो जगह आज के सीतामढ़ी शहर से पांच किलोमीटर पश्चिम में पड़ता है। कथा के मुताबिक इस जमीन के पश्चिम में तब घनघोर जंगल हुआ करता था।&lt;/div&gt;﻿﻿ &lt;br /&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: right; margin-left: 1em; text-align: right;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TTRkA0D0ynI/AAAAAAAAADs/xP6gA90wOZk/s1600/janki+stahn.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="238px" n4="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TTRkA0D0ynI/AAAAAAAAADs/xP6gA90wOZk/s320/janki+stahn.jpg" width="320px" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;सीतामढ़ी में जानकी स्थान&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;﻿﻿ &lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;﻿&lt;strong&gt;भविष्यवाणी &lt;/strong&gt;के मुताबिक मिले आदेश को देखते हुए राजा रथ पर सवार होकर अपने राज की भलाई के लिए सिर्फ सारथी को लेकर उस जगह की ओर निकल पड़े। फिर तत्कालीन सीतामढ़ी शहर से पांच किलोमीटर पश्चिम जिसे आज पुनौरा कहा जाता है वहां की बंजर भूमि पर हल चलाना शुरू किया। हल चलाने के दौरान जमीन में गड़ा एक घड़ा हल से टकराया। मान्यताओं के मुताबिक तभी मौसम एकदम बदल गया। घड़ा और हल की टक्कर के बाद घड़ा फूट गया और घड़े से बच्चे के रोने की आवाज आई। राजा ने हल चलाना छोड़ दिया । फूट चुके घड़े से निकली बच्ची को गोद में उठाया और आसमान में बदलते मौसम को देखते हुए तुरंत जनकपुर लौटने का फैसला किया। राजा बच्ची को लेकर रथ की ओर बढ़े, सारथी तैयार बैठा था और राजा के रथ पर सवार होते ही सारथी जनकपुर की तरफ बढ़ चला। लेकिन चार किलोमीटर की ही यात्रा हुई थी कि बदलते मौसम ने अपना असर दिखाना शुरू किया। बारिश की प्रबल संभावना देख राजा जनक ने सारथी को सुरक्षित ठिकाने की तरफ रथ को बढ़ाने का आदेश दिया। राजा जिस इलाके से आए थे वहां की भूमि बंजर थी, पीछे जंगल था और राजा जिस इलाके से बढ़ रहे थे वहां आसपास कोई बस्ती भी नहीं थी। हालांकि कुछ और आगे बढ़ने के बाद जहां राजा का रथ पहुंचा था वहां परवल की खेती हुई थी। जिसे देख राजा ने तुरंत सारथी से कहा कि यहां खेती हुई है मतलब आसपास कोई बस्ती जरूर होगी। काफी खोजने के बाद सारथी को बस्ती तो नहीं मिला लेकिन फसल की देखभाल के लिए एक किसान ने झोपड़ी बना रखी थी, वो जरूर दिखा। तभी तेज बारिश होने लगी। राजा रथ छोड़कर पैदल ही बच्ची को गोद में लिए उस झोपड़ी में जा छिपे। मूसलाधार बारिश जब थमी तब जाकर कहीं राजा घर के लिए प्रस्थान कर पाए। मान्यताओं के मुताबिक तब जनकपुर में अजब खुशी का माहौल था। बारिश होने के बाद लोग खुश थे। &lt;/div&gt;﻿ &lt;br /&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: left; margin-right: 1em; text-align: left;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TTRk0jUFAeI/AAAAAAAAADw/W_EUHdY1eqU/s1600/janakpur.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="263px" n4="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TTRk0jUFAeI/AAAAAAAAADw/W_EUHdY1eqU/s400/janakpur.jpg" width="400px" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;जनकपुर में जानकी मंदिर&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;﻿ &lt;strong&gt;राजा&lt;/strong&gt; बच्ची के साथ जनकपुर पहुंचे तो मिथिला की राजधानी में खुशी और दोगुनी हो गई। महल पहुंचने के बाद राजा ने पत्नी सुनयना सहित सभी शुभचिंतकों से पूरी घटना का जिक्र किया। पंडित बुलाए गए... नामाकरण की प्रक्रिया शुरू हुई, मामला राजा के परिवार का था लिहाजा तरह-तरह के नाम सुझाए जाने लगे। किसी ने सीता रखा तो किसी ने मैथिली, किसी ने जानकी नाम दिया तो किसी ने भूमिपुत्री रखा। हर नाम के मायने थे। सीता नाम इसलिए रखा गया कि संस्कृत में &lt;strong&gt;हल को सीत&lt;/strong&gt; कहा जाता है। इनका जन्म भी हल के नोंक से हुआ लिहाजा नाम पड़ा सीता, मिथिला की राजा की पहली बेटी थीं लिहाजा मैथिली कहीं गईं। पिता का नाम जनक इसलिए जानकी और जमीन से जन्मी इसलिए भूमिपुत्री। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: #990000;"&gt;(उपरोक्त लेख मान्यताओं पर आधारित है)&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;﻿﻿﻿ &lt;br /&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: right; margin-left: 1em; text-align: right;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TTRlHU_hMuI/AAAAAAAAAD0/dFQXS9l6jSs/s1600/punaura.bmp" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="226px" n4="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TTRlHU_hMuI/AAAAAAAAAD0/dFQXS9l6jSs/s320/punaura.bmp" width="320px" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;पुनौरा में सीता जन्म स्थान&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;﻿﻿﻿&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अब&lt;/strong&gt; कहानी के कुछ पहलुओं को जानिए- जिस जंगल से राजा को भगवान शंकर का हल मिला अब वहां जंगल नहीं है। उस जगह का नाम आज शिवहर है जो बिहार में पड़ता है। शिव-हल की वजह से इस जगह का नाम शिवहल से होते होते शिवहर हो गया। राजा ने जिस जगह पर जमीन जोते थे&amp;nbsp;वो&amp;nbsp; जगह आज पुनौरा के नाम से जाना जाता है। आज भी वहां&amp;nbsp; पौराणिक स्मृतियां मौजूद हैं।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;(मान्यताओं के मुताबिक)।&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;जिस जगह &lt;strong&gt;परवल&lt;/strong&gt; की खेती हो रही थी और जिस झोपड़ी में राजा जनक सीता को लेकर बारिश से बचने के लिए छिपे थे, उस जगह आज विशाल जानकी मंदिर है जहां देश प्रदेश से लोग रोज दर्शन के लिए पहुंचते हैं। परवल की खेती वाला इलाका खूबसूरत शहर &lt;strong&gt;सीतामढ़ी&lt;/strong&gt; हो चुका है जो बिहार में पड़ता है। और मिथिला की राजधानी जनकपुर आज नेपाल में है। &lt;/div&gt;﻿﻿﻿﻿﻿﻿﻿ &lt;br /&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: left; margin-right: 1em; text-align: left;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TTRncEw47jI/AAAAAAAAAD8/NLSHAz2hAzA/s1600/jankapur+rail.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="130px" n4="true" src="http://1.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TTRncEw47jI/AAAAAAAAAD8/NLSHAz2hAzA/s200/jankapur+rail.jpg" width="200px" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;नेपाल रेल की दुर्लभ तस्वीरें-जनकपुर में&lt;/span&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;﻿﻿﻿﻿﻿﻿﻿ &lt;strong&gt;नेपाल &lt;/strong&gt;में एक मात्र जगह जनकपुर ही है जहां रेल की सुविधा है। जनकपुर से कुछ दूर बाद उत्तर में पहाड़ शुरू हो जाता है। जनकपुर में एयरपोर्ट भी है। भारत से जनकपुर जाने के कुल तीन रास्ते हैं। मधुबनी के जयनगर से रेलमार्ग। सीतामढ़ी के भिट्ठामोड़ से बस सेवा। और मधुबनी के उमगांउ से बस सेवा। सीतामढ़ी आप पटना से सीधे बस से पहुंच सकते हैं। मुजफ्फरपुर से भी सीतामढ़ी&amp;nbsp;बस से पहुंच सकते हैं&amp;nbsp;, दूरी 55 किलोमीटर। सीतामढ़ी से जनकपुर की दूरी 60 किलोमीटर के आसपास है।&lt;br /&gt;&lt;em&gt;वैसे जानकारी के लिए ये भी बता दूं कि तमिल भाषा के रामायण में सीता को रावण की बेटी बताया गया है। मंदोद्री को सीता की मां। ये कहा गया है कि सीता के जन्म के साथ ही उनकी शक्ति और राक्षस कुल के लिए खतरे की जानकारी मिलने पर रावण को बिना बताये मंद्रोदी ने सीता को नदी में बहवाया दिया था। जो बहते-बहते राजा जनक के राज में पहुंची और फिर नदी किनारे पूजा करते वक्त उन्हें मिली।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;(स्रोतों पर आधारित)&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;अगली बार जनकपुर की विस्तार से चर्चा&lt;/span&gt; &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-712197148628755487?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/712197148628755487/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=712197148628755487' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/712197148628755487'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/712197148628755487'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='जगत जननी की जन्मकथा'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TTRkA0D0ynI/AAAAAAAAADs/xP6gA90wOZk/s72-c/janki+stahn.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-1136880314672060293</id><published>2011-01-04T20:02:00.001+05:30</published><updated>2011-01-04T20:08:48.812+05:30</updated><title type='text'>कार और पहाड़ में नया साल 2011</title><content type='html'>﻿﻿﻿ &lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: left; margin-right: 1em; text-align: left;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TSMvoiKdJTI/AAAAAAAAADg/XSBxckCsYno/s1600/36268_10150150682014018_686679017_8131978_6977885_n.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="240" n4="true" src="http://1.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TSMvoiKdJTI/AAAAAAAAADg/XSBxckCsYno/s320/36268_10150150682014018_686679017_8131978_6977885_n.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;शिमला में 1 जनवरी को बर्फबारी&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;﻿﻿﻿ &lt;strong&gt;न&lt;/strong&gt;ए साल में शिमला की यात्रा। पत्रकारिता के क्षेत्र में आने के बाद कहीं की यात्रा का ये मेरा पहला अनुभव था। करीब एक महीने से तैयारी चल रही थी। जाने को सब तैयार थे लेकिन कहां जाना है इसको लेकर असमंजस जाने-जाने के दिन तक रहा। वैसे छुट्टी मिलेगी या नहीं, मिलेगी तो सब को मिलेगी या नहीं इसको लेकर भी तस्वीर साफ नहीं हो पा रही थी। हालांकि जब मन बन गया और वरिष्ठों से राय लेने के बाद जगह की तस्वीर साफ हुई तो कैसे जाया जाए, इसको लेकर मामला फंस गया। हालांकि जल्द ही इसका भी तोड़ निकाला गया । इसके बाद एक दिन का ऑफ और एक दिन पुराना बाकी वाला ऑफ मिलाकर दो दिन की छुट्टी का समय निकला। तय समय से एक घंटे की देरी से हमलोग 31 दिसंबर की सुबह 7 बजे नाहन के लिए प्रस्थान किए। करीब 6-7 घंटे की यात्रा करने के बाद भी नाहन के रास्ते में पहाड़ की बात तो दूर नाहन का बोर्ड तक नहीं दिख रहा था। ऊपर से अंबाला में एक हाई-फाई चाय दुकान के मालिक से पूछा तो कहा कि नाहन कहां है ये पता नहीं। &lt;em&gt;(लौटते वक्त ड्राइवर ने बताया कि चाय दुकानदार साउथ इंडियन है लिहाजा उसे यहां की भौगोलिक स्थिति की जानकारी नहीं है) &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शंका&lt;/strong&gt; हो रही थी कि कहीं गलत रास्ते पर तो नहीं जा रहे हैं ? किलोमीटर का बिल तो नहीं बढ़ रहा है ?कुछ कर भी नहीं सकते थे, सिवाए ड्राइवर के किसी को कोई जानकारी नहीं थी इस रूट की। खैर 2.15 बजे नाहन का बोर्ड दिखा और फिर दस मिनट बाद पहाड़। राहत मिली की रास्ता गलत नहीं है। 17 किलोमीटर पहाड़ पर का सफर तय कर 3 बजे के आसपास पहुंच भी गए। सर्किट हाउस में ठहरने का इंतजाम था सो वहां सब मामला सेट हो गया। लेकिन&amp;nbsp;सबसे पहला झटका मित्रों को सर्किट हाउस में ही लगा जब वहां के केयर टेकर ने कहा कि यहां कुछ घूमने के लिए है ही नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;﻿﻿﻿ &lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: right; margin-left: 1em; text-align: right;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TSMwBpxtwoI/AAAAAAAAADk/rY13_E2yzyk/s1600/163600_10150150681409018_686679017_8131954_7609748_n.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="240" n4="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TSMwBpxtwoI/AAAAAAAAADk/rY13_E2yzyk/s320/163600_10150150681409018_686679017_8131954_7609748_n.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;strong&gt;नाहन से शिमला के रास्ते में खूबसूरत नजारा&lt;/strong&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;﻿﻿﻿ &lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;वैसे&lt;/strong&gt; मुझे भी लगा था कि कुछ तो देखने को मिलेगा, लेकिन मेरे सभी साथियों को नाहन को लेकर ज्यादा उम्मीद थी। मामला यहीं फेल हो गया, ऊपर से बाजार में कार लेकर पता करने निकले तो ऐसा लग रहा था जैसे पूरे नाहन में सिर्फ हम लोग ही थे जो घूमने आए थे। खैर मामला गड़बड़ा गया था। रश्मि कुछ ज्यादा ही दुखी हो गई थी, हम सब में से सबसे ज्यादा रश्मि ही थी जो यात्रा को लेकर उत्साहित&amp;nbsp;थी। होटल में खाना खाते वक्त मुझे लगा कि कुछ तो करना होगा नहीं तो पैसा बेकार हो जाएगा। इतना खर्च हुआ तो नहीं कुछ और सही। तय कर लिया कि कल शिमला की तरफ जाएंगे। हालांकि किसी को बताया नहीं। नाहन में जो कुछ भी था देखने के लिए, वैसे था तो कुछ भी नहीं, लेकिन रानीताल, माल रोड, राजा का किला टाइप जो कुछ भी था सब घूम-घाम लिए।&amp;nbsp;रात को सर्किट हाउस की तरफ लौट रहे थे&amp;nbsp;तो&amp;nbsp;हुआ कि कुछ खरीदा जाए। एक कपड़े की दुकान में गये और सब लोगों ने स्वेटर, जैकेट टाइप आइटम खरीदे।सर्किट हाउस लौटने के बाद सब ने मान की बात रखी, सब मन मसोस-मसोस कर बोल रहे थे। बिना वक्त जाया किए फैसला हो गया कि कल शिमला जाएंगे, लेकिन कल दो बजे ही यानी 1 जनवरी को 2 बजे तक शिमला छोड़ देंगे ताकि रात तक घर पहुंच जाए और सुबह समय से दफ्तर।&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;नए&lt;/strong&gt; साल की सुबह सुबह 6 बजे हम चारों शिमला यात्रा के लिए निकल पड़े। रास्ते में पहाड़ी रास्ते का आनंद लेते हुए 11.30 बजे हमारी गाड़ी शिमला पहुंची ।&amp;nbsp;जनता कुफरी जाने की जिद करने लगी। भावनाओं का सम्मान करते हुए हमलोग कुफरी की तरफ बढ़े। &amp;nbsp;रास्ते में बर्फबारी के दर्शन हुए और फिर शिमला आना सफल&amp;nbsp;हो गया। डेडलाइड 2 बजे की ही थी कि 2 बजे लौटना भी है। हालांकि खाना खाने और गाड़ी पार्किंग के चक्कर में देर हुई लेकिन माल रोड, मिडल बाजार, लोअर बाजार टाइप जगह घूम घाम के 4 बजे से पहले फ्री हो गए। इस दौरान टॉयलेट खोजने के लिए 15 मिनट का समय बर्बाद हुआ। माल रोड से वापस पार्किग की तरफ लौटने में रास्ता भूले तो उसमें भी कुछ वक्त गया। बंडी, जूता, टोपी तीन चीजों की खरीदारी भी हुई। और 3 बजकर 56 मिनट पर सब लोग गाड़ी में बैठकर दिल्ली के लिए निकल पड़े। सोच रखे थे कि दिन-दिन में पहाड़ी रास्ता काट लेंगे। लेकिन रास्ते में परमाणु के पास 1 घंटा जाम में फंस गए। 1 घंटा लगभग रात को खाने में लगा। लौटने के दौरान 2 जगह चाय पी गई। और इस प्रकार रात 2 बजे के करीब दिल्ली में दाखिल हुए। हिसाब किताब करते और सब को छोड़ते हुए 3.30 बजे के करीब घर पहुंचे।&amp;nbsp;और ऐसे&amp;nbsp;साल का पहला दिन कार और पहाड़ में बीत गया। 2010 का आखिर दिन जितना उत्साह से शुरू हुआ था उतने उत्साह से खत्म नहीं हुआ लेकिन 2011 का पहला दिन उत्साह से शुरू हुआ और फिर उत्साह के थकान से खत्म भी। &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TSMwXttaNxI/AAAAAAAAADo/okm97M5iQ4Q/s1600/168630_10150150682894018_686679017_8131999_4137759_n.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="300" n4="true" src="http://2.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TSMwXttaNxI/AAAAAAAAADo/okm97M5iQ4Q/s400/168630_10150150682894018_686679017_8131999_4137759_n.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;अभिनित, रश्मि और यश ने यात्रा का आनंद तो लिया ही मैंने भी जमाने बाद कहीं की यात्रा की सो पूरा आनंद लिया। कुछ भी कहिए मजा आया, समय होता और और आता। बस निप्पू को सबने मिस किया। निप्पू क्यों नहीं गया इसके कारण का जो खुलासा उसने किया किसी को नहीं बता सकता। बेहतर होगा तुम तीनों में से कोई मुझसे या उससे पूछेगा भी नहीं। समय आने पर बता दूंगा। वैसे निप्पू ने कहा था कि मेरे लिए कुछ लेते आइएगा, लेकिन किसी ने कुछ लिया नहीं। मैं भी भूल गया। सॉरी निप्पू। अगली बार...साथ चलेंगे तो हिसाब बराबर करेंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-1136880314672060293?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/1136880314672060293/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=1136880314672060293' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/1136880314672060293'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/1136880314672060293'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2011/01/2011.html' title='कार और पहाड़ में नया साल 2011'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TSMvoiKdJTI/AAAAAAAAADg/XSBxckCsYno/s72-c/36268_10150150682014018_686679017_8131978_6977885_n.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-5242338050612405076</id><published>2010-12-22T15:17:00.001+05:30</published><updated>2010-12-23T21:16:48.638+05:30</updated><title type='text'>तेरी कमी तो खलती रहेगी...</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TRNuqJlbQ0I/AAAAAAAAADY/xWu0fqDIdu4/s1600/manojkkkkkkk.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="267" n4="true" src="http://1.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TRNuqJlbQ0I/AAAAAAAAADY/xWu0fqDIdu4/s400/manojkkkkkkk.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;﻿ &lt;br /&gt;﻿﻿﻿﻿ &lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;/div&gt;﻿﻿﻿﻿ ﻿&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;ये जो तस्वीर है अपने आप में एक न्यूज चैनल है। निप्पू ने जो कहा है कि ये टीम जिस काम को भी ले लें इनसे बेहतर आउटपुट कोई दे नहीं सकता। इससे मैं भी इत्तेफाक रखता हूं। पहले ये सब लोग एक साथ एक जगह पर काम करते थे। लेकिन अब लोग एक दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। पहले निखिल जी गए, अब निप्पू और यश । कल कोई और जाएगा। कहने का मतलब ये कि ये एक सिलसिला है जो अनंत काल तक चलता रहेगा। ऐसा नहीं कि इस टीम से बेहतर टीम इंडस्ट्री में नहीं है या नहीं होगी। लेकिन अभिनित और रश्मि, जो की इन तस्वीरों में नहीं हैं उनको शामिल करके देखें तो अपने आप में एक संपूर्ण व्यवस्था है। ऊपर खाली टोपी पहनाने के लिए एक चाहिए, बाकी सब फिट है। ये तो भूमिका बांध रहा हूं, जो लगता है ज्यादा हो गया। &lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;खैर लिखना ये चाह रह हूं कि&lt;/strong&gt; निप्पू और यश अब पुरानी कंपनी के लिए अतीत के अंग हो गये। स्वभाविक प्रक्रिया है कि कोई करीबी जब आपसे दूर जाता है तो आपको दुख होता है। जिसके साथ आप चौबीस घंटे में से 10 घंटे रोज बीताते हो वो अगर आपसे दूर होता है तो दुख होगा ही। उसमें भी निप्पू और यश जैसे सहयोगी और करीबी हो तो मामला कुछ ज्यादा करीब का हो जाता है। कोई खानदानी परिचय तो था नहीं, यहीं आकर इनसे जान पहचान हुई, जाने बुझे तो संबंध बेहतर बना और फिर एक सिलसिला चल पड़ा। कभी दोनों से व्यक्तिगत शिकायत नहीं रही मेरी, मैं कभी नाराज हुआ भी तो मुझसे ज्यादा तापमान इन लोगों का बढ़ जाता था। काम के दौरान निप्पू के बार-बार सिगरेट पीने को लेकर मेरी नाराजगी रहती थी, एक बार नाइट शिफ्ट थी उस दौरान तो सिगरेट को गोली मारिए, वो दो-दो घंटे किसी और चक्कर में लगा रहता था फोन पर, कई बार डांट खाया लेकिन अपनी आदत से बाज नहीं आया। एक बार तो मुझे महाशय को मनाने के लिए बड़ा जोर लगाना पड़ा था। मुझे कहता है कि आपको समझना बड़ा मुश्किल है, मैं आपको पौने चार साल में समझ नहीं पाया। पर ये नहीं बताता कि क्या नहीं समझ पाया। निप्पू बार बार आरोप लगाता है कि आपका कौन अपना है कौन पराया ये आपको आज तक पता नहीं चला। निप्पू, मेरे दोस्त क्या करना जानकर, कौन अपना है कौन पराया। तुम अपने हो ये काफी है। वैसे एक बात साफ कर दूं नहीं तो नाराजगी तो तय है। निप्पू और यश दोनों व्यक्तिगत रूप से मेरे काफी करीबी हैं। मैं ये मानता हूं उन लोगों का नहीं पता। प्रोफेशनल रूप से एक को अपना दायां हाथ मानता था तो दूसरे को बायां। बाकी बाद में। वैसे निप्पू दिखने में जितना भोला लगता है उतना है नहीं। मुझे पता है इस लाइन पर बवाल तय है। &lt;strong&gt;अबे मजाक कर रहा हूं ...।&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;दफ्तर में ये दोनों काम करने के मामले में भूत हैं। वक्त की जरूरत कहिये या फिर किस्मत का कनेक्शन, पहले टर्म में साथ काम करने का इतना ही वक्त तय हुआ था सो अच्छी जिंदगी की तलाश में दोनों जा रहे हैं। क्या पता कल मुझे भी कहीं जाना पड़े। यशजी तो गाय हैं। बर्दाश्त करते हैं तो खूब करते हैं उखड़ते हैं तो पता नहीं कब किसको क्या कर (बोल) दें। वैसे दोनों उन बेटियां की तरह हैं,&amp;nbsp;जो जिस घर में जाएंगे उनको संवार देंगे,&amp;nbsp; बशर्तें भरोसा करके देखना होगा। यहां के लोगों को समझ में नहीं आया ये यहां का दुर्भाग्य है लेकिन कुछ महापुरुषों ने ये जो कहा है कि इतने पैसे में लड़के तैयार हैं किसी के जाने आने से फर्क नहीं पड़ता, ऐसे लोगों का अपना दुर्भाग्य हैं जिनका भगवान मालिक है। अभी देखिए एक खेल हो गया, कल ये तय हुआ था कि दोनों को भव्य विदाई दी जाएगी। इंतजाम बाकी लोग करेंगे। अभी ये जानकारी मिली कि दोनों में से एक इधर के लोगों के लिए ही इंतजाम में लगा है। अद्भूत है...&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-5242338050612405076?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/5242338050612405076/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=5242338050612405076' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/5242338050612405076'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/5242338050612405076'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/12/blog-post_22.html' title='तेरी कमी तो खलती रहेगी...'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TRNuqJlbQ0I/AAAAAAAAADY/xWu0fqDIdu4/s72-c/manojkkkkkkk.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-4204301198966115037</id><published>2010-12-20T21:53:00.000+05:30</published><updated>2010-12-20T21:53:30.825+05:30</updated><title type='text'>आतंकवाद पर नया नजरिया</title><content type='html'>﻿﻿﻿﻿ &lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;/div&gt;﻿﻿﻿﻿﻿﻿ &lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: left; margin-right: 1em; text-align: left;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TQ-CToz5aQI/AAAAAAAAADI/yN1Y4L4RWq4/s1600/manmohan-sonia-rahul.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="190" n4="true" src="http://4.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TQ-CToz5aQI/AAAAAAAAADI/yN1Y4L4RWq4/s320/manmohan-sonia-rahul.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;अपुन सियासत के लिए कुछ भी बोलेगा...&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;﻿﻿ &lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;आतंकवाद&lt;/strong&gt; को लेकर देश में इस वक्त बहस छिड़ी हुई है। अब तक आतंकवाद को जाति, धर्म, संप्रदाय वगैरह-वगैरह के चश्मे से देखने से देश का प्रबुद्ध समाज बचता रहा था। जानते सब थे लेकिन खुली जुबान में बोलने और लिखने से परहेज करते थे। &lt;strong&gt;‘आतंक का कोई धर्म नहीं होता’&lt;/strong&gt; इस जुमले में अब से पहले शायद राजनीति करने वाले हर दल के लोग यकीन करते थे। लेकिन अमेरिका की नाक में दम कर रखने वाले विकीलीक्स वेबसाइट ने बीते 17 दिसंबर को जो खुलासे किए उसने देश में आतंकवाद के लिए नए शब्द की रचना कर दी । भगवा आतंकवाद, हिंदू आतंकवाद, मुस्लिम आतंकवाद, सिख आतंकवाद और जितने भी नाम हो सकते हैं उन सब नामों को लेकर जो बातें दबी जुबान में ऑफ द रिकॉर्ड होती थी वो बातें विकीलीक्स के खुलासे के बाद ऑन रिकॉर्ड होने लगी। न्यूज चैनलों और अखबारों में आतंकवाद को आतंकवाद के नाम से ही लिखा या बोला जाता था लेकिन 17 दिसंबर को देश के सभी न्यूज चैनल से लेकर अगले दिन अखबारों तक ने मर्यादा की परिभाषा को लांघते हुए आतंकवाद शब्द को हिन्दुस्तान के पारंपरिक परिदृश्य से हटाकर दो धड़ों में बांट दिया। साफ-साफ लिखा गया ‘इस्लामिक आतंकवाद’ । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;﻿ &lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: right; margin-left: 1em; text-align: right;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TQ99elQsc0I/AAAAAAAAADA/jKYo7NVYwWs/s1600/mumbai_attack_5.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="200" n4="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TQ99elQsc0I/AAAAAAAAADA/jKYo7NVYwWs/s200/mumbai_attack_5.jpg" width="130" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;strong&gt;मुंबई पर हमला किसने किया?&lt;/strong&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;﻿ &lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;(आपको अगर याद हो तो याद कीजिए मुंबई पर हमले के वक्त किसी ने नहीं कहा कि ये इस्लामिक आतंकवाद है, दिल्ली ब्लास्ट के वक्त किसी ने नहीं कहा कि हमला मुसलमानों ने किया है, क्योंकि तब आतंक को धर्म के चश्मे से देखने की परंपरा शुरू नहीं की हुई थी, मीडिया ने शुरुआत भी की और कांग्रेस को और आगे बढ़कर कहने का मंच भी दिया।)&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;आगे बढ़िए, बात यही तक होती तो काम चल जाता लेकिन मामला देश के सबसे बड़े राजनीतिक घराने से जुड़ा था लिहाजा इस पर पानी डालने के बजाए कांग्रेस के लोगों ने आक्रमक होने की रणनीति पर अमल करना बेहतर समझा। 19 दिसंबर को कांग्रेस महाधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने आतंकवाद को जिन दो शब्दों में बांट कर रखा उसे देश ने इससे पहले न तो सुना था और ना ही किसी किताब में पढ़ा था। सोनिया के मुंह से निकले थे दो शब्द &lt;strong&gt;अल्पसंख्यक आतंकवाद और बहुसंख्यक आतंकवाद।&lt;/strong&gt; मतलब दूध की तरफ साफ है। अल्पसंख्यक आतंकवाद की जगह वो इस्लामिक आतंकवाद, मुस्लिम आतंकवाद और बहुसंख्यक आतंकवाद की जगह हिंदू आतंकवाद जैसे शब्द भी बोल सकती थी। लेकिन सियासत में डर हर किसी को लगता है। लिहाजा अपने पूरे भाषण के दौरान सोनिया ने इन दोनों शब्दों का दोबारा इस्तेमाल तो नहीं ही किया ना ही इसका वर्णन करना उचित समझा। इन दो शब्दों ने कांग्रेस की सियासी आक्रमकता के मतलब तो बताये ही ये भी साफ करने की कोशिश की गई कि राहुल गांधी ने पिछले साल अमेरिकी राजदूत से जो कुछ कहा उसके लिए सफाई की जगह देश को तेवर दिखाने की जरूरत है। सोनिया के बयान को समझने के लिए राहुल के उस बयान को जानना जरूरी है जो उन्होंने अमेरिकी राजदूत को कहा था। पिछले साल यानी 2009 के जुलाई महीने में अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भारत दौरे पर थीं, और पीएम के घर भोज के दौरान अमेरिका के राजदूत टिमोथी रोमर ने राहुल से सवाल किया कि &lt;strong&gt;“देश को लश्कर से कितना बड़ा खतरा है। जवाब में राहुल ने कहा कि देश को इस्लामिक आतंकवाद से ज्यादा हिंदू कट्टरपंथियों से खतरा है।"&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;﻿﻿ &lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: left; margin-right: 1em; text-align: left;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TQ9-0cbqq4I/AAAAAAAAADE/AcVBwEUl6Ko/s1600/rahul.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="195" n4="true" src="http://4.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TQ9-0cbqq4I/AAAAAAAAADE/AcVBwEUl6Ko/s320/rahul.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;अब क्यों चुप रह गए युवराज?&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;﻿﻿ &lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;संघ और उससे जुड़े संगठनों के खिलाफ राहुल बोलते रहे हैं, ये उनका अधिकार भी है और विचारधारा के स्तर पर इनके खिलाफ बोलना कर्तव्य भी। लेकिन जिस तरह के शब्दों का इस्तेमाल उन्होंने रोमर के सामने किया वाकई में देश को इसकी उम्मीद नहीं हो सकती थी। और शायद देश में कभी भी किसी जगह जाकर खुद इस तरह के शब्दों को बोलने की हिम्मत वो नहीं जुटा सकते थे। लेकिन पर्दे के पीछे हुई बातचीत विकीलीक्स के विस्फोट के बाद दुनिया के सामने हैं। और डैमेज कंट्रोल के लिए रुख को और ज्यादा आक्रमक बनाया जा रहा है। 19 दिसंबर को दिल्ली के अधिवेशन में सोनिया के साथ ही संघ और उससे जुड़े संगठनों के खिलाफ आक्रमक अंदाज में बोलने वाले कोई और था तो वो थे दिग्विजय सिंह। दिग्विजय सिंह ने तो न जाने क्या क्या कहा...लेकिन बारी जब राहुल गांधी की आई तो देश उनके मुंह से विकीलीक्स के दावे की सच्चाई जानना चाहता था पर राहुल विकास, संगठन और भ्रष्टाचार पर बोलकर चलते बने। जिस बहस की शुरुआत उन्होंने की उसको छूने तक की जरूरत या यूं कहिए हिम्मत नहीं जुटा पाए। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;एक बात जो समझ से परे नहीं है वो ये कि अगर विकीलीक्स का खुलासा नहीं होता तो शायद इस वक्त कमजोर हो चुके विपक्ष पर एक साथ कांग्रेस का पूरा कुनबा वार नहीं करता और देश में आतंकवाद की परिभाषा को लेकर बहस नहीं शुरू हुई होती। बहस की शुरुआत इसलिए ही हुई कि कांग्रेस के युवराज ने दुनिया के मंच पर देश के बहुसंख्यक समुदाय की छवि को आतंक से सीधे सीधे जोड़ दिया। संघ का आतंक से रिश्ता है या नहीं ये मामला सियासत के लिए सही हो सकता है। लेकिन हिन्दुस्तान को लश्कर, जैश, हूजी, आईएम की जगह हिंदू कट्टरपंथ से ज्यादा खतरा है ये कहना आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को दुनिया के मंच पर कमजोर करने की दिशा में दिया गया बयान ही माना जाएगा। क्योंकि देश क्योंकि देश 26/11 के कसाब से लेकर मुंबई सीरियल ट्रेन ब्लास्ट, दिल्ली सीरियल ब्लास्ट, जयपुर ब्लास्ट, अहमदाबाद ब्लास्ट, संसद हमला, लाल किला हमला और न जाने कितने हमलों की तारीख भले ही भूल गया है दर्द को नहीं भूला पाया है। और विकीलीक्स का दावा इसी दर्द पर मरहम नहीं नमक के समान है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-4204301198966115037?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/4204301198966115037/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=4204301198966115037' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/4204301198966115037'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/4204301198966115037'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/12/blog-post_20.html' title='आतंकवाद पर नया नजरिया'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TQ-CToz5aQI/AAAAAAAAADI/yN1Y4L4RWq4/s72-c/manmohan-sonia-rahul.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-3852988248928793048</id><published>2010-12-11T21:37:00.006+05:30</published><updated>2010-12-13T21:46:05.466+05:30</updated><title type='text'>बिहार के बाहुबलियों का हाल जानिए...</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TQOlbnrWLSI/AAAAAAAAACg/iGo1XzdXXa4/s1600/bahubali.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 230px; height: 93px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TQOlbnrWLSI/AAAAAAAAACg/iGo1XzdXXa4/s320/bahubali.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5549461059776425250" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;इस साल विकास के नाम पर बिहार के लोगों ने जो जनमत दिया उसमें नीतीश के बाहुबलियों की बल्ले बल्ले रही। जेडीयू और बीजेपी के सभी बाहुबली जीतकर विधानसभा पहुंचे। लेकिन दूसरी पार्टियों के बाहुबली धरती पकड़ लिए। एक भी जो कोई जीत&lt;br /&gt;पाता। नामी-नामी दिग्गज बाहुबली जो नीतीश के खिलाफ खड़े थे सब के सब हवा हो गए। यहां तक के अपने न लड़ के रिश्तेदारों को लड़वा रहे थे लेकिन उनको भी नहीं जीतवा पाए। चाहे एलजेपी के सूरजभान हो तब या फिर रामा सिंह। कांग्रेस के आनंद मोहन या फिर साधु यादव। जितने भी पुराने यदुवंशी बाहुबली क्षत्रप थे जो लालू की टिकट पर उतरे सब के सब हवा हो गए। लेकिन नीतीश की पार्टी से अनंत सिंह, सुनील पांडे, धूमल सिंह, लेसी सिंह, बीमा भारती, जगमातो देवी, गुड्डी चौधरी, अन्नू शुक्ला, गुलजार देवी, पूर्णिमा यादव, मीना द्विवेदी, सरफराज आलम, प्रभाकर चौधरी, अमरेंद्र पांडे, कौशल यादव, प्रदीप कुमार, बोगो सिंह, हो या फिर बीजेपी के टिकट पर उतरे चितरंजन सिंह, सतीश दूबे, अवनीश कुमार जैसे बाहुबली नेता या उनके रिश्तेदार, सब के सब जीत गए। उधर कांग्रेस के टिकट पर मैदान में ताल ठोकने वाली बाहुबली आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद, पप्पू यादव की पत्नी रंजीता रंजन, लालू के साले साधु और सुभाष यादव, बाहबली अखिलेश सिंह की पत्नी अरुणा देवी, बाहुबली आदित्य सिंह की बहू नीतू कुमारी या फिर एलजेपी के टिकट पर ताल ठोंकने वाली बाहुबली ललन सिंह(सूरजभान के करीबी) की पत्नी सोनम देवी, सूरजभान के बहनोई रमेश कुमार सब हार गए। &lt;br /&gt;       अब थोड़ा इनके जीत हार का अंतर भी देख लीजिए जिस आनंद मोहन ने साल 1995 में अपनी पार्टी बनाकर पूरे बिहार में उम्मीदवार खड़े किए थे, तब झारखंड भी साथ था। उस आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद को आलम नगर में मात्र 22 हजार वोट मिले, जबकि जानते हैं जीतने वाले उम्मीदवार जेडीयू के नरेंद्र यादव को 64 हजार वोट मिले। आगे बढ़े उससे पहले लवली के बारे में थोड़ा अपडेट करते चलें आपको, लवली की सियासी पारी तब शुरू हुई जब 1994 में वैशाली लोकसभा सीट के लिए उपचुनाव हो रहा था। आनंद मोहन ने लवली को पहली बार पार्टी फोरम पर लाकर चुनाव लड़ाने का एलान किया। इस चुनाव में राजपूत-भूमिहार बहुल वैशाली सीट पर इन दोनों जाति के वोटरों ने विरोध की पुरानी परंपराओं को तोड़ते हुए लवली का साथ दिया। नतीजा हुआ कि लवली जीत गई। 1995 में आनंद मोहन ने बिहार की 324 सीटों पर उम्मीदवार खड़ा कर दिया। एक सीट छोड़ सब सीट हार गए। खुद लड़ रहे तीन सीटों से आनंद मोहन हार गए।  94-96 तक सांसद रहने के बाद लवली फिर कभी लोकसभा नहीं पहुंचीं। 96 में नवीनगर से उपचुनाव में विधायक बनीं। 2005 के फरवरी वाले चुनाव में बाढ़ से जेडीयू के टिकट पर विधायक बनीं थी। सवर्ण वोटों की सियासत करने वाले आनंद मोहन ने जब 1998 में लालू से हाथ मिलाया उसके बाद इनका मार्केट डाउन हुआ, और राजपूत नेता की जो प्रभावशाली छवि बनी थी वो खत्म होने लगी। फिलहाल कलेक्टर मर्डर केस में आनंद मोहन को फांसी की सजा मिली हुई है। पत्नी लवली के भरोसे सियासत में बने रहने की कोशिश कर रहे थे जिसको जनता ने नकार दिया।&lt;br /&gt;बड़ी चर्चा हुई थी रंजीता रंजन को लेकर, बाहुबली पप्पू यादव की पत्नी हैं। बिहारीगंज से लड़ने गई थी कांग्रेस के टिकट पर हार गई। वोट मिला 27 हजार। जीतने वाली रेणु कुमारी को मिला 79 हजार। रंजीता यहां तीन नंबर पर रहीं। अंतर देख लीजिए। रंजीता का भी थोड़ा छोटा परिचय कराते हुए आगे बढ़ते हैं,पप्पू यादव की पत्नी होने के साथ राजनीतिक परिचय ये है कि सहरसा से 2004 में एलजेपी के टिकट पर सांसद चुनी गई थी। 2009 में हार गई। पप्पू यादव अभी विधायक अजीत सरकार की हत्या के दोषी है सो जेल में हैं। पप्पू का राजनीतिक उदय 1990 में हुआ था जब वो सिंहेश्वर सीट से पहली बार जनता दल के टिकट पर एमएलए बने थे। आपराधिक छवि के पप्पू यादव पर लूट, हत्या,रंगदारी,अपहरण के दर्जनों केस हैं। &lt;br /&gt;राजनीतिक रूप से जागरूक कोई भी शख्स साधु यादव के नाम से तो अंजान नहीं ही होगा। लालू के साले होने के अलावा शायद कोई और परिचय पहले रहा होगा, अब ये है कि लालू के साथ नहीं हैं और कांग्रेस के टिकट पर गोपालगंज से चुनाव लड़ने गए थे। घर भी गोपालगंज ही पड़ता है। वोट कितना मिला जानिएगा तो हैरान रह जाइएगा। यहां से जीतने वाले सुभाष सिंह को मिला 58 हजार और इनको मिला कुल जमा 8 हजार 488 वोट। तीसरे नंबर पर रहे। अंतर देखते चलिएगा। इ भी बाहुबली थे अपने जमाने के। इनके एक दूसरे भाई जो अब लालू के साथ नहीं हैं। सुभाष यादव विक्रम से निर्दलीय लड़ने गए थे। 9994 वोट मिला इनको। लेकिन चौथे नंबर पर आ गए। वारसलीगंज में मुकाबला बाहुबलियों के बीच था। प्रदीप महतो के दाहिना हाथ प्रदीप कुमार के सामने थीं अखिलेश सिंह की पत्नी अरुणा देवी। प्रदीप जेडीयू के टिकट पर जीते लेकिन अरुणा को कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में 36953 वोट यानी प्रदीप से 5 हजार कम वोट मिले। बाहुबलियों के बीच ही मुकाबला मोकामा में भी था। जेडीयू के टिकट पर अनंत सिंह जीत गए। एलजेपी के टिकट पर ललन सिंह की पत्नी सोनम हार गईं। अनंत सिंह को 51 हजार और सोनम को 42 हजार वोट मिले। विभूतिपुर में बाहुबली सूरजभान अपने बहनोई रमेश कुमार को लाख कोशिशों के बाद भी नहीं जीतवा पाए। जेडीयू के जीते उम्मीदवार को यहां मिला 46 हजार वोट और रमेश कुमार को मिला 23 हजार। लेकिन दूसरे नंबर पर रहा सीपीआई का उम्मीदवार। रमेश को तीसरे नंबर से संतोष करना पड़ा। हिसुआ में आदित्य सिंह की बहू हो तब या फिर मधुबन में बाहुबली बबलू देव। कांग्रेस के टिकट पर इन लोगों की भी हार हुई। रामा सिंह का नाम तो सुने ही होइएगा। आधा दर्जन से ज्यादा राज्यों में इनके खिलाफ मामले बताये जाते हैं। वैसे कई साल से माननीय थे। लेकिन इस बार इनके सामने इनके पुराने परिचित अच्युतानंद सिंह आ गए। महनार में रामा सिंह का तंबू उखड़ गया और बीजेपी उम्मीदवार के हाथों 25 सौ वोट से हार गए। अब थोड़ा जीतने वाले बाहुबलियों का भी बायोडाटा देख लीजिए। तरारी में सुनील पांडे तीसरी बार विधायक बने। बतौर जेडीयू   उम्मीदवार इनको 42 हजार वोट मिले। जबकि आरजेडी को 34 हजार। यहां लेफ्ट के उ्म्मीदवार को जो 30 हजार वोट मिले वहीं उनकी जीत का रास्ता खोला। नहीं तो 34 और 30 जोड़के कुछ घटा भी दे तो मामला गोल था।  क्षेत्र बदलके धूमल सिंह इस बार गए एकमा, हारने वाले दूसरे नंबर के उम्मीदवार से दोगुना वोट मिला। धूमल सिंह को 55 हजार वोट मिले। यहां धूमल सिंह को छोड़कर बाकी सारे उम्मीदवारों के वोट को जोड़ दे न..तो भी धूमल सिंह को मिले वोट से कम है। बाहुबली बूटन सिंह जो अब इस दुनिया में नहीं हैं उनकी पत्नी लेसी सिंह इस बार भी जीती। अवधेश मंडल की पत्नी चुनाव से पहले पाला बदलकर नीतीश के साथ हो गई, किस्मत अच्छी रही और जीत गई। रूपौली में वैसे भी अवधेश मंडल की पत्नी बीमा भारती का मुकाबला बाहुबली शंकर सिंह से था। लेकिन शंकर सिंह को बतौर एलजेपी उम्मीदवार 27 हजार वोट मिले और बीमा भारती को 64 हजार। बाहुबली अजय सिंह की मां जगमातो देवी दरौंधा से,बाहुबली देवनाथ यादव की पत्नी गुलजार देवी फुलपरास से और बाहुबली राजेश चौधरी की पत्नी गुड्डी चौधरी रून्नी सैदपुर से जीतकर विधायक बन गई हैं। उधर बाहुबली देवेंद्र दूबे की भाभी मीना दूबे का मुकाबला बाहुबली राजन तिवारी के भाई राजू तिवारी से था। लेकिन एलजेपी के टिकट पर उतरे राजू तिवारी हार गए और जेडीयू की टिकट पर उतरी मीना गोविंदगंज की लड़ाई 8 हजार वोट से जीत गई। कुचाय कोट सीट से बाहुबली सतीश पांडे के भाई अमरेंद्र कुमार पांडे जीत गए और हार गए बाहुबली काली पांडे के भाई आदित्य  नारायण पांडे। जेडीयू के अमरेंद्र को 51 हजार और आरजेडी के आदित्य को 32 हजार वोट मिले।&lt;br /&gt;बाहुबली मुन्ना शुक्ला की पत्नी अन्नू शुक्ला पहली बार विधायक बनीं हैं। लालगंज में अन्नू शुक्ला को 58 हजार वोट मिले। लड़ाई में आरजेडी गठबंधन का उम्मीदवार नहीं था। दूसरे नंबर पर रहे राज कुमार साह जो कि निर्दलीय उम्मीदवार थे उनको 34हजार वोट मिले। अब थोड़ा अन्नू शुक्ला का परिचय भी जान लीजिए। सत्य और अहिंसा का पैगाम देने वाले महावीर और बुद्ध की धरती वैशाली की लालगंज सीट से बाहुबली मुन्ना शुक्ला की पत्नी अन्नू शुक्ला जीती हैं। राजनीतिक पहचान यही है कि मुन्ना शुक्ला की पत्नी हैं। विजय कुमार शुक्ला उर्फ मुन्ना शुक्ला को अपराध की दुनिया में पहचान विरासत में मिली है।  1999 में मुन्ना शुक्ला ने राजनीति में कदम बढ़ाया। उस वक्त लोकसभा चुनाव हो रहा था और मुन्ना शुक्ला ने जेल में रहकर मुजफ्फरपुर से चुनाव लड़ गये। उसी वक्त उनकी पत्नी अन्नू शुक्ला ने चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी। हालांकि स्वजातीय नेताओं के समर्थन के बाद भी मुन्ना शुक्ला कैप्टन जयनारायण निषाद को हरा नहीं सके थे। अगले ही साल 2000 में अपने पैतृक विधानसभा क्षेत्र लालगंज से निर्दलीय चुनाव लड़े और जीत गये। 2004 के लोकसभा चुनाव में वैशाली से निर्दलीय मैदान में उतरे लेकिन हार गये। इसके बाद 2005 में पहले लोजपा से फिर नवंबर 2005 में जेडीयू के टिकट पर चुनाव लड़कर विधायक बने। 2009 के लोकसभा चुनाव में वैशाली से पार्टी ने उम्मीदवार बनाया था लेकिन हार गए।  पूर्व मंत्री बृजबिहारी प्रसाद की हत्या के केस में सजा मिली है। सो जेल में बंद हैं।&lt;br /&gt;ये रहा बिहार के नामी बाहुबलियों(रिश्तेदारों)के जीत हार का रिपोर्ट कार्ड। सब नामों को समेटने का वक्त अभी नहीं मिल रहा। वक्त निकालकर जो नाम छूट गए हैं उनकी भी चर्चा करूंगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-3852988248928793048?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/3852988248928793048/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=3852988248928793048' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/3852988248928793048'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/3852988248928793048'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/12/blog-post_11.html' title='बिहार के बाहुबलियों का हाल जानिए...'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TQOlbnrWLSI/AAAAAAAAACg/iGo1XzdXXa4/s72-c/bahubali.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-5292597478477532505</id><published>2010-12-09T19:27:00.000+05:30</published><updated>2010-12-11T20:04:35.238+05:30</updated><title type='text'>नीतीश का 'न्याय' अभी आधा है...</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TQOKu1bBapI/AAAAAAAAACY/xEJ_qrWCvyQ/s1600/nitisk.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 274px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TQOKu1bBapI/AAAAAAAAACY/xEJ_qrWCvyQ/s320/nitisk.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5549431703069616786" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;नीतीश कुमार- मुख्यमंत्री (गृह, सामान्य प्रशासन)&lt;br /&gt;सुशील कुमार मोदी (उप मुख्यमंत्री, वित्त, वाणिज्य, पर्यावरण, वन)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जनता दल यूनाइटेड-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;विजय कुमार चौधरी (सरायरंजन)-  जल संसाधान &lt;br /&gt;विजेंद्र यादव- (सुपौल) ऊर्जा,संसदीय कार्य, उत्पाद &lt;br /&gt;नरेंद्र सिंह---कृषि मंत्री&lt;br /&gt;वृषण पटेल- (वैशाली)       परिवहन और सूचना जनसंपर्क&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नरेंद्र नारायण यादव-(आलमनगर) विधि, योजना विकास &lt;br /&gt;रेणु कुमारी-(बिहारीगंज)     उद्योग, आपदा प्रबंधन &lt;br /&gt;जीतन राम मांझी(मखदुमपुर)-   अनुसूचित जाति, जनजाति &lt;br /&gt;शाहिद अली खान(सुरसंड)   अल्पसंख्यक कल्याण, सूचना प्रौद्योगिकी &lt;br /&gt;दामोदर रावत(झाझा)-      भवन निर्माण &lt;br /&gt;हरिप्रसाद साह(लौकहा)-     पंचायती राज &lt;br /&gt;गौतम सिंह(मांझी)-       विज्ञान प्रौद्योगिकी &lt;br /&gt;नीतीश मिश्रा(झंझारपुर)-   ग्रामीण विकास &lt;br /&gt;पीके शाही-        मानव संसाधन&lt;br /&gt;श्याम रजक (फुलवारी)-  खाद्य आपूर्ति&lt;br /&gt;रमई राम-(बोचहां)   राजस्व और भूमि सुधार&lt;br /&gt;परवीन अमानुल्लाह- (साहेबपुर कमाल)समाज कल्याण&lt;br /&gt;भीम सिंह-       ग्रामीण कार्य विभाग&lt;br /&gt;अवधेश कुशवाहा(पीपरा)-   लघु सिंचाई &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बीजेपी के मंत्री---&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;नंद किशोर यादव(पटना साहिब)-  पथ निर्माण&lt;br /&gt;अश्विनी कुमार चौबे (भागलपुर)-स्वास्थ्य &lt;br /&gt;प्रेम कुमार (गया टाउन)-      शहरी विकास&lt;br /&gt;गिरिराज सिंह-    पशु एवं मत्स्य&lt;br /&gt;जनार्दन सिंह सिग्रीवाल(छपरा)- श्रम संसाधन&lt;br /&gt;चंद्र मोहन राय(चनपटिया)-   पीएचईडी&lt;br /&gt;सुखदा पांडे (बक्सर)-     कला संस्कृति, युवा&lt;br /&gt;एस एन आर्या (राजगीर)-   खान एवं भूतत्व&lt;br /&gt;रामाधार सिंह (औरंगाबाद)-   सहकारिता&lt;br /&gt;सुनील कुमार पिंटू (सीतामढ़ी)- पर्यटन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीजेपी कोटे से मंत्री बनने वाले ज्यादातर विधायक शहरी क्षेत्र से चुने गए हैं। चनपटिया और राजगीर का अपना महत्व है, नहीं तो बाकी सब जिला मुख्यालय वाले ही विधायक जी मंत्री बने हैं।&lt;br /&gt;और उसमें भी जानते चलिए कि बिहार में कुल 38 जिले हैं। 19 जिलों को ही अभी नीतीश के कुनबे में जगह मिली है। बाकी के 19 जिले के एनडीए विधायक फिलहाल 'बेरोजगार'हैं। कब तक रहेंगे ये मुझे नहीं पता।&lt;br /&gt;जिलेवार आंकड़ों पर गौर फरमाए तो&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जिला--------कुल सीट------एनडीए-----कितने मंत्री&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मधुबनी--------10--------7---------------2 &lt;br /&gt;मधेपुरा--------04--------3---------------2&lt;br /&gt;सीतामढ़ी------ 08--------8---------------2 &lt;br /&gt;छपरा---------10--------8---------------2  &lt;br /&gt;पटना --------14--------11--------------2 &lt;br /&gt;गया---------10--------09--------------1&lt;br /&gt;जहानाबाद-----3---------03--------------1&lt;br /&gt;बक्सर ------4---------04--------------1&lt;br /&gt;औरंगाबाद----- 6--------05--------------1&lt;br /&gt;सुपौल ----- -5--------05--------------1&lt;br /&gt;मोतिहारी---- 12--------11-------------1&lt;br /&gt;मुजफ्फरपुर-- 11--------10--------------1&lt;br /&gt;समस्तीपुर--- 10-------08--------------1&lt;br /&gt;बेतिया----- 09-------07---------------1&lt;br /&gt;वैशाली --- -08-------08---------------1&lt;br /&gt;बेगूसराय--- 07-------06---------------1&lt;br /&gt;भागलपुर--  07-------06---------------1&lt;br /&gt;नालंदा---  07--------06---------------1&lt;br /&gt;जमुई----  4--------03----------------1&lt;br /&gt;इसके अलावा बाकी के 19 जिलों का खाता फिलहाल खाली है। &lt;br /&gt;सीमांचल के इलाके में अररिया की कुल 6 में से 5 सीट एनडीए के पास है, पूर्णिया की 7 में से 6 सीट कटिहार में 7 में से 6 सीट लेकिन कोई मंत्री नहीं बना।&lt;br /&gt;दरभंगा 10 में से 8 सीट, गोपालगंज 6 में से 6 सीट, सीवान 8 में से 8 सीट, नवादा की 5 में से 5 सीट, मुंगेर की 3 में से 3 सीट, भोजपुर की 7 में से 5 सीट एनडीए के खाते में है लेकिन कोई मंत्री नहीं है।&lt;br /&gt;बाकी के बचे जिले के हालात भी मिलते जुलते हैं। सिर्फ किशनगंज जिला ऐसा है जहां एनडीए का खाता नहीं खुला 4 की सभी 4 सीट एनडीए हार गई।&lt;br /&gt;कुल मामला ये है कि जिन जिलों से एनडीए के 77 विधायक जीत कर आए हैं वहां से कोई मंत्री नहीं है। कुल 129 जीते विधायकों वाले जिले से 28 मंत्री बनाए गए हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-5292597478477532505?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/5292597478477532505/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=5292597478477532505' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/5292597478477532505'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/5292597478477532505'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/12/blog-post_09.html' title='नीतीश का &apos;न्याय&apos; अभी आधा है...'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TQOKu1bBapI/AAAAAAAAACY/xEJ_qrWCvyQ/s72-c/nitisk.jpg' height='72' 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थे। हिन्दुस्तान में ही लखनऊ, पटना, रांची होते हुए दिल्ली पहुंचे और अब एक बार फिर अखबार छोड़ टीवी की दुनिया में पटना पहुंच गए हैं। रमेश ने करियर की शुरुआत सहारा से की थी। लंबे समय तक सहारा अखबार के लिए रिपोर्टिंग करने वाले रमेश आईआईएमएसी के छात्र रहे हैं। 2004-2005 बैच के छात्र रहे रमेश शांत स्वभाव के गंभीर पत्रकार माने जाते हैं। रमेश के लिए टीवी का ये जिम्मेदारी वाला पहला बड़ा अनुभव है। रमेश बिहार के छपरा के रहने वाले है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-1516982431168280326?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/1516982431168280326/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=1516982431168280326' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/1516982431168280326'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/1516982431168280326'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/12/blog-post_08.html' title='रमेश की नई दुनिया'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TQBxVVv2ZII/AAAAAAAAACQ/NpUXjwFJIFo/s72-c/untitled.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-8780568943061424623</id><published>2010-12-05T20:57:00.000+05:30</published><updated>2010-12-07T18:47:58.578+05:30</updated><title type='text'>कांग्रेस का टाइम ही खराब है...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TP4z4-k5LyI/AAAAAAAAACI/VxA42QicXdY/s1600/manmohan.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 216px; height: 172px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TP4z4-k5LyI/AAAAAAAAACI/VxA42QicXdY/s320/manmohan.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5547928844930461474" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;राहुल गांधी ने कहा है कि बिहार के चुनाव नतीजों से वो हताश नहीं हैं। हालांकि ये भी नहीं कहा कि वो खुश हैं। वैसे कहने लायक बिहार ने छोड़ा ही कहां हैं । खैर बिहार चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए प्रत्याशित तो कतई ही नहीं थे। जिस तामझाम के साथ फिर से खुद के दम पर खड़े होने की तैयारी हुई थी उसमें पलीता लग गया। टिकट का बंटवारा कहिए या फिर बड़े नेताओं का घालमेल, उम्मीदों पर नहीं उतरे खड़े तो नहीं उतरे। वैसे कांग्रेस के लिए समय ही शुभ नहीं चल रहा है। अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर का जो महीना है वो कांग्रेस के लिए ठीक नहीं है। आदर्श सोसायटी घोटाला, स्पेक्ट्रम घोटाला, बिहार में &lt;br /&gt;बर्बादी, जगन मोहन का विद्रोह, सुप्रीम कोर्ट से रोज डांट । भाई इतने मुश्किल दौर से मनमोहन सिंह का तो पहला कार्यकाल भी नहीं गुजरा था। यूपीए वन में तो परमाणु करार पर लेफ्ट ने हाथ खींचा तो हाथ बढ़ाने कई लोग आगे आ गए। लेकिन&lt;br /&gt;इस बार सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह बड़े बुरे दौर से गुजर रहे हैं। जिसको देखिए वही उनके खिलाफ बोल कर कट ले रहा है। सुप्रीम कोर्ट हो या फिर सुब्रमण्यम स्वामी, परसों ये भी सुनने में मिला कि ए राजा की तरफ से भी पीएम की चिट्ठी को लेकर अनाप शनाप कहा गया था। वैसे कहने वाले सब कहते भी हैं कि पीएम साहब की ईमानदारी पर कोई शक नहीं है। लेकिन खाली कहने भर से क्या होता है। अक्टूबर लास्ट में आदर्श सोसायटी फ्लैट घोटाला वाला मामला लाइट में आया। अब समय खराब ही कहिएगा न कि जिस अशोक चव्हाण को मुंबई हमले जैसे विकट हालात में सीएम बनाया वो इतने पुराने मामले में नप गए। जमी जमाई दुकानदारी उखड़ गई। अशोक चव्हाण के बारे में एक और मजेदार बात पढ़ते हुए बढ़िए,&lt;br /&gt;अशोक चव्हाण का नाम अक्टूबर से पहले तक अशोक चव्हाण ही हुआ करता था लेकिन अक्टूबर शुरू में ही उन्होंने अपने नाव को वजन देने के लिए राव जोड़वा लिया और हो गए अशोक राव चव्हाण। अंकज्योतिषियों ने साफ कहा कि ये शुभ नहीं है, भारी विपत्ति आने वाली है, बीस दिन भी नहीं बीता कि कहां से फ्लैट का भूत निकला और ले गया।&lt;br /&gt;अब कांग्रेस के लिए एक टेंशन हो तब तो, जगन मोहन रेड्डी, आंध्र प्रदेश के कडप्पा से कांग्रेस के सांसद हुआ करते थे। पूर्व मुख्यमंत्री और आंध्र प्रदेश के कांग्रेस छत्रप रहे वाईएसआर के बेटे हैं। इनका बड़ा लंबा चौड़ा कारोबार है। टीवी चैनल से लेकर अखबार तक। अभी पंद्रह दिन पहले इनके चैनल पर सोनिया गांधी, राहुल और मनमोहन सिंह के खिलाफ स्टोरी चल गई। खूब किरकिरी हुई। अब जगन संकट से निपटने के लिए कांग्रेस को वहां के रोसैया को सीएम की कुर्सी से हटाना पड़ा, किरण कुमार सीएम बने। किसी राज्य में नेतृत्व बदलना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान काम नहीं होता। लेकिन मजबूरी में करना पड़ा। इससे क्या हुआ सो जानिए, जगन मोहन पर दबाव बना और उन्होंने इस्तीफा दे दिया। पांच पन्नों की चिट्ठी लिखी सोनिया को बहुत बुरा भला कहा। हालांकि उनके चाचा उनके साथ नहीं गए लेकिन किरण कुमार मंत्रिमंडल में जो मंत्री बने हैं ज्यादा उसमें नाखुश ही हैं। मतलब कि यहां भी कांग्रेस के लिए समय ठीक नहीं चल रहा है। अब उन्हीं की पार्टी का सांसद रहा शख्स पार्टी तोड़ चुका है। सोनिया की अध्यक्षता में पार्टी टूटने की पहली बड़ी घटना है। अभी भले चुनाव नहीं है लेकिन अगला चुनाव आसान नहीं होगा। जगन मोहन के पिता वाईएसआर की हेलिकॉप्टर हादसे में मौत हुई और इसके बाद जब सत्ता संभालने की बारी आई तो जगन की महत्वकांक्षाओं को नजरअंदाज करते हुए रोसैया को गद्दी दी गई उस वक्त जगन ने तो साथ दिया। लेकिन बाद में जगन ने अपनी पिता की मौत के बाद जिन समर्थकों ने खुदकुशी की थी उनके घरों का दौरा शुरु किया, कांग्रेस को ये मंजूर नहीं था जानते हैं क्यों... क्योंकि कांग्रेस के लोग नहीं चाहते कि पार्टी में कोई दूसरे परिवार का नेता क्षत्रप बनकर उभरे। वाईएसाआर अपवाद थे जिन्हें खुली छूट देना मजबूरी थी कांग्रेस की।&lt;br /&gt;बिहार और दो मुख्यमंत्रियों को नाप कर आगे बढ़ते हैं। स्पेक्ट्रम घोटाले का भूत कब तक पीछा करेगा भगवान जाने। पंद्रह दिन तो हो चुका है कहीं महीना न हो जाए संसद के ठप हुए। जेपीसी जांच के दबाव के आगे सरकार का गणित काम नहीं कर रहा है। ऊपर से सुप्रीम कोर्ट से रोज फटकार मिल रही है। सीवीसी को लेकर मामला भी सरकार के खिलाफ जा चुका है।  थॉमस की बहाली हो रही थी तो नेता विपक्ष सुषमा स्वराज ने विरोध किया था। लेकिन दो-एक के बहुमत से मनमोहन सिंह ने बना दिया । अब सुप्रीम कोर्ट में सरकार से लेकर सीवीसी तक सफाई दिए फिर रहे हैं।&lt;br /&gt;अभी इतना ही थोड़े है सुरेश कलमाडी का खेल भी तो है। कॉमनवेल्थ वाले मामले में सीबीआई कलमाडी के मातहत काम करने वाले अफसरों को जेल में डाल चुकी है। किसी दिन कलमाडी साहब से भी पूछताछ होगी। कलमाडी भी पुणे से कांग्रेस के ही सांसद हैं, और बड़े पुराने नेता भी हैं। उधर हिमाचल वाले नेताजी, केंद्र में इस्पात मंत्री वीरभद्र सिंह के खिलाफ भी तो भ्रष्टाचार वाले मामले में शायद चार्जशीट दायर हो ही चुका है। और हां ये भी जान लीजिए कि रोज जो है कोई न कोई बड़े अफसरों के त्रिया चरित्र का खुलासा भी इसी में हो रहा है। सो बड़ा मुश्किल भरा टाइम चल रहा है कांग्रेस का। एतना टफ टाइम पार्टी के लिए कभी नहीं रहा होगा, नए जेनरेशन में। इंदिरा जी वाले टाइम का अंदाजा नहीं है इसलिए कह रहा हूं ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-8780568943061424623?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/8780568943061424623/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=8780568943061424623' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/8780568943061424623'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/8780568943061424623'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/12/blog-post_05.html' title='कांग्रेस का टाइम ही खराब है...'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TP4z4-k5LyI/AAAAAAAAACI/VxA42QicXdY/s72-c/manmohan.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-7435662295792997111</id><published>2010-12-02T21:11:00.000+05:30</published><updated>2010-12-04T16:44:45.274+05:30</updated><title type='text'>अब तेरा क्या होगा 'कालिया'...</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TPfTtNVZOnI/AAAAAAAAACA/bwU1KsKfkrw/s1600/CKCA1GUXSQCANA1BF1CAIA5B8PCA3CQKTLCALB3GXECAZ4UD1DCAVC8CJ1CA4VMUIGCASOJJAVCA7YVGHJCANX0OVMCAC59PJACACJW0MWCACX1YPSCAGHYT4UCATM6DM7CAK1K6VKCA7TNDE3CAVY5CS2.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 268px; height: 188px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TPfTtNVZOnI/AAAAAAAAACA/bwU1KsKfkrw/s320/CKCA1GUXSQCANA1BF1CAIA5B8PCA3CQKTLCALB3GXECAZ4UD1DCAVC8CJ1CA4VMUIGCASOJJAVCA7YVGHJCANX0OVMCAC59PJACACJW0MWCACX1YPSCAGHYT4UCATM6DM7CAK1K6VKCA7TNDE3CAVY5CS2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5546134239757023858" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बिहार चुनाव के नतीजों को लेकर नीतीश कुमार के विरोधी तो कभी भी ऐसी उम्मीद लगाकर नहीं बैठे रहे होंगे।चुनावी साल में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और नीतीश के हमकदम माने जाने वाले ललन सिंह ने अपना हिसाब किताब अलग कर लिया। नीतीश तानाशाह है,पार्टी में लोकतंत्र खत्म हो गया और न जाने दुनिया भर के क्या क्या बोलते बोलते पटना से डोलते डोलते दिल्ली में आसन जमा लिए। बिहार चुनाव से पहले कांग्रेस को सेट किया और अपना राजनीतिक प्लेटफॉर्म तैयार कर लिया। कांग्रेस को भी लगा कि भैया बड़ा नाम है,पुराना सहयोगी है नीतीश का हमारा भी फायदा कराएगा। सो सटा लिए बेचारे।अब सांसद बने जेडीयू के टिकट पर और चुनाव में प्रचार के लिए गाड़ी में कांग्रेस का झंडा लगाकर खूब घूमे, लेकिन लोगों ने लाइन पर ला दिया। अब तो कांग्रेस के लिए भी बेचारे किसी काम के नहीं रहे उपर से झंडा लगाके घूमने और कांग्रेस के मंच से भाषण देने को लेकर सदस्यता खतरे में है। नीतीश कुमार के लोग चाहते हैं कि इनको पार्टी से निकालकर शहीद बनाने के बजाए बेहतर होगा इनकी संसद सदस्यता के खिलाफ पहले शिकायत की जाए। लिहाजा चुनाव आयोग और लोकसभाध्यक्ष से शिकायत की तैयारी है। पूरा सबूत के साथ। अगर वहां से कुछ फायदे वाला जवाब पार्टी को नहीं मिला तो किसी भी दिन इनको चलता कर दिया जाएगा। काहे कि जिस बंटाईदारी बिल को लेकर बिहार में हाय तौबा मचाए थे उसको लेकर तो बंटाइदारी बिल वाले समाज के लोग सरकार के खिलाफ गए नहीं, तो भला अब समाज का विश्वास खो दिए, नेता का भरोसा खो दिया, जिसके साथ गए उसको कोई फायदा नहीं कराए तो ऐसे खोटे सिक्के का काम क्या ? जानते चलिए कि ललन सिंह अभी मुंगेर से जेडीयू के सांसद हैं। &lt;br /&gt;औरंगाबाद के जेडीयू सांसद हैं सुशील कुमार सिंह।पहले विधायक हुआ करते थे.एक बार सांसद भी रहे। इस बार औरंगाबाद से चाहते थे कि भाई को टिकट मिले जेडीयू का।लेकिन सीट था बीजेपी के खाते का। चुनाव भर औरंगाबाद में नीतीश कुमार को &lt;br /&gt;परेशान करते रहे। अंत में न कुछ समझ में आया को भाई को लड़ा दिए लालू की पार्टी के टिकट पर। पार्टी और गठबंधन के उ्म्मीदवार को हराने के लिए पूरा ताकत झोंक दिए, भाई तो इनके हारे ही, लेकिन जहां इनका घर पड़ता है वहां से भी नीतीश के उम्मीदवार की जीत हो गई। बीजेपी वाले जोर लगाए बैठे हैं, कि भइया इनको कल्टी कराओ। और तो और औरंगाबाद में इनको बैलेंस करने के लिए इन्हीं के समाज के नेता को जिन्होंने इनके भाई को हराया उनको मंत्री बना दिया गया है। इन पर अनुशासन का डंडा चलाने के लिए स्क्रिप्ट टाइप हो रहा है। &lt;br /&gt;आगे बढ़िए महाबली सिंह बेचारे बीएसपी, आरजेडी और कहां कहां घूमते फिरते नीतीश की शरण में आए। चुनाव हुआ लोकसभा का तो इनको काराकाट से टिकट दे दिया। अब इनका खेल देखिए जिस चैनपुर सीट से विधायक थे वहां अपने सुपुत्र धर्मेंद्र को टिकट दिलवाकर विरासत बरकरार रखवाने के फेर में थे। लेकिन पार्टी ने मना कर दिया । और सुनिए इ तो विधायक बनने के बाद पार्टी बदलते रहे लेकिन इनके सुपुत्र इनसे भी फास्ट निकले, विधायकी के चुनाव लड़ने के लिए ही पार्टी बदल दिए। आरजेडी के टिकट पर लड़ गए। धर्मसंकट में फंसे बाबूजी ने पार्टी के नीति, सिद्धांत को ताखा पर रखके बेटा के लिए मोर्चा संभाल लिया, लेकिन बेटा बेचारा बाबूजी की विरासत को संभाल नहीं पाया। &lt;br /&gt;पूर्णमासी राम लालू-राबड़ी के जमाने में खाद्य-आपूर्ति मंत्री होते थे, दूरदर्शी थे तभी मौका देखकर 2005 में ही पलटी मार गए और लोकसभा चुनाव के वक्त किस्मत ने साथ दिया तो गोपालगंज से जेडीयू के टिकट पर जीतकर दिल्ली का मुंह भी देख लिए। हालांकि लोकसभा चुनाव के बाद उनकी विधानसभा सीट पर जो उपचुनाव हुआ उसमें उन्होंने खेल कर दिया। बेटा के लिए टिकट चाहते थे, नहीं मिला तो खिलाफ में प्रचार किए और बगहा में पार्टी हार गई। सजा मिली तो इनको पार्टी से निलंबित भी कर दिया गया। लेकिन इस बार चुनाव से पहले फिर से उनको पार्टी ने सटा लिया। अबकी बार फिर बेटा का टिकट चाहते थे, अड़ गए, पार्टी ने फाइनली टिकट नहीं दिया। आदत से लाचार पूर्णमासी राम ने फिर मुंह खोला, बेटे को हरसिद्धि से लड़वा दिया वो भी कांग्रेस के टिकट पर। अब कहां बगहा और कहां हरसिद्धि। गोपालगंज के किसी सीट से लड़ते तो लोग शायद सोचते भी कि सांसद का बेटा है। इनको लगा कि पूरा बिहार का महादलित इन्हीं के इशारे पर चलता है। बेटा को कुल जमा छे हजार वोट मिले हैं। यहां भी बीजेपी के उम्मीदवार का खेल बिगड़ने चले थे जेडीयू के सांसद महोदय। अब इनका अपना खेल बिगड़ने वाला है। &lt;br /&gt;मोनिजर हसन। लालू के साथ रहे तो लालू को तेल लगाया। पांच साल पहले नीतीश के साथ हुए तो नीतीश को तेल लगाया। नीतीश को लगा की मास लीडर है सो फायदा भी कराया। मंत्री बनाया। लोकसभा चुनाव के वक्त टिकट देकर सांसद बनवा दिया। वो भी उस बेगूसराय सीट से जहां इनको कोई पूछे न, लेकिन इनको तो लग रहा है कि पूरा बिहार के मुसलमानों के यही इकलौते नेता हैं। खैर विधानसभा का जब उपचुनाव हुआ तो उम्मीदवारी को लेकर ललन सिंह से भिड़ गए। नतीजा हुआ कि &lt;br /&gt;उस समय लालू के उम्मीदवार की जीत हो गई। इस बार मोनाजिर भाई को लगा कि अपनी घरवाली को भी विधायक बना लेंगे। लेकिन शायद नीतीश को उपचुनाव वाला खेल याद था सो टिकट नहीं मिला। लेकिन खेलल-खालल नेता मानने वाला थोड़ा था, लालू से हाथ-गोर जोड़के अपनी बीवी को आरजेडी के टिकट पर खड़ा करवा दिए। बेचारा लालू की पार्टी के जो विधायक थे, साल भर में ही उनको मोनाजिर ने सेट कर दिया। लेकिन लोग तो भाई खेल समझ गया लगता है। तभी तो मोनाजिर की बीवी को सेट कर दिया। हार गई बेचारी। अब मोनाजिर किसी को मुंह नहीं दिखा रहे। पटना में रुकने की बात छोड़ दिजीए। नया घर तलाश रहे हैं। लेकिन लालू के लिए भी फूंके कारतूस हैं बेचारे। &lt;br /&gt;उपेंद्र कुशवाहा से बहुत कम लोग परिचित होंगे। नीतीश के बाद पार्टी में किसी जमाने में नंबर दो हुआ करते थे। एक बार जन्दाहा से विधायक थे। झारखंड बंटा और सुशील मोदी के लिए जब नेता विपक्ष का नंबर घट गया तो समता पार्टी ने इन्हें विरोधी दल का नेता बनाया। 2005 के चुनाव में हार गए। इन्हीं के समाज के नागमणि की पूछ बढ़ गई और इनको कोई पूछने वाला नहीं रहा तो लगे नीतीश के खिलाफ अनाप-शनाप बोलने। पार्टी छोड़े, एनसीपी में चले गए। घूमघूम के कोइरी के नेता के रूप में अपनी दुकानदारी चमकाने की नाकाम कोशिश में जुटे। कोई फायदा नहीं दिखा तो लोकसभा चुनाव के बाद फिर से नीतीश से सेटिंग कर पार्टी में लौट आए। तब तक बेचारे नागमणी से नीतीश का संपर्क ठीक नहीं रह गया था। इनको लगा कि कोइरी के सबसे बड़े नेता तो हमही रह गए हैं। नीतीश की भी मजबूरी थी नागमणी भाग जो गए थे सो इनको राज्यसभा भेजा गया। अब देखिए राज्यसभा सांसद बनने के बाद लगे रंग दिखाने। लगा कि हमसे बड़़ा कोइरी का तो कोई नेता नहीं है, लेकिन टिकट बंटवारे में कोई पूछा नहीं इनको। उल्टे नीतीश ने इनसे भी बड़ा एक कोइरी के नेता को शामिल करा लिया। लेकिन इनका गणित काम कर गया, बेचारे कोइरी के बड़े नेता जो नीतीश के बौरो प्लेयर थे, हार गए हैं। अब कुशवाहा जी इसे अपनी जीत मान रहे हैं लेकिन नीतीश के लोग अपनी हार। अब इनका क्या होगा.. नीतीश जाने। &lt;br /&gt;ये बात तो सिर्फ जेडीयू की है। आरजेडी में भी महाराजगंज वाले सांसद उमाशंकर सिंह परेशान हैं। चुनाव में उनको लालू ने पूछा नहीं। प्रभुनाथ सिंह की कर्ता धर्ता बने रहे। अब जिस प्रभुनाथ सिंह को हराकर वो सांसद बने थे उनकी बढ़ती हैसियत ने इनको नाराज कर दिया। चुनाव भर खाली आरजेडी और प्रभुनाथ सिंह के समर्थकों को घूम घूमकर हराने में लगे रहे। कामयाब भी रहे। अब नीतीश के विकास की माला जप रहे हैं। वैसे भी नीतीश के साथ काम कर चुके हैं। उपेंद्र कुशवाहा को जब विपक्ष के नेता बनाया गया था बिहार में। उस वक्त बिहार में समता पार्टी विधायक दल के नेता उमाशंकर सिंह ही थे। बाद में लालू से सट गए। अब इ क्या करेंगे या इनके साथ लालू क्या करेंगे ये तो ये जाने या फिर लालू। &lt;br /&gt;ऐसे नेताओं के खिलाफ संगठन के लोग नाराज हैं। वैसे भी परंपरा तो गलत ही है, अनुशासन में लोग न रहे तो हर कोई ऐसा करेगा। तब तो भगवान मालिक है राजनीतिक दलों का।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-7435662295792997111?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/7435662295792997111/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=7435662295792997111' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/7435662295792997111'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/7435662295792997111'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='अब तेरा क्या होगा &apos;कालिया&apos;...'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TPfTtNVZOnI/AAAAAAAAACA/bwU1KsKfkrw/s72-c/CKCA1GUXSQCANA1BF1CAIA5B8PCA3CQKTLCALB3GXECAZ4UD1DCAVC8CJ1CA4VMUIGCASOJJAVCA7YVGHJCANX0OVMCAC59PJACACJW0MWCACX1YPSCAGHYT4UCATM6DM7CAK1K6VKCA7TNDE3CAVY5CS2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-5057049644979062036</id><published>2010-11-28T00:22:00.001+05:30</published><updated>2010-11-29T21:03:53.563+05:30</updated><title type='text'>असली परीक्षा तो अब होगी</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TPFTozjqHxI/AAAAAAAAAB4/OdfGhT6RZ8Y/s1600/Nitish-Kumar-007.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 192px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TPFTozjqHxI/AAAAAAAAAB4/OdfGhT6RZ8Y/s320/Nitish-Kumar-007.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5544304576769433362" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकास, विकास और विकास। बिहार की नई पीढ़ी विकास का नाम भूल चुकी थी। लेकिन पिछले पांच सालों के दौरान उसने जो कुछ देखा, सुना उसका नतीजा है कि आज देश में विकास की बात हो रही है और बिहार का नाम लोग ले रहे हैं। नीतीश की जीत के कई मायने है। लेकिन अब सबसे बड़ी चुनौती है लोगों के लिए रोजगार के अवसर को पैदा करना। बिहार में बंद हो चुके उद्योग धंधे को फिर से पटरी पर लाना। बिहार से बाहर गए लोगों को बिहार वापस लाना। अब नीतीश के पास इसके बारे में क्या मॉडल है इसका खुलासा अभी न तो बिहार के सामने हुआ है और ना ही देश के सामने। बिहार की सियासत को बिरादरी की वजह से लोग ज्यादा जानते थे। इस बार भी बिरादरी को कम करके किसी ने नहीं आंका था लेकिन नीतीश से आस लगाए हर धर्म, जाति के लोगों ने बिरादरी को बाय बाय कर विकास को गले लगाया। कारण था उम्मीद। लोगों ने नीतीश कुमार में अपनी खुशहाली की तस्वीर देखी। लिहाजा नीतीश को दिल खोलकर करने का मौका दिया है। पिछले पांच साल की तुलना लालू-राबड़ी के पंद्रह साल से होती रही, लिहाजा नीतीश का पांच साल भारी पड़ा। अब जब नीतीश की तुलना उनके अपने पांच साल से होनी है लिहाजा चुनौती बड़ी है। बिहार में रहने वाले लोग अब चमचमाती सड़कों के आदि हो चुके हैं। उनके लिए चमचमाती सड़कें, स्कूल में समय पर शिक्षकों का आना, अस्पताल में डॉक्टरों का समय से पहुंचना धीरे धीरे पुरानी बातें होती चली जाएंगी। बिहार से बाहर रहने वाले लोग साल में पर्व त्योहार, शादी ब्याह के मौके पर एक आध बार बिहार जाते हैं लिहाजा उनके लिए चमचमाती सड़कें और वहां का बदला माहौल जरूर नया होता है लेकिन जो लोग वहीं रहते हैं उनके लिए ये बातें नई नहीं होंगी। लिहाजा अब उनकी नई अपेक्षाओं पर खुद को साबित करना नीतीश के लिए चुनौती का काम होगा।  &lt;br /&gt;बिहार की पुरानी सड़कें चमचमा जरूर रही है, लेकिन ट्रैफिक की समस्या बड़ी समस्या बनती जा रही है। चाहे पटना हो या मुजफ्फरपुर। छपरा, दरभंगा और जहानाबाद हर शहर और शहर के बाहर व्यस्त सड़कों पर ट्रैफिक का बोझ बढ़ता जा रहा है। कारण भी है बिहार के लोगों की परचेंजिंग कैपेसिटी जिस अनुपात में बढ़ रही उस अनुपात में कोई ग्रेटर पटना या ग्रेटर दरभंगा टाइप नया कुछ नहीं हो रहा है। और फोर लेन या सिक्स लेन का मामला हर जगह के लिए है भी नहीं। इस टाइप की समस्या से निपटने के लिए भी कुछ जल्दी ही करना होगा।&lt;br /&gt;सेंट्रल यूनिवर्सिटी, आईआईटी, आईआईएम टाइप आइटम भी 9 करोड़ वाले बिहार को चाहिए। कब तक यहां के लड़के टपला खाते फिरेंगे। जात पात के बंधन से ऊपर उठकर लोगों ने मौका दिया है तो हर लेवल पर मुस्तैदी से खड़ा होना होगा।&lt;br /&gt;विरोधी तो विरोधी समर्थक भी कहते हैं कि नीतीश के कार्यकाल में अफसरशाही को मजबूती मिली है, और घूसखोरी, भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला है। सच्चाई भी है। लूटने की आदत पहले से पड़ी हुई है जिसका ठीक करना होगा। ट्रांसफर, पोस्टिंग और छोटी मोटी बहालियों में भी लाखों का खेल रुका नहीं है। अंतर इतना हुआ कि पहले टेबल के ऊपर से होता था अभी टेबल के नीचे से हो रहा है, इस चीज को सुधारने का मौका बिहार के लोगों ने दिया है। &lt;br /&gt;अपराध पूरी तरह काबू में नहीं आ सकता इसको हर कोई मानता है लेकिन अपराधियों को जिनका आशीर्वाद मिला है वैसे लोगों पर कंट्रोल कीजिए ताकि समाज खुशी से कमा सके, खा सके। लोग खुश रहेंगे, आप खुश रहेंगे। लोगों को कष्ट हुआ तो आप भी चैन से सो नहीं पाएंगे, उन लोगों की तरह।&lt;br /&gt;फिलहाल चुनौतियां पहले से ज्यादा है।साबित को साबित करना है जो कर दिया उसको भी ले चलना है। करने के लिए पूरा वक्त भी है। सत्ता के अहंकार का वक्त नहीं है। अभी वक्त माहौल को और ठीक करने का है। और हां किसी और के लिए बिहार में फिलहाल कोई स्कोप नहीं है। ऊपर से इतिहास गवाह है बिहार की धरती पर उठकर जो गिर गया दोबारा कभी नहीं उठा है। मौका बेहतर है सेवा करके साबित कीजिए । इस बार सत्ता के शिखर पर पहुंचाने वाला वोटर न तो कुर्मी था न कोइरी, न कोई राजपूत,भूमिहार, वैश्य, मुसलमान या फिर यादव, पूरे बिहार ने चुना है अब बिहार को यकीन दिलाइए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-5057049644979062036?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/5057049644979062036/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=5057049644979062036' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/5057049644979062036'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/5057049644979062036'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='असली परीक्षा तो अब होगी'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TPFTozjqHxI/AAAAAAAAAB4/OdfGhT6RZ8Y/s72-c/Nitish-Kumar-007.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-899292239496480858</id><published>2010-09-23T20:00:00.000+05:30</published><updated>2010-09-23T20:01:41.562+05:30</updated><title type='text'>अब के नीतीश पर 'नजर' डालिए</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TJiQGB9kgqI/AAAAAAAAABg/4HFZz94aJ4k/s1600/GEORGE.bmp"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 175px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TJiQGB9kgqI/AAAAAAAAABg/4HFZz94aJ4k/s320/GEORGE.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5519319776622838434" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जॉर्ज, नीतीश जिंदाबाद, ललन,दिग्विजय जिदाबाद।&lt;/strong&gt; नीतीश कुमार का जब तक राजतिलक नहीं हुआ था बिहार में कुछ ऐसे नारे लगते थे। 2005 से पहले के बैनर अगर किसी को याद है तो उनको ये नारा भी याद होगा। प्रचार के दौरान बैनरों पर सबसे ऊपर कुछ ऐसा ही लिखा होता था। लेकिन 2005 में जब नीतीश सत्तासीन हुए तो हालात बदल गये। 2010 आते आते हालात बहुत ज्यादा बदल चुके हैं। नीतीश को 2005 में सत्ता के करीब ले जाने वाले जिन चार नामों का जिक्र उस वक्त होता था उन चार में से तीन नाम आज नीतीश से दूर हैं। मुख्यमंत्री बनते ही नीतीश ने सबसे पहले अपने राजनीतिक गुरु जॉर्ज को ठिकाने लगा दिया। &lt;strong&gt;शरद यादव &lt;/strong&gt;ने पार्टी में जॉर्ज की जगह ले ली। राजनीतिक जीवन के आखिरी समय में जॉर्ज की जो स्थिति है उससे कोई अंजाना नहीं है। 20 साल तक नीतीश की राजनीति का प्रबंधन देखने वाले ललन सिंह नीतीश से दूर जा चुके हैं। 2005 में जब पार्टी सत्ता में आई थी ललन सिंह प्रदेश अध्यक्ष थे, जॉर्ज राष्ट्रीय अध्यक्ष। &lt;strong&gt;प्रभुनाथ सिंह &lt;/strong&gt;को नीतीश ने दरकिनार करना शुरू किया नतीजा आज वो लालू के साथ गलबहियां कर रहे हैं। इन नामों के अलावा नीतीश को सत्ता के शिखर पर ले जाने में अहम भूमिका निभाने वाले दिग्विजय सिंह का नाम भी प्रमुख है। बांका से सांसद रहे दिग्विजय दक्षिणी बिहार में पार्टी की कमान संभालते थे। बुद्धजीवियों का बड़ा वर्ग दिग्विजय के जरिये ही पार्टी के करीब था। लेकिन सत्ता में आने के बाद नीतीश ने दिग्विजय सिंह को भी साइड कर दिया। एनडीए की सरकार में समता पार्टी कोटे से तीन मंत्री हुआ करते थे जॉर्ज, नीतीश और दिग्विजय। पार्टी बनने के वक्त से ही दिग्विजय पार्टी के हर फैसले के गवाह रहे थे। लेकिन नीतीश ने साल 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्हें बांका से पार्टी का उम्मीदवार तक नहीं बनाया। लेकिन दिग्विजय न सिर्फ पार्टी से बगावत कर इस सीट से जीते बल्कि पार्टी के उम्मीदवार को लड़ाई के लायक भी नहीं छोड़ा। हालांकि दिग्विजय अब इस दुनिया में नहीं हैं। कहने का मतलब ये कि नीतीश को सत्ता के शीर्ष तक ले जाने वाले चेहरे सिर्फ बैनर पोस्टर से ही नहीं नीतीश के आसपास से भी दूर जा चुके हैं। सीएम बनने के बाद एकएक करके नीतीश ने पुराने साथियों को साइड करना शुरू किया तो नए नए लोगों को अपनी सिपहसलार बनाया। ये वो वक्त था जब लोकतांत्रिक पार्टी की जगह जेडीयू व्यक्ति विशेष के प्रभाव वाली पार्टी बनती जा रही थी। 2005 के चुनाव में बिहार ने नीतीश को वोट नहीं दिया.. वोट लोगों ने बदलाव को दिया और उस बदलाव का नेतृत्व नीतीश को दिया गया था। नेतृत्व देने वाले लोगों को ही नीतीश ने किनारा कर दिया। नीतीश की छवि इस वक्त पार्टी में तानाशाह की तरह उभरने लगी थी। इसकी पृष्ठभूमि नीतीश धीरे धीरे 2004 लोकसभा चुनाव के वक्त से ही लिख रहे थे... जब जॉर्ज को नालंदा सीट छोड़ने के लिए कहा और खुद नालंदा से लड़ने गये। नीतीश और जॉर्ज के बीच मनमुटाव की शुरुआत हो चुकी थी लेकिन बिहार में लड़ाई बदलाव की थी सो अंहकार को फिलहाल साइड रखा गया। हालांकि नीतीश की स्क्रिप्ट के मुताबिक राजनीति का खेल जारी था। एक जमाने में समता पार्टी का साथ छोड़कर गए&lt;strong&gt; शिवानंद तिवारी, वृषण पटेल&lt;/strong&gt; ने लालू का साथ छोड़ फिर से नीतीश का दामन थाम लिया था। नीतीश ने गले लगाया और अहम जिम्मेदारियों से नवाजा। जिंदगी भर कांग्रेस की सियासत करने वाले &lt;strong&gt;जगन्नाथ मिश्रा &lt;/strong&gt;2004 में ही नीतीश के शरणागत हो गये थे। 2005 में &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रामाश्रय प्रसाद सिंह&lt;/strong&gt; भी नीतीश कुमार के साथ हो गए। जगन्नाथ मिश्रा के सुपुत्र को बिहार में मंत्री बनाया गया तो रामाश्रय सिंह खुद नीतीश सरकार में मंत्री बने। (यहां याद दिलाते चलें कि जब बिहार में कांग्रेस के कमजोर होने का दौर शुरू हुआ था जगन्नाथ मिश्रा ने अलग पार्टी बना ली थी तब बिहार में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता हुआ करते थे रामाश्रय सिंह।) लालू का साथ छोड़ कर नीतीश का साथ देने आए&lt;strong&gt; मोनाजिर हसन &lt;/strong&gt;जैसे नेता भी नीतीश के करीबी हो गये और कैबिनेट मंत्री बनाकर अहम मंत्रालय दिया गया। ये तो बात रही सत्तासीन होने के बाद के शुरुआती दिनों की.. लेकिन धीरे धीरे जैसे समय बीतता गया नीतीश ने अपने आसपास से पुराने वफादार नेताओं को साइड करना तेज कर दिया। नीतीश को कोई मलाल नहीं था कि उनके साथ कौन से लोग जुड़ रहे हैं और कौन से लोग उनसे दूर जा रहे हैं। लालू को जानने वाले लोग &lt;strong&gt;रंजन यादव &lt;/strong&gt;को नहीं भूल सकते। लालू के बाद नंबर दो का दर्जा मिला था। बाद में लालू को धोखेबाज कहते हुए अलग हो गये थे। एक वक्त कहा जाता था कि लालू की पार्टी में लालू से ज्यादा रंजन यादव के समर्थक विधायक हैं। वो रंजन यादव नीतीश की टीम में शामिल हो गये। बाद में जेडीयू के टिकट पर पटना से सांसद बने।  2009 लोकसभा चुनाव के बाद तो परिस्थितियां बिल्कुल ही बदल गई। 25 में से 20 सीट जीतने के बाद नीतीश आसमान में थे और यही वक्त था जब नीतीश को और आसमान में ले जाने वाले लोग उनसे जुड़कर अपना नंबर सेट करने लगे। नीतीश तो प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में गिने जाने लगे थे। खैर चुनाव के तुरंत बाद विधानसभा उपचुनाव का जब वक्त आया तो &lt;strong&gt;रमई राम &lt;/strong&gt;और &lt;strong&gt;श्याम रजक&lt;/strong&gt; जैसे लालू के दाएं-बाएं बैठने वाले नेता नीतीश के साथ आ गए। (रमई राम के बारे में बता दें आपको लगातार चार बार से विधायकी जीत रहे थे.. पार्टी में दलितों का सबसे बड़ा चेहरा। लगातार लालू-राबड़ी राज में मंत्री, बेटी को लालू ने विधान पार्षद बनवाया। लोकसभा का टिकट नहीं दिया तो पार्टी छोड़ दी।) श्याम रजक जो लालू राबड़ी की शान में कसीदे गढ़ते थे। जो लालू के किचन कैबिनेट के मेंबर हुआ करते थे। उन्होंने भी लालू से किनारा किया तो नीतीश ने अपने गले लगा लिया। हालांकि नीतीश की पार्टी से रमई राम और श्याम रजक दोनों विधानसभा उपचुनाव हार गये। आगे बढ़िये तो &lt;strong&gt;विजय कृष्ण&lt;/strong&gt;, जो विजय कृष्ण कई बार बाढ़ से सांसद रहे और 2004 के लोकसभा चुनाव में नीतीश को जिन्होंने हरा दिया था, 2009 चुनाव हारने और हत्या के एक केस में फंसने के बाद नीतीश के शरणागत हो गये। दर्जन भर से ज्यादा मुकदमों के आरोपी &lt;strong&gt;तस्लीमुद्दीन&lt;/strong&gt; का नाम सुना होगा आपने, देवेगौड़ा की सरकार में मंत्री थे लेकिन गृह राज्यमंत्री के पद से हटा दिया गया था। नीतीश राज में कानूनी शिकंजा कसने का डर सताया तो नीतीश की शरण में ही चले गये। नीतीश ने इस बाहुबली नेता को तहे दिल से गले लगाया। उपेंद्र कुशवाहा, अरुण कुमार सिंह जैसे पुराने नेता समता पार्टी के संस्थापकों में से रहे लेकिन सरकार बनने के बाद ही नीतीश से इनके संबंध खराब हो गये... लेकिन राजनीतिक मजबूरी देखिए ललन सिंह की कमी को पाटने के लिए अरुण कुमार को वापस लाया गया है। बताते हैं कि ललन सिंह उपेंद्र कुशवाहा को पार्टी में वापस लाने के पक्ष में नहीं थे लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले नागमणि(कोइरी) के पार्टी छोडकर जाने के बाद कोइरी नेता की जो कमी रह गई थी उसे पाटने के लिए उपेंद्र कुशवाहा को लाया गया है। उपेंद्र की वापसी ललन सिंह की मर्जी के बगैर हुई लिहाजा ललन कल्टी मार गये। अब उपेंद्र कुशवाहा की मर्जी के बगैर उस कोइरी जाति के विधायक को जेडीयू में शामिल कर लिया गया है जिसने 2005 के विधानसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा को हरा दिया था। उपेंद्र कुशवाहा फिर से नाराज बताये जा रहे हैं।  ललन सिंह के जाने के बाद विजय चौधरी को बिहार में पार्टी का अध्यक्ष बना दिया गया। विजय चौधरी की पार्टी में वैसे तो पहले से कोई पहचान नहीं थी लेकिन अब कार्यकर्ता उनका नाम जान गये हैं। उधर जिस बांका से लालू की पार्टी के टिकट पर सांसद रहे गिरधारी यादव भी नीतीश की शरण में पहुंच चुके हैं। एक बात गौर करने वाली ये है कि चुनाव पूर्व दलबदल एक प्रक्रिया है। लेकिन इस प्रक्रिया में उस चीज का ख्याल नहीं रखा जा रहा जो नीतीश सरकार की पहचान है। लालू और नीतीश में अब क्या फर्क रह गया है सिर्फ दोनों के चेहरों के अलावा। कल जो लालू के जंगल राज के मजबूत सिपाही थे आज की तारीख में वो नीतीश के राज के मजबूत सिपाही बन गये हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीतीश के पास जो चौकरी आजकल चक्कर काट रही है उसको पहचानिए..... विजय चौधरी(अध्यक्ष, बिहार जेडीयू) कोई दाग नहीं है नई पहचान बना रहे हैं। शिवानंद तिवारी(राष्ट्रीय प्रवक्ता) दाग ही दाग, कब लालू की पार्टी में कब नीतीश के साथ उनको भी नहीं पता। श्याम रजक(सालों तक लालू की किचन कैबिनेट के सदस्य)खासियत देखिए-  आज बिहार सरकार का पक्ष घूम घूम कर मीडिया में रख रहे हैं। साल भर पहले लालू के जंगल राज वाली पार्टी को छड़कर इधर आए हैं बयान सुनिएगा तो लगेगा कि लालू के जंगल राज के खिलाफ 94से लड़ रहे हैं। पहले लालू के लिए मीडिया को फोनो देते थे अब नीतीश के लिए फोनो देते हैं। रमई राम(90-2005 तक लगातार भूमि राजस्व मंत्री) नीतीश की पार्टी से विधानसभा उपचुनाव हारे तो क्या हुआ अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्ष  बना दिया गया। बिहार में दलित-महादलित का फर्क कर जीत का गणित बनाने वाले नीतीश को पांच साल तक कोई दलित नेता नहीं मिला जिसे ये पद दे सके। खैर...अल्पसंख्यक चेहरों की कमी पड़ गई है जो पहले से थे वो नाराज चल रहे हैं... मोनाजिर हसन के बारे में भूल गये हैं तो बता देता हूं... 2005 में चुनाव से पहले लालू को छोड़कर आए थे जेडीयू से जीते भवन निर्माण मंत्री बनाया गया लालू-राबड़ी कैबिनेट में भी यही ओहदा था। खैर मुख्यमंत्री निवास खाली करने का विवाद 2005 में जब चर्चा में आया तो मोनाजिर ने लालू से पंगा लिया.. लालू ने इनको टीटीएम मंत्री बना दिया..माने.. ताबड़तोड़ तेल मालिश मंत्री कहकर पुकारा.. हालांकि नीतीश के सामने इनका नंबर बन गया.. लेकिन 2009 में जब से ये सांसद बने हैं उनका मामला ठीक नहीं चल रहा सो नीतीश अल्पसंख्यक नेताओं के ऑपरेशन में जुटे हैं। दो दिन पहले एलजेपी की पूरी अल्पसंख्यक यूनिट को पार्टी में ले आए.. अब उन्हीं की पार्टी के विधायक इजहार अहमद को भी ला रहे हैं। तस्लीमुद्दीन को पहले से ही चेहरा बनाकर घूमा रहे हैं। वैसे शहाबुद्दीन को भी अपनी पार्टी में लेने के इच्छुक थे नीतीश। सीवान दौरे के दिन पिछले महीने हीना शहाब से मिलने की पूरी तैयारी हो चुकी थी लेकिन लालू को खबर लगी और पलीता लग गया। लालू पहुंचे सीवान जेल और शहाबुद्दीन को समझा बुझाकर शांत कराया। कहने का मतलब ये कि लालू और नीतीश में फर्क अब सिर्फ दोनों के अपने चेहरे का रह गया है। क्योंकि सुशासन की परिभाषा लिखने वाले पुराने नेता नीतीश से किनारे हो चुके हैं और जंगल राज के सिपाही अब नीतीश के सिपहसलार बन गए हैं। जानकार बता रहे हैं कि नीतीश के राज में जिस तरीके से बाहुबलियों का बुरा हश्र हुआ है बचे खुचे दूसरे दलों के बहाबुली चुनाव के मौके पर सेफ हैंड खेल नीतीश दरबार में नंबर बनाने में जुटे हैं। भला हो बिहार का...अब जंगल राज वाले नेता नीतीश की पार्टी से जीतकर आएंगे तो नीतीश को कौन से राज का मुखिया बनाएंगे... जंगल राज का या सुशासन के राज का??? ऐसे नेताओं के बारे में बिहार को गंभीरता से सोचना होगा। क्योंकि एक आदमी ही गलत होगा ये कहना ठीक नहीं हो सकता क्योंकि उस आदमी के आसपास वाले लोग कहीं से भी ठीक नहीं माने जा सकते। लालू और उनके पुराने संबंधियों के बारे में कुछ ऐसा ही समझना पड़ेगा। क्या कहते हैं...????&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-899292239496480858?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/899292239496480858/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=899292239496480858' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/899292239496480858'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/899292239496480858'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/09/blog-post_23.html' title='अब के नीतीश पर &apos;नजर&apos; डालिए'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TJiQGB9kgqI/AAAAAAAAABg/4HFZz94aJ4k/s72-c/GEORGE.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-3724516638534204310</id><published>2010-09-23T19:03:00.000+05:30</published><updated>2010-10-16T02:51:19.745+05:30</updated><title type='text'>नीतीश के विकास पर बटन दबाएगा बिहार!</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TJtjOe4lJ3I/AAAAAAAAABw/9PqPrSfY6GU/s1600/manojkk.bmp"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 236px; height: 158px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TJtjOe4lJ3I/AAAAAAAAABw/9PqPrSfY6GU/s320/manojkk.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5520114868732372850" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बिहार में नीतीश कुमार का सहारा है विकास। नारा भी विकास ही है। चूंकि बिहार की राजनीति बिना जात पात के संपूर्ण नहीं है लिहाजा नीतीश को ये जोड़ तोड़ करना पड़ रहा है। वैसे पार्टी नेता विकास के भरोसे आत्मविश्वास से भरे हुए हैं। होना भी चाहिए क्योंकि इससे पहले के पंद्रह साल की तुलना में नीतीश का पांच साल कई गुणा भारी पड़ता है। नीतीश के नेता, कार्यकर्ताओं का सीना इसलिए भी फूला हुआ है कि फीड बैक विकास को लेकर सही आ रहा है। विरोधी भी विकास की दुहाई दे रहे हैं। हालांकि चुनाव है नतीजों का जोड़ घटाव तो वोट देने से पहले तक बदलता रहता है फिर भी आकलन जो कोई भी कर रहा है हवा नीतीश के पक्ष में बता रहा है। बिहार के कुछ लोगों की बातों पर गौर करें तो, पिछली सरकार की तुलना में नीतीश की सरकार में किए गए कुछ काम बेहतर कहने लायक है। राजधानी पटना ही नहीं बिहार के ज्यादातर इलाकों में सड़कें चलने लायक हो गई हैं। कानून व्यवस्था के हालात भी बेहतर हुए हैं। शाम होते ही बाजारों की रौनक गायब हो जाती थी कम से कम इन पांच सालों में लोगों का मनोबल बढ़ा है। जिस तरीके से लालू-राबड़ी के राज में कानून तोड़ने वालों का मनोबल बढ़ा था कम से कम नीतीश के राज में कानून पर भरोसा करने वालों का मनोबल मजबूत हुआ है। पहले लोग दूसरों से तुलना करते थे अब लोग अपने में मस्त होने लगे है। विकासशील व्यवस्था की पहचान इसको मान सकते हैं। लिहाजा इस विकासशील व्यवस्था को विकसित बनाने के लिए जरूरी है कि बिहार को कम से कम पांच साल के लिए नीतीश पर भरोसा करना चाहिए। बिहार की एक पूरी पीढी ने कभी विकास नाम का शब्द बिहार की धरती पर नहीं सुना था। आज पहली बार उस पीढ़ी का नौजवान अपने घर में अपनों से विकास की बात सुन रहा है। बचपन उसका जंगल राज के साये में गुजरा था.. थोड़ा सयाना हुआ तो उसने विकास की परिभाषा को समझने की कोशिश की.. अब वो विकास की बात घर से लेकर बाहर तक सुन रहा है। मतलब नई पीढ़ी के जरिये बिहार के गांव और कस्बों में विकास लौट रहा है। आज राजनीति को समझने वाला हर शख्स देश की राजनीति को समझ रहा है उसमें अगर कोई दो पैसा भी बेहतर करता है तो दांव उसपर लगाने में कोई बुराई नही है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बहुत कुछ बदलाव हुआ है.. वैसे बिहार में बहुत चीजें ऐसी है जिसे करने की जरूरत है। नीतीश के समर्थक भी यही बात कह रहे हैं, पंद्रह साल या फिर उससे पहले के शासन में जो नहीं हुआ उसे अगर कोई करना चाहता है तो उसे मोहलत दी जानी चाहिए। कुल मिलाकर ये कह सकते हैं कि आज की तारीख में पहले की तुलना में शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून व्यवस्था, सड़क के मामले में बिहार ने तरक्की की है। दिल्ली, नोएडा, मुंबई के बाद मीडिया के मामले में बिहार आज पावर सेंटर बनकर उभर रहा है। हालांकि इंडस्ट्री, बिजली, रोजगार के अवसर जैसे मामलों में बिहार को काम करने की जरूरत है। पहले के नेता इन मामलों के बारे में सोचते तक नहीं थे, आज अगर कोई सोच रहा है तो कम से कम उसे उसका ड्राफ्ट तैयार करने का वक्त मिलना चाहिए। भरोसा सबसे बड़ी चीज है अब तक बिहार को किसी पर भरोसा नहीं था लेकिन आज बिहार किसी की तरफ मुंह उठाकर देख तो रहा है। लिहाजा जाति, धर्म से उपर उठकर इस बार बिहार में विकास के इसी हथियार को चुनावी हथियार बनाने की तैयारी कर रहे हैं नीतीश कुमार। और हां बिहार का हर शख्स अपना एक राजनीतिक नजरिया रखता है इसलिए उसे पाठ पढ़ाना आसान नहीं होता। अब सवाल उठता है कि बिहार का वो नजरिया पंद्रह साल तक कहां था। तो इसका जवाब आप इस रूप में समझ सकते हैं कि बिहार को तब यही पसंद था। जिस लालू को जमाने में बिहार के सभी धर्म, जाति, संप्रदाय के लोगों ने 1990 में मदद की थी उन्हीं लोगों ने 2005 में लालू को उखाड़ दिया। लालू को उखाड़ने के लिए बिहार में किसी को बाहर से नहीं बुलाना पड़ा। लालू के साथी रहे लोगों ने ही उन्हें धरातल का रास्ता दिखाया था। अब चूंकि नीतीश के राज में लालू-राबड़ी राज की तरह कोई बड़ी शिकायत नहीं मिली है कि इसे धरातल का रास्ता अभी ही दिखा दिया जाए। अभी तो बिहार के पुनर्निर्माण की शुरुआत है। लिहाजा बिहार के हर धर्म, जाति, संप्रदाय. बड़े, छोटे लोगों को बिहार के विकास में अपनी भागीदारी को सुनिश्चित करने का वक्त आया है। उम्मीद है इस बार अपने बिहार को और बेहतर बनाने के लिए बिहार बेहतर फैसला करेगा। आदमी उम्मीद किससे करता है, उसी से जो उसकी उम्मीदों पर खड़ा उतरता है। पहले के लोग उम्मीद नहीं करते थे, अब किसी ने उम्मीद करना सिखाया तो लोग उम्मीद करने लगे हैं। शायद यही वजह है कि लोग नीतीश कुमार से और ज्यादा उम्मीद कर रहे हैं...जिन उम्मीदों पर नीतीश की सरकार खड़ी नहीं उतरी उसी को भुनाने में लगे हैं सरकार के विरोधी। उपर ही मैंने जिक्र किया कि बहुत कुछ करने की जरूरत है सो एक बार उसी उम्मीद के भरोसे बिहार का बेहतर भविष्य चुनिए, ताकि बिहार से बाहर रहने वाले लोग अपने बिहार की दुहाई दे सके। लेकिन सवाल अब भी है कि क्या नीतीश के विकास पर बटन दबाएगा बिहार।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-3724516638534204310?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/3724516638534204310/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=3724516638534204310' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/3724516638534204310'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/3724516638534204310'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/09/blog-post_4193.html' title='नीतीश के विकास पर बटन दबाएगा बिहार!'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TJtjOe4lJ3I/AAAAAAAAABw/9PqPrSfY6GU/s72-c/manojkk.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-6529430953157832087</id><published>2010-09-21T20:46:00.000+05:30</published><updated>2010-09-21T21:52:35.681+05:30</updated><title type='text'>बिहार चुनाव 2010 : कुछ सत्य</title><content type='html'>27 सितंबर को पहले दौर के चुनाव के लिए बिहार में अधिसूचना जारी होगी। फिलहाल चुनाव से पहले दल बदल का काम जोरों पर है। बिहार के चुनाव में दिलचस्पी रखने वाले लोग ये जानना जरूर चाहेंगे कि कौन सा नेता अभी किस पार्टी में चला गया है। लिस्ट लंबी है। नजर डालिए।&lt;br /&gt;1.अखिलेश सिंह(पूर्व केंद्रीय मंत्री) आरजेडी छोड़कर कांग्रेस में जा चुके हैं।&lt;br /&gt;2.सुभाष यादव,आरजेडी से इस्तीफा,जेडीयू,ददन पहलवान की पार्टी में तय नहीं।&lt;br /&gt;3.तस्लीमुद्दीन(पूर्व केंद्रीय मंत्री), आरजेडी छोड़ जेडीयू में शामिल।&lt;br /&gt;4.सरफराज आलम, तस्लीमुद्दीन के बेटे, आरजेडी छोड़ जेडीयू में शामिल&lt;br /&gt;5.इजहार अहमद(लोजपा विधायक, घनश्यामपुर) जेडीयू में शामिल&lt;br /&gt;6.विजेंद्र चौधरी(निर्दलीय विधायक), मुजफ्फरपुर अब लोजपा में शामिल&lt;br /&gt;7.राजेश सिंह(आरजेडी विधायक, धनहा) अब जेडीयू में शामिल&lt;br /&gt;8.जमशेद अशऱफ(जेडीयू विधायक)बलिया, अब कांग्रेस में शामिल&lt;br /&gt;9.सुखदेव पासवान, पूर्व सांसद(अररिया) बीजेपी से लोजपा अब कांग्रेस में शामिल&lt;br /&gt;10.नागमणि(पूर्व मंत्री), जेडीयू से आरजेडी अब कांग्रेस में शामिल&lt;br /&gt;11.सुचित्रा सिन्हा(कुर्था से जेडीयू विधायक), नागमणि की पत्नी अब कांग्रेस में शामिल&lt;br /&gt;12.प्रभुनाथ सिंह(पूर्व सांसद, महाराजगंज) जेडीयू से आरजेडी में शामिल&lt;br /&gt;13.अनिल कुमार (भोरे विधायक, आरजेडी) कांग्रेस में शामिल&lt;br /&gt;14.गिरिधारी यादव(पूर्व सांसद, बांका) आरजेडी से कांग्रेस अब जेडीयू में शामिल&lt;br /&gt;15.अरुण सिंह(पूर्व सांसद,जहानाबाद)जेडीयू,लोजपा,कांग्रेस होते जेडीयू में शामिल&lt;br /&gt;16.राम लखन महतो(दलसिंहसराय से आरजेडी विधायक), अब जेडीयू में शामिल&lt;br /&gt;17.अच्युतानंद सिंह(लोजपा विधायक, जन्दाहा) अब बीजेपी में शामिल&lt;br /&gt;18.उपेंद्र कुशवाहा(पूर्व विधायक), जेडीयू, एनसीपी, होते हुए फिर जेडीयू में शामिल &lt;br /&gt;19. श्याम रजक(आरजेडी रमई राम(आरजेडी से कांग्रेस)जेडीयू में शामिल हो चुके हैं।&lt;br /&gt;20.आनंद मोहन पत्नी लवली के साथ अभी कांग्रेस में हैं।&lt;br /&gt;21.पप्पू यादव भी पत्नी के साथ अभी कांग्रेस में हैं।&lt;br /&gt;22.कांटी विधायक अजीत कुमार अभी तो जेडीयू में हैं।&lt;br /&gt;23.राजन तिवारी, लोजपा में हैं जेल में बंद।&lt;br /&gt;24.जगन्नाथ मिश्रा, पुत्र नीतीश के साथ फिर से जेडीयू के साथ हैं।&lt;br /&gt;25.सांसद ललन सिंह, तकनीकी तौर पर जेडीयू में हैं, दिल कांग्रेस में।&lt;br /&gt;26.कैप्टन जयनाराण निषाद, मुजफ्फरपुर सांसद, जेडीयू से नाराज&lt;br /&gt;27.पूर्णमासी राम, सांसद गोपालगंज, जेडीयू से नाराज&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-------------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नवंबर 2005 चुनाव के कुछ जानने वाले तथ्य-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जेडीयू और बीजेपी ने तालमेल कर 139 और 102 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे&lt;br /&gt;जेडीयू को 88 सीटें मिली थी, बीजेपी को 55&lt;br /&gt;आरजेडी ने कांग्रेस से तालमेल किया था। आरजेडी 175, कांग्रेस 51 सीटों पर लड़ी थी।&lt;br /&gt;आरजेडी को 54, कांग्रेस को तब 9 सीटें मिली।&lt;br /&gt;आरजेडी ने 10 सीटें सीपीएम के लिए छोड़ी थी। , एक पर जीत मिली&lt;br /&gt;लोजपा ने सीपीआई, फॉरवर्ड ब्लॉक, आरएसपी से तालमेल किया था।&lt;br /&gt;203 सीटों पर लड़कर लोजपा ने 10 सीटें जीती&lt;br /&gt;35 सीटों पर लड़के सीपीआई को 3 सीटें मिली।&lt;br /&gt;---------------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;पहले दौर का चुनाव 21 अक्टूबर&lt;/strong&gt;, दिन गुरुवार को 47 सीटों पर होगा।&lt;br /&gt;27 सितंबर से 4 अक्टूबर तक नामांकन, 5 को नामंकन पत्रों की जांच&lt;br /&gt;7 अक्टूबर को नाम वापस लेने की अंतिम तारीख होगी।&lt;br /&gt;मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, मधेपुरा, सहरसा की 47 सीटें।&lt;br /&gt;जेडीयू के पास अभी 16,बीजेपी 13, आरजेडी 5,कांग्रेस के पास 4 अन्य 8 सीटें हैं।&lt;br /&gt;(किशनगंज में एक सीट बढ़ा है)&lt;br /&gt;---------------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दूसरे दौर का चुनाव 24 अक्टूबर &lt;/strong&gt;दिन रविवार को 45 सीटों पर होगा।&lt;br /&gt;29 सितंबर से 6 अक्टूबर तक नामांकन ,7 को जांच, 9 को नाम वापसी की आखिरी तारीख।&lt;br /&gt;शिवहर,सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर,दरभंगा,समस्तीपुर,मोतिहारी&lt;strong&gt;(12 में से 5 सीट)&lt;/strong&gt; की 45 सीटें।&lt;br /&gt;जेडीयू के पास अभी 13,बीजेपी 7, आरजेडी के पास 18, एलजेपी 3, कांग्रेस 1, अन्य 2&lt;br /&gt;(दरभंगा में एक नई सीट )&lt;br /&gt;-----------------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;तीसरे दौर का चुनाव 28 अक्टूबर&lt;/strong&gt; गुरुवार को 48 सीटों पर होगा। &lt;br /&gt;4 अक्टूबर से 11 अक्टूबर तक नामांकन,12 को जांच,14 नाम वापसी की आखिरी तारीख।&lt;br /&gt;बेतिया, मोतिहारी, गोपालगंज, सीवान, छपरा, वैशाली की 48 सीटें।&lt;br /&gt;जेडीयू के पास अभी 15, बीजेपी 14, आरजेडी 11, लोजपा 3, कांग्रेस 1,बीएसपी 1, अन्य 2&lt;br /&gt;(मोतिहारी में एक नई सीट)&lt;br /&gt;-------------------------------------------------------------------------------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-6529430953157832087?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/6529430953157832087/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=6529430953157832087' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/6529430953157832087'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/6529430953157832087'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/09/2010.html' title='बिहार चुनाव 2010 : कुछ सत्य'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-3348720738468421079</id><published>2010-09-19T21:24:00.000+05:30</published><updated>2010-09-22T19:55:31.100+05:30</updated><title type='text'>कांग्रेस के आंगन में किलकारी...</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TJZG1MPdXYI/AAAAAAAAABQ/EC_LTWFaGCg/s1600/cong.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 275px; height: 183px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TJZG1MPdXYI/AAAAAAAAABQ/EC_LTWFaGCg/s320/cong.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5518676273022197122" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;20 साल बाद बिहार कांग्रेस के आंगन में किलकारी गूंज रही है। बीते 20 साल में कांग्रेस की यहां जो स्थिति थी वो किसी से&lt;br /&gt;छिपी नहीं है। सालों तक यहां कांग्रेसियों ने राज किया लेकिन एक बार हाथ से सत्ता निकली तो फिर पिछलग्गु बनकर रह गये।&lt;br /&gt;90 में लालू के सत्ता में आने के वक्त भी पार्टी हार भले गई थी लेकिन स्थिति बेहतर थी.. लेकिन धीरे धीरे नाम लेने वाला&lt;br /&gt;कोई नहीं बचा। सबसे बुरा वक्त तो कांग्रेसियों के लिए रहा 2004-2005 का। पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा, कभी कांग्रेस विधायक दल के नेता (विपक्ष के नेता) रहे रामाश्रय प्रसाद सिंह, प्रदेश अध्यक्ष रामजतन सिन्हा जैसे जन्मजात कांग्रेसियों ने पार्टी से नाता तोड़ लिया। अपने राजनीतिक फायदे के लिए कोई नीतीश के साथ गया तो कोई पासवान के साथ। लेकिन एक बार&lt;br /&gt;फिर से दिन फिरने को है। पटना के सदाकत आश्रम में इन दिनों दिन में ही दिवाली मन रही है। रोज मिलन समारोह आयोजित हो रहे हैं। &lt;br /&gt;आज बिहार में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं है। साल 2005 के विधानसभा चुनाव में लालू से तालमेल कर कांग्रेस के 51 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे। 9 सीटों पर जीत मिली। कुल 6.09 फीसदी वोट मिले, यानी 51 उम्मीदवारों को मिले 14 लाख 35 हजार 449 वोट। लेकिन लोकसभा 2009 के चुनाव में हालात बदल गये। हालांकि पार्टी को एक सीट का नुकसान हुआ लेकिन अकेले चुनाव लड़कर भी दो सीटों पर जीत मिली, और राज्य में कांग्रेस को जिंदा करने में मजबूती मिली। 2009 के लोकसभा चुनाव में आरजेडी से नाता तोड़ कांग्रेस ने जो फसल बोने का काम किया था अब उसे इस विधानसभा चुनाव में उसके काटने का वक्त आ गया है। हालांकि कांग्रेस के पास बिहार में अब भी कोई सबसे बड़ा सर्वमान्य चेहरा नहीं है जिसके दम पर वोट मांगने की पार्टी हिम्मत कर सके। लेकिन बदले हालात में पार्टी किसी भी गठबंधन (लालू या नीतीश)को चुनौती देने की हैसियत में है इससे इनकार नहीं कर सकते। तभी तो लगातार नीतीश और लालू दोनों कांग्रेस पर वार करते दिख रहे हैं। अब खासियत देखिए कांग्रेस का जो शुरुआती आधार वोट रहा है उसका झुकाव फिर से पार्टी की ओर लौट रहा है। विधानसभा उपचुनाव 2009 में इसकी झलक देखने को मिली थी। देश की वर्तमान विषम राजनीतिक परिस्थितियों को भुनाने में विपक्षी नाकाम है लिहाजा बिहार में कांग्रेस को ललकारने का घाटा नीतीश और लालू को ही है।  बाद इसके आज की तारीख में बिहार के ज्यादातर बाहुलबली कांग्रेस का दामन भी थामे हुए हैं। कोसी के इलाके में आनंद मोहन हों या फिर पप्पू यादव। लालू के साले साधु यादव भी कांग्रेस में ही हैं। रही सही कसर को संपूर्ण करने के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री अखिलेश सिंह पहुंचने वाले हैं। कांग्रेस की स्ट्रेटजी पर गौर करें तो उसकी कोशिश बिहार के हर इलाके से एक बड़ा नाम और बड़े चेहरे को अपने साथ जोड़ने की है। अब अररिया के पूर्व बीजेपी सांसद सुखदेव पासवान भी कांग्रेसी हो गये हैं। बिहार में 21 अक्टूबर को पहल पहले दौर की वोटिंग है। और आज की तारीख में पार्टी सबसे मजबूत स्थिति में इसी इलाके में हैं। आनंद मोहन, पप्पू यादव भले जेल में हैं लेकिन इन बाहुबली पूर्व सांसदों की पूर्व सांसद पत्नियां कमान संभालने के लिए काफी है। दलित वोटरों के लिए इस इलाके में कभी सबसे बड़ा चेहरा रहे सुखदेव पासवान भी अब साथ हो गये हैं। प्रदेश अध्यक्ष और पार्टी के युवा अल्पसंख्यक चेहरा महबूब अली कैसर भी इसी इलाके से आते हैं। पहले दौर के चुनाव में अगर कांग्रेस अपने इन धुरंधरों के जरिये सही टिकट बंटवारे के साथ वोट मैनजमेंट का पुख्ता इंतजाम कर लेती है। तो इसका बड़ा संदेश बिहार के बाकी इलाकों में जाएगा, जो विरोधियों के प्राण सूखाने के लिए काफी हो सकता है। कांग्रेस की कमोबेश कोशिश यही होनी चाहिए। अखिलेश सिंह के पार्टी में शामिल होने के बाद बड़े भूमिहार नेता की जो कमी हो गई थी वो कमी भी पूरी हो जाएगी। 20 साल तक नीतीश की सियासत को चमकाने के लिए रणनीति बनाने वाले सांसद ललन सिंह के बारे में लगातार कहा जा रहा है कि इन दिनों वो कांग्रेस के लिए समीकरण बना रहे हैं... ऐसी बात है तो ये शुभ संकेत है पार्टी के लिए। पाला बदलने वाले नेताओं की आज की तारीख में कांग्रेस पहली पसंद हैं। लोकसभा टिकट न देने से नाराज दलबदल के माहिर खिलाड़ी नागमणि हों या फिर शराब के मुद्दे पर नीतीश सरकार में मंत्री पद छोड़ने वाले जमशेद अशऱफ, या अब गोपालगंज के भोरे से विधायक अनिल कुमार । इतना ही नहीं पूर्व सांसद और पूर्व विधायक तो थोक के भाव में हर हफ्ते शामिल हो रहे हैं। कांग्रेस चूंकि दिल्ली से डील होने वाली पार्टी है लिहाजा हर नेता को शामिल कराने से पहले दिल्ली से हरी झंडी की जरूरत पड़ती है। इसी बीच में अगर पुराने बॉस को मालूम हो गया तो मनाने, बचाने का ऑपरेशन शुरू हो जाता है। इसके चक्कर में कांग्रेस के मिलन समारोह वाली लिस्ट और लंबी नहीं हो पाई है। खबर तो ये भी है कि लालू के दूसरे साले सुभाष यादव भी कांग्रेस की ओर टकटकी लगाये बैठे हैं.. लेकिन जब तक साधु यहां डेरा जमाये हैं तब तकउनका आना डाउटफुल लग रहा है लेकिन राजनीति में कुछ साफ साफ आप कह भी नहीं सकते। पूर्व सांसद जयप्रकाश यादव को भी भाव नहीं मिल रहा सो वो भी लालू से कन्नी काटे हुए है आश्चर्य न हो किसी दिन उनके कल्टी मारने के बारे में भी सुन सकते हैं। कहने का मतलब ये कि कांग्रेस का आधार मजबूत तो हुआ है इसमें कोई आश्चर्य तो है नहीं। वैसे भी सहरसा में राहुल गांधी की जो रैली हुई उसको देखकर उस इलाके में जेडीयू और आरजेडी दोनों के कान खड़े हो चुके हैं. पहले चरण में कोसी और पूर्णिया के जिन 47 सीटों पर चुनाव होने हैं उनमे से एनडीए के पास 29 सीटें हैं। (16 जेडीयू और 13 बीजेपी), लालू के पास 5 है तो कांग्रेस के पास 4 सीटें। मतलब थोक के भाव में खोने का आइटम यहां जेडीयू और बीजेपी के पास ही है। बिहार में कांग्रेस के नाम पर कोई बड़ा चेहरा भले न हो लेकिन अगर जातीय हिसाब से बांट दें तो... अल्पसंख्यकों के सबसे बड़े चेहरे तो खुद प्रदेश अध्यक्ष महबूब अली कैसर हैं।&lt;br /&gt;राष्ट्रीय प्रवक्ता शकील अहमद, किशनगंज वाले सांसद असरारूल हक हैं। 2005 के चुनाव में जो 9 विधायक जीते थे उनमें से चार मुसलमान थे। बाद में कैसर और जमशेद अशरफ के बाद गिनती बढ़ गई।  दलित चेहरे के रूप में विधायक दल के नेता अशोक राम के अलावा ताजा ताजा पार्टी में आए सुखदेव पासवान को भी गिन लीजिए। (मीरा कुमार लोकसभा अध्यक्ष हो चुकी हैं) भूमिहार फेस वैसे तो रामजतन सिन्हा, अनिल शर्मा, महाचंद्र प्रसाद सिंह, शाही और पांडे खानदान जैसे लोग भी हैं.. लेकिन अखिलेश सिंह और ललन सिंह जैसे बड़े नाम के जुड़ने के बाद ताकत और ज्यादा बढ़ने की उम्मीद की जा सकती है। राजपूतों में लवली आनंद अपने आप में चेहरा है।  लालू के यादव वोट में सेंधमारी के लिए कोसी, पूर्णिया में पप्पू यादव, और खुद लालू के घर वाले इलाके में साले साधु यादव। कुर्मी के वोट मिलने की गारंटी तो कांग्रेस के कोई भी बड़े नेता नहीं दे सकते लेकिन सदानंद सिंह अपने क्षेत्र में कार्यकर्ताओं को भरोसा दे रहे हैं। रही बात 6 फीसदी वोट वाले कोइरी की तो नागमणी खुद को राज्य के सबसे बड़े कोइरी नेता मानते हैं.. 6 फीसदी पर न सही जहानाबाद, औरंगाबाद, पटना में थोड़ा बहुत प्रभाव तो है ही। वैसे भी नाम तो बड़ा ही है। कमी दिखती है तो ब्राह्मण नेता की। मिथलांचल इलाके में कांग्रेस को एक बड़ा नेता चाहिए... प्रेमचंद्र मिश्रा जैसे लोग भले ही पार्टी के लिए पुराने हों  ऑफिस के लिए ठीक हैं वोट मांगने के लिए नहीं कह सकते। कहने का मतलब ये कि बिहार कांग्रेस के प्रभारी मुकुल वासनिक बड़ी ही महीनी से पार्टी के लिए ऑपरेशन चला रहे हैं। बिहार में नए बाहुबलियों की पहली च्वाइस भी कांग्रेस ही है। पिछले दो हफ्ते में पटना हवाई अड्डे से लेकर पार्टी कार्यालय तक मीडिया से बात करते मुकुल वासनिक की कोई भी तस्वीर देख लीजिए, उनके आसपास खड़े लोगों को जो जानते हैं आसानी से पहचान लेंगे। मुकुल वासनिक अपने स्ट्रेटजी में सफल होते दिख रहे हैं... अभी तक अनुशासन भंग होने की कोई खबर कांग्रेस के खेमे से नहीं आई है। पुराने दिन याद कीजिए अनिल शर्मा अध्यक्ष थे और हर मीटिंग में कुछ न कुछ खरमंडल होता था। लालू और पासवान से नाता तोड़कर कांग्रेस ने सिर्फ इन दोनों की मुश्किलें नहीं बढ़ाई हैं.. धड़कन नीतीश की भी तेज है। लालू से नाता तोड़ने का फायदा ही है कि एक तीसरा मजबूत विकल्प बिहार में तैयार हो गया है। इस चुनाव में 20 से 25 सीटें भी मिल जाती है (जो कि मिल सकती है) तो सत्ता की चाबी कांग्रेस के हाथ में होगी। लेकिन सवाल ये कि क्या त्रिशंकु विधानसभा की सूरत में कांग्रेसी फिर लालू-पासवान से दोस्ती करेंगे। या बिहार में नीतीश के साथ कांग्रेस का नया गठबंधन बनेगा। नतीजों का इंतजार कीजिए। पहले चरण के चुनाव के बाद ही कांग्रेस की हैसियत की तस्वीर साफ हो जाएगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-3348720738468421079?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/3348720738468421079/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=3348720738468421079' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/3348720738468421079'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/3348720738468421079'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/09/blog-post_19.html' title='कांग्रेस के आंगन में किलकारी...'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TJZG1MPdXYI/AAAAAAAAABQ/EC_LTWFaGCg/s72-c/cong.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-2182349058216408550</id><published>2010-09-15T19:22:00.000+05:30</published><updated>2010-09-15T20:36:35.919+05:30</updated><title type='text'>विकास या जाति कौन पड़ेगा भारी ? PART -4</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TJDgEdkF1-I/AAAAAAAAABI/Iu24lUz0LS0/s1600/upendra.bmp"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 220px; height: 165px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TJDgEdkF1-I/AAAAAAAAABI/Iu24lUz0LS0/s320/upendra.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5517155910788962274" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बिहार में कुर्मी और कोइरी को एक दूसरे का पूरक माना जाता है। नीतीश कुमार कुर्मी बिरादरी से हैं। 1994 में जब जनता दल का विभाजन हुआ था और समता पार्टी बनी तो बिहार में लोग इसे कुर्मी-कोइरी की पार्टी कहते थे। हालांकि बिहार में कोइरी वोटरों की संख्या कुर्मी से ज्यादा है। दोनों मिलाकर करीब 11 फीसदी के आसपास है। कुर्मी 5 और कोइरी 6 फीसदी। नीतीश कुमार के राजनीतिक उदय से पहले कोइरी जाति के नेता बिहार की राजनीति में ज्यादा प्रभावशाली थे। 90 के दशक में&lt;br /&gt;बिहार में कुर्मी के सबसे बड़े नेता हुआ करते थे सतीश कुमार इनके बाद वृषण पटेल(तब सीवान के सांसद) थे। 94 में बिहार में कुर्मी चेतना महारैली में नीतीश कुमार का उदय हुआ और सतीश कुमार की दुकानदारी पर नीतीश ने कब्जा कर लिया। तब से लेकर अब तक बिहार में कुर्मी जाति के सर्वमान्य नेता नीतीश कुमार ही हैं। नीतीश जब मजबूत हुए तो लालू ने अपना नारा बदल दिया...भूराबाल साफ करो कहने वाले लालू ने तब नारा दिया... भूरा बाल माफ करो, कुर्मी-कोइरी साफ करो। लेकिन सच्चाई समझिए जैसे जैसे नीतीश मजबूत होते गये कुर्मी समुदाय से ज्यादा प्रभावशाली कोइरी समुदाय के नेता बैकफुट पर आने लगे। लेकिन सियासत के चाणक्य नीतीश को अपने 'बड़े भाई' की ताकत का अंदाजा था, लिहाजा कभी सीधे सीधे वार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। चेक एंड बैलेंस वाले फॉर्मूले पर चलते हुए कभी भगवान सिंह को आगे किया तो कभी उपेंद्र कुशवाहा को, मौका पड़ने पर नागमणि को भी साथ ले आए। भगवान सिंह कुशवाहा को युवा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया। विधानसभा में विधायक दल के उपनेता की भी जिम्मेदारी दी। भगवान सिंह से थोड़ा मोहभंग हुआ तो झारखंड बनने के बाद समता पार्टी के विधायकों की संख्या जब बीजेपी से ज्यादा हो गई तो जन्दाहा से पहली बार विधायक बने उपेंद्र कुशवाहा को विपक्ष का नेता बना दिया। बिहार में नीतीश के बाद तब पार्टी में नंबर दो के पोजीशन पर पहुंच गये थे उपेंद्र कुशवाहा, 2005 के विधानसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा दलसिंहसराय से हार गये। हारने के बाद पार्टी में पोजीशन घट गया। उपमुख्यमंत्री की चाहत पाले हुए थे। लेकिन नीतीश से संबंध बिगड़े और पार्टी से बाहर हो गये। जेडीयू से बाहर होने के बाद उपेंद्र कुशवाहा एनसीपी में गये, फिर अपनी पार्टी बना ली। लेकिन राजनीतिक हस्ती घटती चली गई। 2005 में ही विधानसभा चुनाव के वक्त पार्टी-पार्टी घूमते हुए नागमणि भी नीतीश के साथ आ गए। नागमणि की पत्नी सुचित्रा सिन्हा को कुर्था से टिकट मिला और वो जीत गई। नागमणि तब कोइरी के बड़े नेता के रूप में स्थापित हुए जगदेव प्रसाद के सुपुत्र हैं और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री सतीश प्रसाद सिन्हा के दामाद। लोकसभा चुनाव के वक्त नीतीश ने टिकट देने से मना कर दिया तो लालू की पार्टी में चले गए। नागमणि के पार्टी से जाने के बाद नीतीश की पार्टी में कोइरी का दमदार नेता नहीं रह गया था सो एक बार फिर उपेंद्र कुशवाहा से संपर्क साधा गय़ा.. और बिहार की राजनीति में हासिये पर चल रहे उपेंद्र कुशवाहा ने इस ऑफर को सहर्ष स्वीकार कर लिया। हालांकि उपेंद्र कुशवाहा की वापसी पार्टी के लिए भारी पड़ी और नीतीश के सबसे अजीज ललन सिंह नाराज हो गये। बाद में बिहार का अध्यक्ष पद भी छोड़ दिया। कहने का मतलब ये कि कोइरी वोट पाने के लिए नीतीश कुमार ने हर वो तिकड़म किये जो एक मंझे हुए नेता के लिए जरूरी होता है। नीतीश जिस इलाके से आते हैं वहां कुर्मी सबसे ज्यादा है तो कोइरी भी कम नहीं है। वैसे कोइरी की कई प्रजातियां भी हैं जो बिहार के हर इलाके में किसी न किसी जाति के रूप में अच्छी संख्या में हैं। नागमणि के जाने से जो जगह खाली थी उसको उपेंद्र कुशवाहा से भरने की कोशिश की गई। वैसे नीतीश ने भोजपुर इलाके के लिए भगवान सिंह कुशवाहा(जगदीशपुर विधायक, ग्रामीण विकास मंत्री) और तिरहुत के लिए दिनेश प्रसाद कुशवाहा(मीनापुर विधायक, लघु सिंचाई मंत्री) को भी मंत्री बनाकर अपना आधार मजबूत किया। नौतन वाले वैद्यनाथ महतो को सांसद बनावाय. उपेंद्र कुशवाहा को पार्टी में लाने के बाद उन्हें राज्यसभा भेजा गया। लेकिन उपेंद्र कुशवाहा को बैलेंस करने के लिए दलसिंहसराय से आरजेडी के विधायक रामलखन महतो (कोइरी) को जेडीयू में शामिल कराया। अब खबर ये है कि उपेंद्र कुशवाहा इससे नाराज हैं। खैर कहने का मतलब ये कि कोइरी वोट खिसके न इसके लिए नीतीश लगातार तिकड़म पर तिमड़म लगाने में जुटे हुए हैं। कारण भी है कोइरी के एक वर्ग का नेतृत्व आरजेडी के कोइरी नेताओं के हाथ में है। समस्तीपुर में कोइरी वोटरों की संख्या ज्यादा है। मंजय लाल पहले वहां से सांसद हुआ करते थे , बाद में आलोक मेहता सांसद बने। दोनों कोइरी। मंजय लाल की मामला निपट चुका है लेकिन आलोक मेहता कोइरी के नौजवानों की अगुवाई करते हैं। हालांकि बीते लोकसभा चुनाव में उनकी ही स्वजातीय अश्वमेघ देवी (जेडीयू)ने उन्हें हरा दिया। उपेंद्र वर्मा, शकुनी चौधरी भागलपुर, मुंगेर इलाके में लालू का मोर्चा संभाले हुए हैं। शकुनी चौधरी बहुत पहले कांग्रेस में थे। 94 में समता पार्टी बनी तो नीतीश के साथ हो लिए, बाद में मन नहीं माना और लालू के साथ हो गए। शकुनी चौधरी को खुश करने के लिए उनके बेटे सम्राट चौधरी को ही लालू ने मंत्री बना दिया था जिसको लेकर खूब बवाल हुआ और लालू की किरकिरी हुई क्योंकि सम्राट चौधरी की उम्र ही 25 साल की नहीं थी। हालांकि जब उम्र हुई तो फिर से मंत्री बनाकर कोइरी आधार को जोड़े ऱखने की लालू ने खूब कोशिश की। तुलसीदास मेहता वैशाली, समस्तीपुर के इलाके में लालू का मोर्चा संभालते थे, अब उनके बेटे आलोक मेहता संभाल रहे हैं। कहने का मतलब ये कि कोइरी वोट नीतीश के साथ आज भी पूरी तरह नहीं है। लिहाजा नीतीश को अपने इस आधार वोट को बनाए रखने के लिए जोड़ तोड़ का गणित करना पड़ रहा है। मतलब साफ है कि विकास भी बात इस समुदाय के सामने भी अहम नहीं है...अब नागमणि पत्नी के साथ कांग्रेसी हो गये हैं। बिहार में अभी कोइरी जाति के करीब बीस विधायक हैं, वहीं कुर्मी जाति से 15। अब सवाल ये कि कोइरी के करीब 6 फीसदी वोटर क्या करेंगे.... लालू, नीतीश और कांग्रेस तीनों को बांटेंगे या फिर लव-कुश का फॉर्मूला हिट कराकर अपने भाई नीतीश को मजबूती देंगे। वैसे इतिहास पलटकर देखिये तो पिछली बार भी कोइरी का वोट पूरी तरह नीतीश को नहीं मिल पाया था। उस वक्त उपेंद्र कुशवाहा और नागमणि दोनों इनके साथ थे। इस बार रामलखन महतो क्या नागमणि की भरपाई करेंगे, क्या दसलिंहसराय में उपेंद्र कुशवाहा रामलखन महतो के लिए वोट मांगेंगे...वक्त बताएगा कि कोइरी का ऊंट किस करवट बैठता है। लेकिन एक बात जो अभी साफ है वो ये कि यदि 'विकास पुरुष' को अपने विकास पर भरोसा होता तो इस आधार वोट को जोड़े रखने के लिए इतना जोड़ घटाव नहीं सोचना होता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-2182349058216408550?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/2182349058216408550/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=2182349058216408550' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/2182349058216408550'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/2182349058216408550'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='विकास या जाति कौन पड़ेगा भारी ? PART -4'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TJDgEdkF1-I/AAAAAAAAABI/Iu24lUz0LS0/s72-c/upendra.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-1536439450338970590</id><published>2010-09-14T19:36:00.000+05:30</published><updated>2010-09-14T20:33:23.923+05:30</updated><title type='text'>विकास या जाति, कौन पड़ेगा भारी ? PART 3</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TI-Oqn4LAqI/AAAAAAAAABA/N443IuC4Bn4/s1600/2010080854720501.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 241px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TI-Oqn4LAqI/AAAAAAAAABA/N443IuC4Bn4/s320/2010080854720501.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5516784931462382242" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बिहार चुनाव से पहले इस बार राजपूतों का समीकरण एकदम से बदलता नजर आ रहा है। वैसे तो आज की तारीख में कोई सर्वमान्य नेता नहीं है। लेकिन आनंद मोहन, प्रभुनाथ सिंह और दिग्विजय सिंह अब नीतीश कुमार के साथ नहीं हैं। इन तीनों नेताओं का अपने अपने इलाके में बड़ा दबदबा है। राजपूत समाज में इनकी पूछ है। दिग्विजय सिंह तो अब इस दुनिया में नहीं रहे। लेकिन जाने से पहले उन्होंने नीतीश के खिलाफ राजपूतों का एक बड़ा प्लेटफॉर्म तैयार कर दिया। भागलपुर, बांका, जमुई, मुंगेर के इलाके में दिग्विजय सिंह की बड़ी पकड़ थी। बिहार में जब से नीतीश मुख्यमंत्री बने जॉर्ज खेमे के नेता दिग्विजय सिंह को साइड करके ही चले। सरकार बनने के बाद प्रभुनाथ सिंह की भी कोई पूछ नहीं रह गई थी। इलाका का अफसर इस बाहुबली नेता की बात नहीं सुनता था, लिहाजा समर्थकों में मार्केट खराब होता गया। आनंद मोहन को तो खैर इनके कार्यकाल में कोर्ट ने फांसी की सजा दी है। पिछली बार इन तीनों की ताकत नीतीश के साथ थी। नतीजा देखिये प्रभुनाथ सिंह के प्रभाव वाले छपरा की 10 सीटों में से 5 पर जेडीयू ने कब्जा किया। 2 सीट बीजेपी के खाते में।(छपरा लालू का गढ़ तो था ही), सीवान में भी 8 में से 3 जेडीयू और 2 बीजेपी को मिली थी। 2000 के चुनाव में इन दोनों जिले से सिर्फ एक सीट पर समता पार्टी को कामयाबी मिली थी। &lt;br /&gt;आनंद मोहन की बात करें तो 2005 फरवरी के चुनाव में पत्नी लवली जेडीयू के टिकट पर बाढ़ से चुनाव जीती थी। नवंबर का चुनाव लवली नहीं लड़ी थीं। वैसे आनंद मोहन के प्रभाव वाले कोसी के इलाके में जेडीयू को जबरदस्त सफलता मिली। लालू जिस मधेपुरा से सांसद थे उस जिले की पांच में से 5 सीटें जेडीयू को। सहरसा में कुल 4 सीटों में से 2 जेडीयू को, सुपौल की 5 में से 5 सीटें जेडीयू को मिली थी। इन इलाके में आरजेडी का खाता तक नहीं खुला था। लेकिन परिस्थितियां कैसे बदली वो भी देख लीजिए। सहरसा की जिस सिमरी बख्तियारपुर सीट से दिनेश चंद्र यादव विधायक थे। लोकसभा चुनाव जीतकर दिल्ली पहुंचे लेकिन विधानसभा उपचुनाव में पार्टी को सीट नहीं दिलवा सके। आनंद मोहन की पत्नी लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में चली गई थी। आनंद मोहन के समर्थन से महबूब अली कैसर उपचुनाव में कांग्रेस के टिकट पर इस सीट से जीत गए।&lt;br /&gt;वैसे एक सच्चाई ये भी है आनंद मोहन के जेल में होने की वजह से उनका पुराना वाला जलवा कायम नहीं रह गया है। इसी का नतीजा हुआ कि पत्नी को शिवहर से लोकसभा चुनाव में हार मिली। नीतीश कुमार एक शादी समारोह में जब सहरसा गये थे तो आनंद मोहन की मां से मिले थे। चर्चा हो चली थी कि आनंद मोहन नीतीश का साथ देंगे। खुद पूर्व सांसद अरुण कुमार सिंह भी संपर्क में थे। लेकिन आनंद मोहन ने कांग्रेस का हाथ नहीं छोड़ने का फैसला किया है। तभी तो राहुल गांधी की सहरसा वाली रैली में लवली ने मंच पर आकर धुंधली तस्वीर साफ कर दी। आनंद मोहन को आरजेडी में भी लाने की कोशिश हो रही थी&lt;br /&gt;विधानसभा चुनाव में तालमेल के तहत सहरसा की सोनबरसा सीट पासवान किशोर कुमार मुन्ना के लिए एलजेपी के खाते से चाहते थे लेकिन लालू ने मना कर दिया। अटकलें थी कि लवली शायद इस सीट पर आरजेडी से लड़े। कहने का मतलब अगर आनंद मोहन-लवली आनंद का खूंटा उखड़ गया(ऐसा कुछ लोगों का मानना है) तो ये लोग उनके पीछे क्यों लगे थे।  अब चूंकीं तस्वीर साफ हो चुकी है तो हो सकता है किशोर कुमार मुन्ना ही आरजेडी के टिकट पर यहां से लड़ जाए। मुन्ना भी राजपूत बिरादरी के हैं। आनंद मोहन की जब बीपीपा बनी थी तो मुन्ना स्टूडेंट पीपुल्स के अध्यक्ष थे। बाद में आनंद मोहन से संपर्क खराब हुआ तो अलग राजनीति करने लगे।  दिग्विजय सिंह ने भी नीतीश कुमार को लोकसभा चुनाव में अपनी ताकत का इजहार करा दिया। नीतीश ने नजरअंदाज किया तो लोकसभा चुनाव में निर्दलीय लड़े और जीत गये। अब वो नहीं हैं तो उनकी पत्नी पुतुल सिंह को लोकसभा टिकट देने की पेशकश की जा रही है, जेडीयू की ओर से ऐसा सुना जा रहा है। मतलब कहने का ये है कि राजपूतों के 5 फीसदी वोट को लेकर विकास पुरुष चिंतित तो हैं ही। वैसे भी उनके पास इस वक्त राजपूतों का कोई बड़ा नाम उनके साथ नहीं है। पूर्व विदेश राज्य मंत्री हरिकिशोर सिंह को खोज खाजकर नीतीश बाहर निकाल तो लाएं हैं.. लेकिन अब हरिकिशोर सिंह बहुत पुराने नेता हो गये। राजपूत वोटरों पर डोरा डालने के लिए ही पार्टी की बैठकों में इन दिनों पहली पंक्ति में उनको जगह दी जा रही है। राजगीर सम्मेलन जो 17-18 अगस्त के आसपास हुआ था उसमें देख लीजिए। मैनेज करने के लिए इनको योजना आयोग का बिहार में उपाध्यक्ष बनाया गया है। एक पीढ़ी को हरिकिशोर सिंह का नाम याद नहीं होगा, दूसरी पीढ़ी चेहरा देखने के बाद नाम पूछेगी.. इनको पहचानते हैं क्या नाम हैं इनका... टाइप से.... । और सांसद सुशील कुमार, मीना सिंह टाइप सांसद राजपूत के नाम पर नहीं वोट बैंक के नाम पर सांसद हैं। आरजेडी छोड़ जेडीयू में आए विजय कृष्ण जेल में ही हैं। लालू के पास चार सांसद हैं। चार में से तीन राजपूत हैं। रघुवंश सिंह पुराने सांसद हैं। वैशाली, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी के राजपूतों में इनका प्रभाव है। आरा, बक्सर के राजपूतों में जगतानंद सिंह का प्रभाव है। उधर छपरा सीवान में उमाशंकर सिंह पहले से थे अब तो प्रभुनाथ सिंह भी साथ हो लिए हैं लालू के। बीजेपी के पास राजपूत के नाम पर मोतिहारी के सांसद राधामोहन सिंह(पूर्व अध्यक्ष), उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह, राजीव प्रताप रूडी हैं ये लोग भी प्रभावी नेता हैं । कांग्रेस में तो मान लीजिए आनंद मोहन जेल में हैं, तो लवली है। निखिल कुमार की पत्नी श्यामा सिंह हैं। लोजपा में हरसिद्धि वाले महेश्वर सिंह हैं लेकिन उनका सीट सुरक्षित हो गया है केसरिया से लड़ने की तैयारी में हैं। लेकिन तालमेल वाला कंट्रोवर्सी कहीं समीकरण का माचो न कर दे। कुल मिलाकर साफ मामला ये है कि राजपूत वोटों के लिए चिंतित हर पार्टी है। बिहार में 5 फीसदी वोट लेकिन दबंग वोट। वैसे इतिहास देख लीजिए राजपूतों के वोट का बड़ा हिस्सा 2005 के चुनाव से पहले तक लालू को मिलता रहा। 2005 में लालू विरोधी लहर में एग्रेसिव होकर नीतीश को साथ दिया था लोगों ने।&lt;br /&gt;वैसे राजनीतिक जानकार कहते हैं कि राजपूत वोटर पार्टी को नहीं जाति के उम्मीदवार को प्राथमिकता देते हैं.. चाहे पार्टी कोई हो। सच्चाई भी है इसमें। लेकिन प्रचार और हवा बनाने के लिए बड़ा नाम तो चाहिए ही नहीं तो विरोधियों को कहने के लिए हो जाता है कि ये पार्टी में फलनवां जाति के कोई नेता न हई, बाहरो से कोई प्रचारे करे न अलई...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-1536439450338970590?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/1536439450338970590/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=1536439450338970590' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/1536439450338970590'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/1536439450338970590'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/09/part-3.html' title='विकास या जाति, कौन पड़ेगा भारी ? PART 3'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TI-Oqn4LAqI/AAAAAAAAABA/N443IuC4Bn4/s72-c/2010080854720501.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-8608137851322282436</id><published>2010-09-13T07:27:00.000+05:30</published><updated>2010-09-13T07:27:00.768+05:30</updated><title type='text'>विकास या जाति? कौन पड़ेगा भारी! PART- 1</title><content type='html'>बिहार में चुनावी बिगुल बजे एक हफ्ता से ज्यादा का वक्त बीच चुका है। टिकट का गुणाभाग शुरू है। सवाल ये कि क्या इस बार का चुनाव बिहार में बिना जातीय आधार पर लोग वोट करेंगे। क्या जमाने बाद बिहार जातीय बंधनों से मुक्त होकर सिर्फ विकास बनाक जंगलराज के नाम पर वोट करेगा। कुछ लोग भले ही माहौल बनाने की कोशिश में जुटे हो. लेकिन मेरा मानना है कि बिहार में बिना जातीय आधार के चुनाव नहीं कराए जा सकते। अगर बिहार में राज कर रहे नीतीश कुमार को विकास पर इतना ही भरोसा होता तो ललन सिंह को अध्यक्ष पद से हटाने के बाद विजय चौधरी को बक्से से निकालकर नहीं लाते। ललन सिंह के विद्रोह के बाद नीतीश कुमार के पास भूमिहार का कोई कद वाला नेता नहीं रह गया था। ललन सिंह की कमेटी में चूंकी विजय चौधरी अहम ओहदे पर थे लिहाजा उनके किस्मत से उनको ये गद्दी नसीब हो गई। संतुष्टि नहीं मिली थी जिस जगदीश शर्मा ने नीतीश के खिलाफ विद्रोह करके अपनी पत्नी को उपचुनाव में निर्दलीय विधायक बनवाया। उन्हें पार्टी से निलंबित करने के बाद तुरंत वापस नहीं बुलाते। लेकिन भरपाई संपूर्ण नहीं हो पाई लिहाजा जहानाबाद वाले अरुण कुमार सिंह को भी वापस बुला लिया। ललन सिंह वाला ड्रामा इस कदर फैल गया कि लगा कि सरकार से पूरा समाज ही नाराज है। इसिलिए नीतीश कुमार ने फूंक फूंक कर कदम रखना शुरू किया। और किसी भूमिहार नेता को नाराज होने का कोई मौका नहीं दिया। मुन्ना शुक्ला, अनंत सिंह, सुनील पांडे सब अपना माहौल बनाने में जुट गए लेकिन नीतीश ने कुछ नहीं कहा। अब सवाल ये कि क्या बिहार का भूमिहार इस बार पिछली बार की तरह ही नीतीश की फिर से ताजपोशी के लिए ताकत लगाएगा। या फिर भूमिहारों का वोट प्रसाद की तरह कांग्रेस और एनडीए में बंटेगा? कुछ राजनीतिक पंडित इस आकलन में होंगे कि भूमिहार का वोट आरजेडी गठबंधन को नहीं मिलेगा तो मुझे लगता है कि ये उनका भ्रम है। अब तक ये होता आया है कि समाज के नाम पर समाज एकजुट नहीं होता रहा। लेकिन नीतीश राज के बाद जो हालात बदले हैं.. उसमें समाज को एक बार फिर से अपनी ताकत का एहसास होने लगा है। लालू राज में समाज ने दिशा बदल दी थी। लोगों का झुकाव गलत कामों की ओर ज्यादा हो गया था। बदली परिस्थितियों में समाज ने एक बार फिर गेयर चेंज किया है। राजनीति में फुल एंट्री की झांकी छोटे छोटे चुनावों में दिखा है। लिहाजा आरजेडी का नहीं पता लेकिन एलजेपी के खाते की 75 सीटों में से जिस पर भी समाज का उम्मीदवार होगा वहां समाज कुछ भी कर सकता है इससे इनकार नहीं किया जा सकता। सूरजभान सिंह यहां पासवान के सारथी बने हैं। रही कांग्रेस की बात तो बिहार में आज की तारीख में कांग्रेस में ऐसा कोई नेता नहीं है जिसका भूमिहार वोट पर प्रभाव है। रामजतन सिन्हा, अनिल शर्मा अब बीते जमाने की कहानी है। कोई नया बड़ा चेहरा एंट्री मारता है तो फिर समय के साथ उस क्षेत्र की कहानी बदल सकती है। वैसे भूमिहारों को अब भी सबसे ज्यादा नीतीश पर ही भरोसा है। नीतीश भी अपने इस तथाकथित दबंग वोट बैंक को आसानी से छिटकने नहीं देना चाहते। पूर्व केंद्रीय मंत्री अखिलेश सिंह को मनाने की कोशिश में लगे लालू भी नहीं चाहते कि जो एक्सट्रा फायदा है उसको दूर किया जाए। उत्तर बिहार में भूमिहार नेताओं के आधार की बात करें, तो मुजफ्फरपुर, वैशाली की बात करें तो। मुजफ्फरपुर में सुरेश शर्मा पेशे से व्यापारी है लेकिन बीजेपी के नेता भी है। वोट पार्टी के बैनर का है अपना कुछ है ऐसा नहीं लगता। जेडीयू में मुन्ना शुक्ला चूंकि बाहुबली हैं इसलिए इनका मानदान होता है। लेकिन इनके चलते घाटा भी है। अजीत कुमार कांटी से विधायक हैं, विधानसभा में अच्छी पकड़ का फायदा दो बार मिल चुका है। हरेंद्र कुमार के अभी नीतीश से संबंध बेहतर नहीं हैं। कांग्रेस में पांडे और शाही परिवार के लोग हैं लेकिन सिर्फ चुनावों के समय ही इन लोगों का नाम सामने आता है। विनोद चौधरी, समीर कुमार टाइप के लोग भी नेता हैं यहां जिनकी हर पार्टी में ऊपर तक पहचान है, कब किसी पार्टी में है ये चुनाव के वक्त मालूम पड़ता है। सीतामढ़ी में विमल शुक्ला कांग्रेस के कद्दावर नेता हैं। ढाका वाले बीजेपी विधायक अवनीश कुमार, मधुबन वाले आरजेडी विधायक बबलू देव का भी प्रभाव है। जेडीयू विधायक के पति सैदपुर वाले राजेश चौधरी नए चेहरे हैं। कुछ और नए नाम हैं जो उभरने की कोशिश में हैं। मोतिहारी में अवनीश कुमार, बबलू देव, राय सुंदर देव शर्मा(एलजेपी),गप्पू राय(आरजेडी) जैसे नाम हैं जिनका अपने अपने क्षेत्र में अच्छा प्रभाव है। बेतिया में बीजेपी के चंद्रमोहन राय,कांग्रेस के रणविजय शाही जैसे लोगों का प्रभाव है। छपरा, सीवान में धूमल सिंह(जेडीयू),सत्यदेव सिंह(बीजेपी),सुरेंद्र शर्मा,जैसे लोग प्रभावशाली और दबंग कहे जाते हैं। मतलब हर इलाके में हर नेता का हिसाब किताब है। कोई मास लीडर नहीं जिसका वोट बैंक पर प्रभाव हो। पटना में कोई अनंत सिंह को नेता मानता है. कोई सूरजभान को कोई दीलिप सिंह को श्याम सुंदर सिंह धीरज को,कही संजय सिंह नेता हैं,तो कहीं गणेश शंकर विद्य़ार्थी,बेगूसराय में राजो सिंह के बेटा बहू नेता हैं कांग्रेस के,तो बीजेपी वाले भोला सिंह को भी मानते हैं लोग नेता। कृष्णा शाही, रामजीवन सिंह और सीपीएम सीपीआई वाले समाज के लोग अब पुराने हो चुके हैं। नालंदा में गया सिंह, कुमार पुष्पंजय की नेतागीरी है। जहानाबाद में अरुण कुमार, जगदीश शर्मा, अखिलेश सिंह ,किंग महेंद्र नेता हैं। नवादा में आदित्य सिंह, अनिल सिंह, अखिलेश सिंह पत्नी सहित नेता हैं।(रामाश्रय सिंह अब मामला खत्म है )तो आरा बक्सर में सुखदा पांडे, सुनील पांडे नेता हैं। कटिहार,खगड़िया में निखिल चौधरी और चौधरी बिरादरी नेता हैं। सीपी ठाकुर,ललन सिंह टाइप के लोग आज नेता भले ही बड़े हैं लेकिन प्रभाव को फिलहाल चुनाव तक गोली मारिए। कुल मिलाकर भूमिहारों का मास नेता कोई नहीं है। भूमिहारों के नाम पर इनकी नेतागीरी है। कुछ पुराने नेता भी है जो अब बिल्कुल ही पुराने पड़ चुके हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-8608137851322282436?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/8608137851322282436/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=8608137851322282436' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/8608137851322282436'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/8608137851322282436'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/09/part-1_12.html' title='विकास या जाति? कौन पड़ेगा भारी! PART- 1'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-6121174731106363608</id><published>2010-09-12T22:29:00.000+05:30</published><updated>2010-09-12T22:35:15.076+05:30</updated><title type='text'>विकास या जाति, कौन पड़ेगा भारी PART- 2</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TI0ICkDcsrI/AAAAAAAAAA4/8c61XjpjHAA/s1600/JDU_MAI__ARUN_KUMAR_SINGH_KA_SK_MEMORIAL_MAI_MILAN_SAMAROH1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 246px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_7y4-9ZNEy2Q/TI0ICkDcsrI/AAAAAAAAAA4/8c61XjpjHAA/s320/JDU_MAI__ARUN_KUMAR_SINGH_KA_SK_MEMORIAL_MAI_MILAN_SAMAROH1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5516073958729626290" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; 1931 की जनगणना के मुताबिक बिहार में 4.7 प्रतिशत ब्राह्मण, 4.2 प्रतिशत राजपूत एवं 2.9 प्रतिशत भूमिहार है। अगड़ों में 1.2 प्रतिशत ही कायस्थ है। इस तरह राज्य में चारों अगड़ी जातियों की संख्या 13 प्रतिशत के आसपास है। अब सवाल उठता है कि लालू के जंगल राज वाले शासन काल में तो भूमिहार वोटर लालू के साथ नहीं थे उस वक्त भी ये वोट बैंक लालू के खिलाफ था फिर लालू को क्यों नहीं हरा सके। इसके लिए समझना पड़ेगा बिहार का सियासी समीकरण। लालू राज के खात्मे की कहानी भले ही नीतीश रूपी कलम से सवर्ण वोटरों ने लिखी लेकिन इसके लिए पिछड़ों को स्याही बनाया गया। मतलब पिछड़ों का एक बड़ा वोट बैंक( कुर्मी, कोयरी के अलावा) जिसमें यादव का भी एक हिस्सा शामिल है उसने लालू के सिंहासन को हिलाया, और सालों से खार खाए सवर्ण वोटरों ने इसे धक्का दिया। जंमाने बाद दो दर्जन से ज्यादा भूमिहार विधायक बने, इतने ही राजपूत भी। लेकिन इस साल नया खेल है। नीतीश ने पिछड़ा, दलित वाला आधार भले ही मजबूत किया है लेकिन उस आधार को बूथ तक पहुंचाने वाला समाज इस बार अब तक खुल के साथ नहीं आया है। मतलब बात यहां भूमिहार, राजपूतों की कर रहे है। बंटाईदारी बिल का बवंडर, ललन सिंह की रुखसती, लालू के जंगलराज के सिपाहियों को गले लगाना, सवर्ण जाति के बाहुबलियों को जेल में डलवाना, ये वो मुद्दे हैं जिनकी वजह से नीतीश की डगर को आसान नहीं माना जा रहा। बंटाईदारी बिल को तो गलत बताने में जुट गये हैं नीतीश कुमार। ललन सिंह की भरपाई के लिए अरुण कुमार सिंह को वापस लाए, विजय चौधरी को अध्यक्ष बनाया, जगदीश शर्मा को फिर से गले लगाया, बाहुबलियों के खिलाफ शांत हो गये। लेकिन तस्लीमु्ददीन, रमई राम, श्याम रजक, विजय कृष्ण, रामदेव महतो, अवधेश मंडल की पत्नी बीमा भारती जैसे जंगल राज के सिपाहियों को अपने साथ लाकर सुशासन के नाम पर बट्टा लगाने का काम किया है उसका जवाब अभी उनके पास कुछ नहीं है। राजपूत समाज पिछली बार खुलकर उनके साथ खड़ा था। राजपूतों के दिग्गज दिग्विजय सिंह, प्रभुनाथ सिंह, आनंद मोहन सपरिवार नीतीश के लिए ललकार रहे थे। आज की तारीख में साथ कोई नहीं है। बांका वाले दिग्विजय सिंह अब दुनिया में नहीं रहे। प्रभुनाथ सिंह नाराज होकर लालू के साथ हो लिए, जेल में बंद आनंद मोहन ने पत्नी लवली को कांग्रेस में भेज दिया। सवाल ये कि भूमिहार अग्रेसिव होकर साथ दे भी दे तो राजपूत बहुल इलाकों में क्या होगा।  वैसे भी लालू के पास लोकसभा में चार सांसद हैं खुद लालू और बाकी तीन राजपूत जाति से। नीतीश के पास जो लोग हैं औरंगाबाद वाले सुशील सिंह, आरा में मीना सिंह तो ये लोग सांसद हैं लेकिन ज्यादा आधार वाले नेता नहीं है। राजपूत वोट लेने में नीतीश को परेशानी होगी। कहीं ललन सिंह कांग्रेस में चले गए चुनाव से पहले तो भूमिहारों का बेगूसराय, लखीसराय, शेखपुरा, नवादा, पटना का समीकरण बदल सकता है। इंतजार कीजिए धीरे धीरे तस्वीर सब साफ हो जाएगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-6121174731106363608?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/6121174731106363608/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=6121174731106363608' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/6121174731106363608'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/6121174731106363608'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/09/part-2.html' title='विकास या जाति, कौन पड़ेगा भारी PART- 2'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' 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जैसे महानगरों में भले ही नौकरी पेशा लोग दफ्तर में हिंदी, अंग्रेजी में बात करते हैं.. लेकिन यहां भी जब अपने इलाके के लोगों से मिलते हैं तो अपनी भोजपुरी को ही अहमियत देते हैं। अगर इतिहास की बात करें तो भोजपुरी का अपना इतिहास एक हजार साल से भी पुराना है। कहते हैं कि बिहार के पुराने आरा जिले(बंटकर अब बक्सर अलग हो चुका है) में नया भोजपुर और पुराना भोजपुर नाम से दो गांव है..जिसको बसाया था मध्य काल में। कहते हैं कि मध्य प्रदेश के उज्जैन से आए भोजवंशी परमार राजाओं ने इस जगह को बसाया था। अपने पूर्वज राजा भोज के नाम पर इस जगह का नाम भोजपुर रखा। तब से यहां के आसपास बोली जाने वाली भाषा भोजपुरी कहलाने लगी। भौगोलिक हिसाब किताब को देखे तो इस जगह के आसपास ही इस भाषा का गढ़ है। बिहार के भोजपुर, बक्सर, सासाराम, कैमूर, छपरा, सीवान, गोपालगंज, मोतिहारी, बेतिया के साथ ही यूपी का बलिया, वाराणसी, गोरखपुर, बस्ती, बाराबंकी, देवरिया, प्रतापगढ़, गाजीपुर के साथ इन इलाकों से सटा नेपाल का इलाका और झारखंड के इलाके की ये अपनी भाषा है। अंग्रेजों के जमाने में इसका विस्तार दुनिया भर में हो गया। मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी, त्रिनिदाद तो सिर्फ नक्शे में अलग है बाकी सब कुछ इसी इलाके जैसा। आजादी के आंदोलन में संपूर्ण भोजपुर का अपना अहम योगदान है। मंगल पांडे से लेकर, चंद्रशेखर आजाद और वीरकुंवर सिंह इसी मिट्टी पर जन्मे थे। देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह, चंद्रशेखर भी भोजपुरी माटी में ही जन्मे थे। हालांकि इस इलाके से इतने बड़े लोगों के जुड़े होने के बावजूद भी भोजपुरी का जो सपना था वो सपना भी बना है। भोजपुरी के प्रचार प्रसार और विकास में सबसे ज्यादा किसी का योगदान है तो वो है कला संस्कृति के क्षेत्र से जुड़े कलाकारों का। भिखारी ठाकुर के बगैर भोजपुरी की बात तो की ही नहीं जा सकती। बॉलीवुड में भोजपुरी को पहली पहचान मिली फिल्म गंगा मैया तोहे पियरी चढैबो से। 1962 में आई इस फिल्म ने भोजपुरी समाज को देश भर में एक साथ तो जोड़ा ही, भोजपुरी की एक अलग पहचान पेश की। इस फिल्म के जो गीत थे वो खुद मो. रफी, लता मंगेशकर, उषा मंगेशकर ने गये थे। कलाकार भी अच्छे और अनुभवी थे। इसके बाद फिर बिदेसिया, बलम परदेसिया, धरती मैया जैसी फिल्मों ने भोजपुरी को बॉलीवुड में अलग पहचान दिलाई। 60 का दशक भोजपुरी सिनेमा के लिए उदय का दशक था। धीरे धीरे कई कलाकार भोजपुरी गीत संगीत अभिनय के क्षेत्र में अपनी किस्मत आजमाने पहुंचे... । शत्रुघ्न सिन्हा की इस वक्त बॉलीवुड में एंट्री हो चुकी थी। बाद में शेखर सुमन और मनोज वाजपेयी जैसे कलाकारों ने भी अपने अभिनय का लोहा मनवाकर भोजपुरिया झंडा बुलंद किया। लेकिन 70 का दशक भोजपुरी सिनेमा के लिए उतना शानदार नहीं रहा। अस्सी के दशक भोजपुरी इंडस्ट्री के लिए स्वर्णिम समय था।  एक से बढ़कर एक गायक कलाकार और एक से बढ़कर एक गीत। अस्सी के दशक में ही बिहार की लता मंगेशकर शारदा सिन्हा ने भोजपुरी का वो रंग जमाया जो कभी भी फीका नहीं पड़ सकता। आज भी बिहार, यूपी में शादी तो बिना शारदा सिन्हा के गीत बजे संपूर्ण हो ही नहीं सकती। बेटी की शादी में हरियर बांस कटइह हो बाबा.. ऊंचे उंच मड़ौवा छबइह हो..., और चाची चुमाबहू मंगल गावहू दिअहू अशीष रघुनंदन के....बगैर तो शादियां अधूरी सी लगती है। यही वो वक्त था जब राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म नदिया के पार रिलीज हुई थी। जिसने भी नदिया के पार देखी है चंदन और गूंजा के चरित्र को वो जिंदगी भर नहीं भूल सकता। शायद ही कोई दर्शक रहा हो जो सिनेमा के दृ्श्यों को देखकर रोया न हो। उस समय के लोग बताते हैं महिलाएं तो घर लौटकर चर्चा करती थी कि कौन कितना रोया। जिस वक्त नदिया के पार रिलीज हुई बॉम्बे में भारी बारिश हो रही थी, बड़े बैनर का बड़ा भोजपुरी प्रयोग था लेकिन बिहार और यूपी ने पहले ही हफ्ते में वो कमाई दे दी कि मुंबई में सिनेमा रिलीज को निर्माता-निर्देशक भूल गये.. हालांकि दो तीन हफ्ते बाद मुंबई में फिल्म रिलीज हो गई और खूब चली। इस फिल्म का एक एक गीत चाहे कौने दिशा में लेके चला रे....हो या फिर गूंजा रे.. चंदन...आज भी सुनने के बाद लोग गुनगुनाने लगते हैं। इसी फिल्म में शारदा सिन्हा ने शादी के मौके पर जब तक फेरे न हो पूरे सात तब तक दुल्हिन नहीं दुल्हा के....गीत गाये हैं.. आज भी शादियों में दबाकर इस गीत को बजाया जाता है। 1982 में रिलीज हुई नदिया के पार में हीरो सचिन थे जबकि हीरोइन थी वाराणसी में जन्मी साधना सिंह। साधना ने बाद में फिल्मों में काम नहीं किया.. लेकिन उनकी एक ही फिल्म दर्शकों के दिलो-दिमाग पर छा गई। साधना सिंह उसी विश्वनाथ प्रसाद शाहबादी की बहू हैं जिन्होंने पहली भोजपुरी फिल्म गंगा मैया तोहे पियरी चढैबो बनाई थी। अस्सी के दशक की शुरुआत भोजपुरी सिनेमा के लिए धमाकेदार हुई थी। उत्तर भारत के घर घर में भोजपुरी का क्रेज बढ रहा था। तभी भोजपुरी गीत संगीत के क्षेत्र में एंट्री मारी कंचन और बवला की जोड़ी ने। फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी....पच्चीस साल बाद भी कंचन के गाये गीत आप सुनेंगे तो वही खनक और वही मिठास, कहीं से कोई द्विअर्थी संवाद नहीं। इसके बाद हाथ में मेहंदी मांग सेनुरवा वाला गाना जब मार्केट में आया तो लोग इस आवाज के दीवाने हो गये। गली-गली चौक चौराहे, शादी समारोहों में कंचन के गीत पर लोग नाचते और झूमते। कंचन उत्तर प्रदेश और बिहार की स्टार हो गई थी। उस जमाने में कंचन और बावला की जोड़ी इतनी हिट हो चुकी थी कि रोज दोनों कभी बिहार, कभी यूपी तो कभी मॉरीशस, सूरीनाम और न जाने कहां कहां स्टेज शो करने निकल जाते थे। इस दौर के गीत हम न जइबे ससुर घर में बाबा, आरा हिले छपरा हिला... और साढ़े तीन बजे मुन्नी जरूर मिलना लोगों के लिए पुराने नहीं पड़े हैं। अस्सी के दशक में ही 1989 में आई राजश्री प्रोडक्शन की एक और फिल्म, मैंने प्यार किया। मैंने प्यार किया पर्दे पर बड़ी ब्लॉक बास्टर साबित हुई। इस फिल्म में कहे तोहसे सजना ये तोहरी सजनिया... शारदा सिन्हा ने गाये थे..वैसे तो फिल्म के सब गाने हिट थे लेकिन शारदा सिन्हा के इस भोजपुरी गीत ने तड़का डालने का काम किया। पेशे से प्रोफेसर शारदा सिन्हा इस वक्त भोजपुरी की आवाज बन चुकी थी। भोजपुरी सिनेमा का ये वो सुनहरा दौर था जब शारदा सिन्हा की आवाज में गाए गए लोक आस्था के महापर्व छठ के पारंपरिक गीतों को इस समय लोगों ने हाथों हाथ लेना शुरू कर दिया। नतीजा हुआ कि जो भोजपुरी घर और मुहल्ले की भाषा थी, अब तीज त्योहारों में देश के बड़े शहरों की फिजां में शारदा सिन्हा की आवाज के रूप में तैरने लगी थी। शारदा सिन्हा ने सुपरहिट हिंदी फिल्म हम आपके है कौन के गानों में भी अपनी आवाज दी है। गायक बालेश्वर भी इस दौरान हिट हो गये थे। लेकिन जैसे जैसे राजनीतिक रूप से देश में भोजपुरी मजबूत हो रहा था। सिनेमा, संस्कृति के क्षेत्र में कमजोर पड़ रहा था। वीपी सिंह, चंद्रशेखर, लालू यादव जैसे नेता देश के शिखर पर थे। लेकिन भोजपुरी का मामला गड़बड़ा रहा था। शारदा सिन्हा की आवाज में खनक तो थी लेकिन उन्होंने गाना कम कर दिया था। बॉलीवुड में कोई भोजपुरी फिल्मों पर दांव नहीं लगा रहा था। लेकिन इस दौरान भी अपने आवाज की जादू से लोगों को लुभाने के लिए भोजपुरिया माटी के कलाकार जुटे हुए थे। भोजपुरियां जुबान पर इस वक्त भरत शर्मा की आवाज थी। विरह गीतों को गाकर भरत शर्मा ने भोजपुरी इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बनाई। लेकिन 1993-1994 से भोजपुरी गीतों के लिए बेहद ही बुरा दौर शुरू हुआ। ये वो वक्त था भोजपुरी की मिठास पर द्विअर्थी संवाद भारी पड़ने लगा था। मुन्ना तिवारी के नथुनिये पर गोली मारे या फिर बथता बथता वाला गीत...हालात ऐसे हो गये कि भोजपुरी गीतों को लोगों ने घर से बाहर निकाल दिया। अब ये गीत सिर्फ चाय और पान की दुकानों पर बजने लगे थे। जो भोजपुरी गीत चंद दिन पहले तक बिहार और यूपी की शान मानी जाती थी. अब उसका मतलब अश्लील और गंदा हो गया था। धीरे धीरे अश्लीलता का ये विष भोजपुरी गानों में फैलता गया और अब होड़ इस बात की होने लगी थी कि कौन कितना अश्लील गा सकता है। खा लू तिंरगा गोरिया हो फाड़ के जा झाड़ के.....1998 में जब ये गीत बिहार की गलियों में बजता था कहीं न कहीं से मारपीट और गाली गलौज की खबरें जरूर अखबार में पढ़ने को मिलती थी। गुड्डा रंगीला के इस गीत पर कई जिलों में प्रशासन ने बजाने पर प्रतिबंध तक लगा दिया। लेकिन इसके बाद भी अश्लीलता के इस काले अध्याय पर अंकुश नहीं लगाया जा सका। हालात ऐसे हो गये कि लोग इस तरह के गीतों के आदि होते चले गए। गुड्डा रंगीला के साथ राधे श्याम रसिया, छोटू छलिया और न जाने कौन कौन से गायक हुए कुछ चर्चा में आए कुछ गुमनामी के अंधेरे में खो गये। लेकिन इस दौरान बिहार में एक गायक ऐसा भी था जो बिहार, यूपी और भोजपुरिया समाज की नब्ज को पकडने की कोशिश में लगा था। बगल वाली जान मारे ली जब बाजार में बजना शुरू हुआ तो फिर कभी मनोज तिवारी मृदुल ने पीछे पलटकर नहीं देखा। भोजपुरी संगीत के क्षेत्र में जो कमी हुई थी उस कमी को मनोज तिवारी ने भरना शुरू कर दिया। बिहार और यूपी ने मनोज तिवारी को हाथों हाथ लिया। एक के बाद एक एलबम हिट होते चले गए। गीत संगीत के क्षेत्र से मनोज तिवारी ने अभिनय के क्षेत्र में कदम रखा। दो हजार के दशक में मनोज तिवारी हिट हो गये। फिल्मों में अभिनय करने लगे। भोजपुरी फिल्में फिर से बनने लगी। रवि किशन और मनोज तिवारी जैसे कलाकारों की भोजपुरी फिल्में हिट होने लगी। लेकिन पिछले दो तीन सालों से मनोज तिवारी ने गाना बंद कर दिया। अब उनका नया एलबम भी नहीं आता। इस दौरान भोजपुरी को विस्तार देने के अभियान में कई गायक शामिल हुए लेकिन इनमें से कई अश्लीलता की भेंट चढ़ गए। इस बीच बिहार को एक नई बड़ी आवाज जो मिली वो  कल्पना, देवी, मालिनी अवस्थी,पवन सिंह की आवाज। कल्पना वैसे तो असम की रहने वाली हैं लेकिन आवाज की खनक को सुनकर आपको नहीं लगेगा कि उनका भोजपुरी से कोई रिश्ता नहीं रहा होगा। गा तो सब लेती हैं लेकिन शुद्द द्विअर्थी गीत इनकी पहचान है।  2003 में जब देवी की एंट्री हुई तो लोग उन्हें दूसरी शारदा सिन्हा तक कहने लगे। विशुद्द पारंपरिक गीत गाने वाली देवी अपने प्रशंसकों को ज्यादा दिन तक संभाल नहीं सकी। हालांकि अब भी कभी कभी गा लेती हैं। मालिन अवस्थी टीवी की गायिका है। एलबम वैसे मैंने तो नहीं देखा और ना सुना है लेकिन अच्छा गा लेती हैं।  पवन सिंह के गीत सिंगल अर्थी कभी नहीं होते... लेकिन फिलहाल कोई ऑप्शन नहीं है तो पवन सिंह का बाजार गर्म है। गायकी के साथ अभिनय भी कर रहे हैं। लॉलीपॉप लागेलू...इनका बड़ा हिट रहा। वैसे दिनशे लाल यादव निरहुआ, छैला बिहारी, तृप्ति शाक्या जैसे कलाकार भी है जो अपनी जगह पर बने हुए है। रिंकू घोस, रानी चटर्जी, पाखी, सरीखे गैर भोजपुरिया हीरोइनों की बदौलत भोजपुरी सिनेमा का बाजार हिट है तो इसकी वजह भोजपुरी की मिठास ही है। बंगाली लड़की रिंकू घोस और रानी भोजपुरी निर्माता निर्देशकों की पहली पसंद है। वैसे अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा, अजय देवगन, राजबब्बर, नगमा, भाग्यश्री जैसे बड़े कलाकार भी इन दिनों बॉलीवुड के भोजपुरी संस्करण में शामिल है। लेकिन साल दो साल से भोजपुरी इंडस्ट्री में एक नया ट्रेंड शुरू हुआ है। छोटे छोटे बच्चे जिनके दूध के दांत भी नहीं टूटे वो गीत गा रहे हैं.... बात तो अच्छी है लेकिन उनसे अच्छे गीत गवाए नहीं जा रहे। अब अरविंद अकेला उर्फ कलुआ को ही ले लीजिए, है तो अभी हॉट प्रॉपर्टी लेकिन उसके गीतों को आप घर में नहीं सुन सकते। फिलहाल इन उतार चढ़ावों के बीच बॉलीवुड में भोजपुरी अपनी जगह बनाने में कामयाब है। और इन कलाकारों की कोशिशों से भोजपुरी का प्रचार और प्रसार भी हो दुनिया भर में हो रहा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-5539426445934374322?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/5539426445934374322/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=5539426445934374322' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/5539426445934374322'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/5539426445934374322'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/08/blog-post_31.html' title='भोजपुरी तब से लेकर अब तक...'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' 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पहले ही आनंद मोहन&lt;br /&gt;ने जनता दल का साथ छोड़ बिहार पीपुल्स पार्टी नाम का दल बनाया था। इस समय आनंद मोहन की पत्नी लवली वैशाली से उपचुनाव जीतकर सांसद बनी थीं। ये वो दौर था जब अशोक सम्राट, रामा सिंह, छोटन शुक्ला, देवेंद्र दुबे, सुनील पांडे, सतीश पांडे, अखिलेश सिंह, अवधेश मंडल, अशोक महतो, बृजबिहारी, शहाबुद्दीन अपराध के रास्ते सियासत में घुसने का रास्ता तलाश रहे थे। आनंद मोहन की पार्टी ने इनमें से कई लोगों को अपनी पार्टी के जरिये प्लेटफॉर्म भी मुहैय्या कराने का काम किया। हालांकि चुनाव से पहले छोटन शुक्ला की हत्या हो गई। अशोक सम्राट भी मारे गए। और भी कुछ नाम थे जो अभी याद नहीं आ रहा। लेकिन जो बचे उन्होंने वर्तमान हालात को देखते हुए सियासत में सीधे घुसना ही बेहतर समझा। देवेंद्र दुबे और सुनील पांडे ने नीतीश का साथ दिया..तो शुक्ला परिवार उस समय आनंद मोहन के करीब चला गया। ब़ृजबिहारी लालू के साथ थे। बाद में मंत्री रहते हुए हत्या हो गई। कुछ लोग निर्दलीय किस्मत आजमाने के लिए मैदान में उतरे। शहाबुद्दीन इसी दौर की उपज है। 95 में शहाबुद्दीन जीरादेई से पहली बार निर्दलीय जीतकर आए थे। बाद में उन्होंने लालू का साथ दिया और फिर कहां तक गए देश देख चुका है। ये हम उस दौर की चर्चा कर रहे हैं जब बिहार की सियासत में अपराधिकरण की शुरुआत हुई थी। 1995 से लेकर साल 2000 तक बिहार की सियासत में कई उलटफेर हुए। कई बाहुबली 'शहीद' हो गए तो कई लोगों ने सत्ता के साथ अपनी सियासी जमीन मजबूत बना ली। इस दौर में प्रभुनाथ सिंह, साधु यादव, तस्लीमुद्दीन, बूटन सिंह, प्रदीप महतो जैसे लोग भी परिस्थितियों के साथ ज्यादा मजबूत होते चले गए। जहां तक जनमत का मामला था तो इन बाहुबलिय़ों में ज्यादातर का अपने इलाके से बाहर प्रभाव उतना ज्यादा नहीं था। आनंद मोहन जरूर उस दौर में राजपूतों के सबसे बड़े नेता बनकर बिहार में उभर चुके थे। चूंकी लालू खुद यादवों का नेतृत्व कर रहे थे लिहाजा पप्पू यादव को वो कुर्सी नहीं मिली, लेकिन कोसी के इलाके में पप्पू यादव ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली। शुक्ला खानदान की सियासत को आगे बढ़ाने का काम किया मुन्ना शुक्ला ने। साल दो हजार आते आते बिहार की राजनीति में नेता कम बाहुबली ज्यादा थे जो सीधे सक्रिय हो गये। इस दौर में सूरजभान, अनंत सिंह, राजन तिवारी, सुनील पांडे, कौशल यादव, बबलू देव, धूमल सिंह, अखिलेश सिंह, दीलिप यादव सरीखे नेता सीधे सीधे खुद के लिए जनता से वोट मांगने जा पहुंचने वालों में शामिल हो गये। ज्यादातर लोग इनमें से जीतकर विधानसभा पहुंचे और बिहार विधानसभा की तस्वीर बदल दी थी। आपको अगर याद न हो तो बता दूं.. कि जब इनमें से ज्यादातर लोग निर्दलीय जीतकर आए तो सात दिन की सरकार में इन बाहुबलियों ने नीतीश कुमार का साथ दिया था। बाद में कई लोग जहां तहां अपनी सेटिंग करने में कामयाब हो गए।&lt;br /&gt;अब अगर वर्तमान सूरत में इन बाहुबलियों की जगह के बारे में बता दूं तो... खुद आनंद मोहन जेल में हैं, और उनकी पत्नी कांग्रेस में। आश्चर्य न हो अगर कुछ दिनों बाद आनंद मोहन पत्नी के साथ फिर से जेडीयू में लौट आएं।&lt;br /&gt;पप्पू यादव तो चुनाव नहीं लड़ सकते, लेकिन कागजी तौर पर पत्नी के साथ कांग्रेस में हैं। अभी कोई भी सांसद या विधायक नहीं हैं। सूरजभान लोजपा में हैं। लेकिन वो भी सांसद या विधायक नहीं हैं। राजन तिवारी भी हारे हुए हैं और जेल में हैं। प्रभुनाथ सिंह आरजेडी में गये हैं, हारे हुए हैं, न विधायक और ना ही सांसद हैं लेकिन सारण में अच्छा खासा प्रभाव है। तस्लीमुद्दीन अभी जेडीयू में हैं, हारे हुए हैं न सांसद हैं और ना ही विधायक कोसी (सीमांचल)के इलाके में अच्छा दबदबा है। साधु यादव कांग्रेस में हैं, हारे हुए हैं न सांसद हैं और ना विधायक, इनका कहां प्रभाव है नहीं मालूम। शहाबुद्दीन भी जेल में हैं। सजा पा चुके हैं लिहाजा चुनाव नहीं लड़ पाएंगे, पत्नी को जरूर विधानसभा लड़ा सकते हैं। वैसे लोकसभा लड़कर हार चुकी हैं। इनका सीवान में प्रभाव है।&lt;br /&gt;मुन्ना शुक्ला विधायक हैं और जेडीयू में हैं मुजफ्फरपुर और वैशाली में इनका दबदबा है। अनंत सिंह, सुनील पांडे, धूमल सिंह भी जेडीयू में हैं और विधायक हैं। ये वो बाहुबली हैं जो अपने क्षेत्र के साथ ही आसपास के क्षेत्रों को प्रभावित कर सकते हैं। वैसे और बाहुबलियों की बात करे तो  बबलू देव अभी आरजेडी में हैं और विधायक हैं। अखिलेश सिंह, नवादा वाले अभी जेल में हैं शायद, पत्नी को चुनाव लड़वाया था एक बार विधायक भी बनीं थी लेकिन अभी कुछ नहीं हैं। कौशल यादव नवादा के गोविंदपुर से और उनकी पत्नी पूर्णिमा अभी नवादा से निर्दलीय विधायक हैं दोनों। और दिलीप यादव अभी आरजेडी से विधायक हैं। दिलीप यादव ने लेसी सिंह को हराया था, लेसी सिंह बूटन सिंह की पत्नी है। बूटन सिंह जो कि बाहुबली माने जाते थे उनकी 2000 के चुनाव से पहले हत्या हो गई थी। प्रदीप यादव की भी हत्या हो चुकी है, उनकी पत्नी अश्वमेघ देवी पहले विधायक बनीं अभी जेडीयू से सांसद हैं। जहानाबाद में जगदीश शर्मा बड़े नेता हैं और बाहुबली भी, कांग्रेसी थे पहले अभी जेडीयू के टिकट पर जीते थे लेकिम पार्टी से निलंबित हैं। पत्नी इनकी निर्दलीय विधायक हैं घोसी सीट से। जहानाबाद में अच्छा प्रभाव हैं। जहानाबाद में ही प्रभाव वाले नेता सुरेंद्र यादव भी हैं जो लोकसभा हार गये थे। लेकिन इलाके में प्रभाव है। इसके अलावा भी और कई नाम है। जैसा की शुरुआत में ही बताया हर इलाके में कोई न कोई लोकल बाहुबली है जो एक विधानसभा क्षेत्र की सियासत तो करता ही है। सीतामढ़ी में राजेश चौधरी, अनवारुल हक, श्रीनारायण सिंह का प्रभाव। मोतिहारी में बबलू देव, रमा देवी, सीताराम सिंह, राजन तिवारी, गप्पू राय, का प्रभाव तो बेतिया में सत्तन यादव, बीरबल यादव, पूर्णमासी राम का प्रभाव। पूर्णमासी राम अभी गोपालगंज से सांसद हैं, लेकिन बगहा में इनकी राजनीति अच्छी खासी पकड़ वाली है। जेडीयू से निलंबित चल रहे हैं। गोपालगंज में सतीश पांडे, साधु-सुभाष यादव का प्रभाव है। आरा, बक्सर में आइए तो यहां की राजनीति अलग तरीके से होती है। यहां लाल झंडे की सियासत भी है सो समीकरण समय के हिसाब से बनते बिगड़ते हैं। सुनील पांडे और भगवान सिंह सरीखे नेता अभी नीतीश की पार्टी से विधायक हैं। बेगूसराय में तो कई सूरमा है। बेगूसराय, नवादा और पटना के ग्रामीण इलाकों में तो बिहार के बाहुबलियों का हिसाब किताब चलता है। सूरजभान, अनंत सिंह, ललन सिंह(सूरजभान खेमा), नागा सिंह, नाटा सिंह का गिरोह(दोनों राजनीति में सीधे सक्रिय नहीं, शायद एक कोई अब नहीं है याद नहीं आ रहा)। नवादा के एक कोने में बाहुबली अखिलेश सिंह(वारसलीगंज),आदित्य सिंह, अशोक महतो, कौशल यादव जैसे लोग प्रभावी रूप से सक्रिय हैं। बिहारशरीफ में पप्पू खां। पूर्णिया और कोसी के इलाके में तो पप्पू यादव, तस्लीमु्ददीन, आनंद मोहन के अलावा अब शंकर सिंह, अवधेश मंडल, दिलीप यादव, किशोर कुमार मुन्ना भी प्रभावित करने वाले लोगों में शामिल हो गये हैं। ये रहा बिहार की सियासत के अपराधिकरण की कहानी का पूरा डाटा। वैसे अब भी कई दबंग टाइप के लोग हैं जिनका खास खास इलाके में खासा प्रभाव है। कुछ लोगों के नाम छूट गये होंगे, ऐसा मुझे पूरा भरोसा है। लेकिन मोटा मोटी डाटा जो है बिहार की सियासत का वो यही है। कुछ लोग जाति के नाम पर नेता बने हुए हैं तो कुछ लोगों की इलाके से बाहर सिर्फ बाहुबली नेता की पहचान है इसके अलग ढेला भर का कोई प्रभाव वो नहीं छोड़ सकते। रही बात किस पार्टी में कितने बाहुबली है वो अंदाज लग गया होगा। वैसे कुछ और बाहुबली हैं ,जो अपना जुगाड़ या अपनी पत्नी के लिए टिकट का जुगाड़ लगा रहे हैं पहली पसंद उनकी अभी जनता दल यूनाइटेड हैं, दूसरी कांग्रेस। ताजा खबर ये है कि कुछ लोग जो आरजेडी के टिकट पर जीतकर पिछली बार आए थे.. और उनका रिश्ता, रिश्तेदार किसी न किसी रूप में अपराध जगत से जुड़ा है वो लोग जेडीयू में जा रहे हैं। पक्की खबर है। वैसे एक बात बता देना जरूरी होगा कि नीतीश ने अपने राज में बाहुबलियों को फड़फड़ाने का मौका नहीं दिया। ज्यादातर बाहुबली नीतीश के राज में ही जेल गये। अब देखिये इस चुनाव में क्या होता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-4019697731439471767?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/4019697731439471767/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=4019697731439471767' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/4019697731439471767'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/4019697731439471767'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='बिहार के बाहुबलियों को जानिए...'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' 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रही थी। आनंद मोहन चुनाव हार गये सो संपर्क गहरा नहीं हो पाया। अब सतपुरा से मैं दामूचक में रहने आ गया था। जिस घर में रहता था उसी के बगल के घर में आलोक भारती रहते थे। आलोक भैया उस समय समता पार्टी की छात्र इकाई के विश्वविद्यालय संयोजक थे। कैंपस में उनकी चलती थी। नेता से लेकर अपराधी और ठेकेदार सब उनके संपर्क में थे। विश्वविद्यालय कैंपस में उनका राज था। नवंबर दिसंबर 1995 का महीना था। विश्विद्यालय में छात्र समता का प्रांतीय सम्मेलन था, प्रदेश अध्यक्ष राघवेन्द्र सिंह तैयारियों का जायजा ले रहे थे, पहली बार मैं किसी पार्टी की बैठक में शामिल हो रहा था। परिचय का दौर चला तो मैंने अपना नाम मनोज कुमार मुक्ला बताया। (बाद में मैं राजनीति में इसी नाम से मशहूर हो गया।) टाइटल सुनने के बाद लोगों को आश्चर्य हुआ। खैर उसके बाद राज्यस्तरीय सम्मेलन खत्म हुआ। आलोक भारती अध्यक्ष हो गए। मैं उनकी कमेटी में कोषाध्यक्ष बना। (मेरे पास कोई कोष नहीं था)। राजनीति में सक्रिय होने का एक तमगा मिल गया था। धीरे धीरे राजनीति से रिश्ता गहरा होता गया। पढ़ाई-लिखाई से संपर्क कम होता चला गया। लेकिन छूटा नहीं था।&lt;br /&gt;1996 में लोकसभा का चुनाव हुआ। जॉर्ज को चुनाव लड़ना था, लेकिन जॉर्ज को नीतीश मुजफ्फरपुर से नालंदा ले गए। मुजफ्फरपुर नेतृत्वविहीन हो गया था। जॉर्ज को मनाने के लिए पार्टी के नेता, कार्यकर्ता पटना गए। मैं पहली बार बस की छत पर बैठकर पटना गया था। शकुनी चौधरी के घर पर जॉर्ज को आना था। उस दिन नालंदा से नामांकन भरके वो लौटे थे। रात में शकुनी चौधरी के घर पर हमलोगों ने खूब हंगामा किया। एक सज्जन ने मुझे पेट्रोल का गैलन पकड़ा दिया।( तय ये हुआ था कि जॉर्ज मुजफ्फरपुर से लड़ने को राजी नहीं होंगे तो हमलोग विद्रोह करके पार्टी दफ्तर फूंक देंगे)हालांकि राजनीति में इतना कच्चा था कि पेट्रोल का गैलन थाम लिया.. थोड़ी देर बाद एहसास हुआ कि ये मैं क्या कर रहा हूं.. तो एक जगह मौके देखकर रोड पर ही गैलन छोड़ दिया। खैर....जॉर्ज तैयार नहीं हुए... कहा मुजफ्फरपुर अपना नेता चुन लें। बाद में हरेंद्र जी को टिकट मिला। हरेंद्र जी को हमलोग सर कहके बुलाते थे। हमलोग(नौजवानों की टोली) मुजफ्फरपुर की राजनीति में हरेंद्र जी&lt;br /&gt;के लोग कहलाते थे। हरेंद्र जी मुजफ्फरपुर से और आनंद मोहन(जेल से) शिवहर से लोकसभा चुनाव लड़े। हरेंद्र जी हार गए। आनंद मोहन की जीत हुई। तब तक मुजफ्फरपुर की राजनीति में नेता, कार्यकर्ता, मीडिया की बीच पहचान बनने लगी थी...&lt;br /&gt;आनंद मोहन से जेल में मुलाकात हुई और फिर संपर्क बहाल हुआ। तब तक मैं विश्वविद्यालय की राजनीति का फायदा उठाते हुए शिवहर जिला छात्र समता का स्वयंभू अध्यक्ष बन गया था। प्रदेश कमेटी ने मंजूरी भी दे दी। लेकिन आनंद मोहन ने भूमिहार कैसे अध्यक्ष हो सकता है शिवहर जिले का मेरा मनोनयन रद्द करवा दिया। इस वक्त मुझे राजनीति में जाति की अहमियत का एहसास हुआ। खैर कुछ दिन तक मामला चलता था। मैंने खुद को मुजफ्फरपुर की राजनीति पर केंद्रित कर दिया।&lt;br /&gt;तब तक 1998 का चुनाव आ गया। हरेंद्र जी को इस बार डायरेक्ट उम्मीदवारी मिली। हमलोगों ने पूरी ताकत लगा दी। लेकिन परिणाम पक्ष में नहीं रहा। तब तक आनंद मोहन समता पार्टी से बाहर हो गये थे। आलोक भारती छात्र राजनीति से अलग हो गए। ठाकुर आलोक अब अध्यक्ष बनाये गए। ठाकुर आलोक की कमेटी में मैं प्रवक्ता बना। मीडिया के लोगों से रिश्ते बेहतर हुए।&lt;br /&gt;ठाकुर आलोक ने संगठन की पूरी जिम्मेदारी मुझे सौंप दी थी। उनके हिस्से का सारा काम मैं देखने लगा था। अब मैं संगठन का उपाध्यक्ष हो गया। तब तक एक बार फिर से चुनाव की घोषणा हो गई। 1999 के लोकसभा चुनाव में हरेंद्र जी को टिकट नहीं मिला। इस वक्त समता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड का विलय हो गया था। हम लोग बिना पद के हो गये थे। कैप्टन निषाद को टिकट मिला और वो जीत गए। इस समय हमलोगों ने एक निर्दलीय उम्मीदवार का साथ दिया था। चुनाव बाद फिर जनता दल यूनाईटेड और समता पार्टी का बंटवारा हो गया। हमलोग समता पार्टी के साथ में ही थे।  2000 में बिहार विधानसभा का चुनाव होने वाला था। संगठन ने मुझे पहले कार्यकारी अध्यक्ष बनाया और एक महीने बाद विश्वविद्यालय अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंप दी। पांच साल में कोषाध्यक्ष से अध्यक्ष तक की कुर्सी तक पहुंचने में बड़ा कठिन संघर्ष करना पड़ा। तब तक पढ़ाई लिखाई भी हो रही थी। कांटी से हरेंद्र जी को विधानसभा का टिकट मिला लेकिन फिर से हमलोग हार गए। संगठन को मजबूत करने का कार्यक्रम चलता रहा। नए-नए साथी जुड़ते रहे। बहुत लोगों को सक्रिय राजनीति से जोड़ा। विश्वविद्यालय के साथ ही जिले की राजनीति में भी दिलचस्पी बढ़ती गई। चूंकी जिले के सबसे बड़े नेता का करीबी था सो जिम्मेदारी ज्यादा मिलने लगी थी। धीरे धीरे राजनीति का दायरा फैलने लगा। इस बीच कई साथी राजनीति और अपराध के गठजोड़ का शिकार हो गए। संघर्ष का दौर चलता रहा। इसी दौरान पटना में एक बड़ा कार्यक्रम था। तब भूमिपाल (विधान पार्षद है अभी) अध्यक्ष हुआ करते थे हमारे संगठन के। मेरा एक सहयोगी था.. उसने कुछ घालमेल कर दिया। उसकी महत्वकांक्षाएं हिलोरी मार रही थी। पटना वाला कार्यक्रम संपन्न हो गया। लेकिन छात्र राजनीति से मेरी दिलचस्पी कम होने लगी। एक दिन मैंने बिना किसी को बताए अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।( हमारे संगठन में तब अध्यक्ष के लिए मारपीट और ताकत का प्रदर्शन होता था) अखबारों में खबर नहीं छपी। क्योंकि इस्तीफा मैंने गोपनीय तरीके से दिया था। एक महीने बाद फिर संगठन में वही शख्स मेरा उत्तराधिकारी बना, जिसने घालमेल किया था। मैंने छात्र राजनीति से खुद को अलग कर लिया। इस दौरान मैं यूथ विंग की राजनीति में सक्रिय हो गया। हरिओम कुशवाहा उस वक्त मुजफ्फरपुर के अध्यक्ष थे। उनकी कमेटी में मैं प्रधान महासतचिव बना। जो की अध्यक्ष के बाद सबसे ताकतवर पद होता है। जिले की राजनीति में दखल बढ़ती गई। बड़े बड़े कार्यक्रम होने लगे। उस वक्त भगवान सिंह कुशवाहा बिहार युवा समता के अध्यक्ष थे।(अभी ग्रामीण विकास मंत्री हैं) भगवान सिंह से भी ट्यूनिंग ठीक हो गई। सीढ़ी दर सीढी चढ़ते चढ़ते यहां तक पहुंचा.. इस बीच कई लोगों की आंखों की किरकिरी भी बन गया था। अखबारों में विवादित खबरें छपने लगी। मुझे घरवालों ने दिल्ली भेज दिया पढ़ने के लिए, साल 2002 था। एक महीना रहने के बाद फिर मैं चला गया। छे महीने बाद फिर आया। मई 2003 में। 4 महीने रहने के बाद फिर लौट गया। इस बीच मैंने दिल्ली में बिहारी छात्रों का एक संगठन बनाया। बिहारी छात्र युवा संघर्ष मोर्चा। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनाव में एबीवीपी के उम्मीदवार अनुभव सप्रा(उपाध्य़क्ष) को समर्थन दिया। हालांकि सप्रा की हार हुई, लेकिन मेरी और संगठन की पहचान कैंपस में स्थापित हो गई। उस साल रोहित शर्मा अध्यक्ष बना था और नरेंद्र टोकस उपाध्यक्ष। रागिनी सचिव बनीं थी। सिर्फ उपाध्यक्ष के लिए मेरे संगठन ने वोट मांगे थे। बाकी पदों के लिए टोकस और रागिनी को समर्थन दिया था।&lt;br /&gt;इसी बीच असम में बिहारी छात्रों पर हमला हुआ था। मैं मुजफ्फरपुर गया और पप्पू यादव के संगठन के साथ मिलकर बिहार बंद का एलान किया। एक बार फिर से नए मंच के साथ बिहार की राजनीति में वापसी हो गई थी। तब तक कुछ दिनों बाद लोकसभा का चुनाव होने वाला था 2004 का।  मैं अपने संगठन के साथ जनता दल यूनाईटेड में शामिल हो गया। इस बार गणेश भारती (अभी एमएलसी )को पार्टी ने मुजफ्फरपुर जिला पार्टी का अध्यक्ष बनाया। गणेश भारती की कमेटी में मुझे महासचिव बनाया गया। मतलब पार्टी की जिला स्तर की सबसे बड़ी इकाई में महासचिव का पद दिया गया। हालांकि गणेश भारती पहले हमलोगों के खेमे में ही थे... नीतीश कुमार के करीबी हैं गणेश भारती कुछ स्थनीय राजनीति को लेकर हमलोग उनके साथ नहीं थे। विवाद हुआ मैंने इस्तीफा दिया। बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके। हमारे खेमे की यही मंशा थी। तब तक चुनाव में टिकट बंटवारे का मसला सामने आया। नीतीश नालंदा से लड़ना चाहते थे। बाढ़ से उन्हें हारने का डर था। बाद में हुआ भी ऐसा ही। नीतीश नालंदा से लड़े, जॉर्ज मुजफ्फरपुर से।(नीतीश बाढ़ से हार गए)। जॉर्ज मुजफ्फरपुर से लड़ने आए तो&lt;br /&gt;हरेंद्र जी को वैशाली से टिकट दे दिया।(2004 के चुनाव से पहले फिर समता पार्टी और जेडीयू का विलय हो गया था) नीतीश, शरद यादव, पासवान राजी नहीं थे। हरेंद्र जी के प्रचार में कोई नेता नहीं गया। चुनाव हरेंद्र जी हार गए। मैं अभी मुजफ्फरपुर में ही था। संगठन के फेरबदल में चंद्रभूषण राय बिहार छात्र जेडीयू के अध्यक्ष बने और मुझे उन्होंने अपनी कमेटी में तिरहुत प्रमंडल से इकलौता महासचिव बनाया। पद बड़ा था, जिम्मेदारी ज्यादा दी गई। लेकिन मैं कमेटी की पहली बैठक में जा पाता उससे पहले ही मैं इस लाइन में आ गया। लेकिन यहां आने के बाद भी राजनीति का सिलसिला थमा नहीं। अब जेडीयू की राजनीति दिल्ली से होने लगी। मुजफ्फरपुर की छात्र राजनीति में मैंने जो जगह खाली की थी उसकी जगह मैंने अपने करीबियों को स्थापित करवाया। और दिल्ली से संगठन को कंट्रोल करने लगा। मुजफ्फरपुर के अखबारों में ये बात छपने लगी कि उत्तर बिहार की छात्र राजनीति इन दिनों जेएनयू कैंपस से डील हो रही है। साल-डेढ़ साल ये डीलिंग जारी रही। दिल्ली से मैं मुंबई चला गया.. लेकिन राजनीति का सिलसिला जारी रहा। बिहार में सरकार बन चुकी थी... लोग कुर्सी हथियाने में लगे थे। सत्ताधारी दल के संगठन में पद के लिए लोग खून के प्यासे हो जाते हैं। लेकिन मुंबई से ही मैंने अपने संबंधों और प्रभाव का इस्तेमाल कर अपने करीबियों को एक बार फिर संगठन में अच्छे ओहदे पर स्थापित किया। लेकिन दिन, महीने गुजरते गए..मैंने दिलचस्पी कम कर दी... नतीजा हुआ मेरे कई साथी अकेले हो गए तो कई मंत्री, विधायक और सांसद तक। पढ़कर आश्चर्य मत कीजिएगा। लेकिन कुछ गायब भी हो गए... इनमें से आज कौन कहां है... पता भी नहीं चलता। कई लोगों का तो फोन नंबर तक नहीं है। बात कहां से होगी और मुलाकात की बात छोड़ दीजिए। जिनका नाम है वो बड़े आदमी हो गए...सोचता हूं मैं भी एक बार फिर से शुरू कर दूं क्या?????  लेकिन डर है कि शुरू से न शुरू करना पड़ा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-3592570844491042790?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/3592570844491042790/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' 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बहुत कोशिश हुई परिस्थितियां ऐसी बनती चली गई कि चाह के भी जनता परिवार देश में कोई माहौल नहीं बना सका। मौका मिला 1989 में एक बार फिर जनता दल और बीजेपी(जनसंघ बदल चुका था 80 में)ने मिलकर चुनाव लड़ा और दोनों को फायदा हुआ। देश ने वी पी सिंह को सत्ता सौंप दी। कांग्रेस की सियासत से समाजवादियों की धारा में शामिल होने वाले वीपी सिंह इंदिरा गांधी के बेहद करीबी हुआ करते थे। चंद्रशेखर उनसे सीनियर थे। वी पी सिंह को लोग राजा साहब के नाम से पुकारते थे। इंदिरा गांधी ने ही पहली बार इन्हें अपनी कैबिनेट में जगह दी।  आपातकाल के दौरान जब जगजीवन राम, हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे वरिष्ठ कांग्रेस नेता गांधी का साथ छोड़कर चले गए थे तब उस समय वी पी सिंह इंदिरा गांधी के साथ डटकर खड़े रहे। इसका फायदा भी मिला। इंदिरा जब सत्ता में लौटी तो वीपी सिंह यूपी के सीएम बने। एक दुखद घटना हुई वीपी सिंह के कार्यकाल में ही उनके भाई जो कि जज थे डाकुओं ने हत्या कर दी। कानून व्यवस्थी की जिम्मेदारी लेकर वीपी सिंह ने इस्तीफा दे दिया. बाद में फिर दिल्ली की राजनीति में पहुंचे। इंदिरा जी की हत्या के बाद राजीव गांधी कैबिनेट में पहले वित्त मंत्री बने, बाद में राजीव गांधी ने वित्त मंत्री का पद ले लिया और रक्षा मंत्री बना दिया। इसी वक्त बोफोर्स घोटाला उजागर हुआ और वीपी सिंह ने मंत्री, सांसद और कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। राजीव गांधी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने में उस समय वीपी सिंह का साथ दिया मुफ्ती मोहम्मद सईद, अरुण नेहरु व आरिंफ मोहम्मद खान जैसे बड़े कांग्रेसियों ने। इन लोगों के साथ मिलकर 1988 में वीपी सिंह ने जनमोर्चा का गठन किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश की राजनीति के लिए 1988 का साल एक ऐतिहासिक साल था। इस वक्त चंद्रशेखर जनता पार्टी का नेतृत्व कर रहे थे। &lt;br /&gt;चंद्रशेखर भी कांग्रेस की राजनीति करके लौटे थे। चंद्रशेखर के बारे में कहा जाता है कि प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की सियासत करने के बाद जब चंद्रशेखर कांग्रेस में आए और पहली बार इनका इंदिरा गांधी से सामना हुआ तो बड़ा ही दिलचस्प नजारा था। उस वक्त इंदिरा गांधी से सवाल-जवाब करने की कोई हिम्मत क्या कल्पना भी नहीं कर सकता था। लेकिन चंद्रशेखर कांग्रेस को समाजवादी विचारधारा से जोड़ने की मुहिम में लगे थे। इंदिरा जी ने पूछा चंद्रशेखर अगर कांग्रेस का समाजवादीकरण नहीं हुआ तो क्या करोगे.... चंद्रशेखर जी ने बेबाक तरीके से जवाब दिया पार्टी को तोड़ने की कोशिश करूंगा। सवाल पूछा क्यूं... चंद्रशेखर जी ने उत्तर दिया कि कांग्रेस आज की तारीख में ऐसा बरगद बन गया है जिसके नीचे कोई पौधा उग नहीं पा रहा.. लिहाजा इसकी टहनियों को काटने की जरूरत पड़ेगी। सोचिये. चंद्रशेखर की हिम्मत। यही बेबाक अंदाज था कि कांग्रेस में चंद्रशेखर को युवा तुर्क के नाम से जाना जाने लगा। लेकिन उनका यहां मन कहां लगने वाला था। जेपी और इंदिरा की राजनीति में चुनने की बारी आई तो चंद्रशेखर ने जेपी का साथ दिया। नतीजा हुआ जेल गये। 77 में सरकार बनी तो मंत्री पद का ऑफर मिला जिसे ठुकरा दिया इसलिए कि मोरारजी देसाई से इनके विचार मेल नहीं खाते थे। बाद में परिस्थितियां बदली और जनता पार्टी के मुखिया बने। पार्टी को सजाने संवारने का काम शुरू किया। देश भर में पैदल यात्रा शुरू की। समापन समारोह के दिन रामलीला मैदान में अब तक कगी सबसे बड़ी रैली हुई। कहा जाता है कि चंद्रशेखर इस रैली का फायदा नहीं उठा पाया। ये वक्त था 86-87 का। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;( 1987 की एक घटना का जिक्र करते चलूं , ये वो दौर था जब राजीव गांधी और वीपी सिंह में मतभेद बढ़ चुके थे। वित्त मंत्री रहते अंबानी परिवार और अमिताभ के खिलाफ आयकर के छापे मारे जा चुके थे। वीपी सिंह से वित्त मंत्रालय ले लिया गया था। अब वो रक्षा मंत्री थे। भ्रष्ट्राचार के खिलाफ मुहिंम शुरू हो चुकी थी। चंद्रशेखर जी जैसे अनुभवी नेता ने वीपी सिंह की प्रतिभा को भांप लिया था। अपने एक करीबी से उन्होंने कहा था कि इसी के आसपास आने वाले दिनों में देश की राजनीति घूमने वाली है।चंद्रशेखर जी ने वीपी सिंह को संदेशा भिजवाया..  वीपी सिंह को जैसे ही ये बात बताई गई। वो मारुति कार में बैठकर हरियाणा के सोहाना पहुंचे, जहां चंद्रशेखर जी का भारत यात्रा केंद्र चल रहा था। दोनों एक दूसरे के गले मिले और करीब दो घंटे तक बातचीत हुई, देश की स्थिति और परिस्थिति के बारे में। वीपी सिंह के बड़े भाई चंद्रशेखर मित्र थे, इसलिए वीपी सिंह को वो छोटे भाई की तरह समझते थे)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;11 अक्टूबर 1988 की वो तारीख थी। कांग्रेस से नाराज नेताओं ने जो कि समाजवादी सियासत की उपज थे और समाजवादी सोच से वास्ता रखते थे। जनता पार्टी, जनमोर्चा, लोकदल (अजीत सिंह)का विलय हुआ। और फिर बना जनता दल। वीपी सिंह अध्यक्ष बने। इतनी बड़ी पार्टी और इतने बड़े बड़े लोग थे की 150 सदस्यों की कार्यकारिणी बनाई गई। 1977 की जनता पार्टी और 1988 के जनता दल में बड़ा फर्क आ चुका था। और वो फर्क था पीढ़ी का। नेतृ्त बुजुर्ग के हाथ में नहीं रह गया था। सोच की दिशा बदल चुकी थी। जेपी से शिष्य भरे-पड़े थे। एक बार फिर से संपूर्ण क्रांति के नारे को सतह पर लाने की कोशिश शुरू हुई। चुनाव का वक्त आया। 1989 में जनता दल के टिकट पर दिग्गज लोग मैदान में उतरे। बीजेपी के साथ लड़ने का फायदा दोनों को हुआ। लेकिन समाजवादियों के बारे में जो कहावत है उसे गलत साबित करने का माद्दा किसी में नहीं था। वीपी सिंह को संसदीय दल का नेता बनने में पापड़ बेलने पड़े। चंद्रशेखर खुद दावेदार थे। लेकिन देवीलाल को आगे कर वीपी सिंह ने चाल चली। देवीलाल को संसदीय दल के नेता का प्रस्ताव खुद वीपी सिंह ने रखा। लेकिन देवीलाल ने पलटी मार दी और वीपी सिंह का नाम प्रस्तावित कर दिया। नाराज होकर चंद्रशेखर बैठक से चले गये। नतीजा हुआ कि सरकार ज्यादा दिन तक नहीं चली। बीजेपी के सहयोग से राष्टीय मोर्चे की सरकार में वीपी सिंह पीएम बने थे। लेकिन आडवाणी गिरफ्तारी प्रकरण ने बीजेपी को नाराज कर दिया। इसी दौरान देवीलाल से भी सरकार के अच्छे संबंध नहीं रहे। वीपी सिंह के बाद जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने एसआर बोम्मई ने देवीलाल को 1 अगस्त 1990 को जनता दल से निकाल दिया। चंद दिनों बाद सरकार ही गिर गई। 1990 के अंत में चंद्रशेखर और देवीलाल 54 सांसदों के साथ जनता दल से अलग हो गये। 5 नवंबर 1990 को नई पार्टी बनी समाजवादी जनता पार्टी। (देवेगौड़ा भी सजपा में आए थे)कांग्रेस की मदद से चंद्रशेखर देश के पीएम बने और देवीलाल डिप्टी पीएम। लेकिन चालीस सला बनाम चार महीने वाला नारा यहां मुसीबत का कारण बन गया। कांग्रेस ने कहा कि राजीव गांधी के पीछे सरकार जासूस लगा रही है। क्या था, समर्थन वापस और सरकार साफ।&lt;br /&gt;4 अक्टूबर 1992 को चंद्रशेखर की पार्टी में भी सेंध लग गई। उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता और तब के जमाने में धरतीपुत्र के नाम से मशहूर मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी के नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली। &lt;br /&gt;21 जून 1994 को फिर एक बार जनता दल में विभाजन हुआ। पार्टी के 14 सांसद जॉर्ज फर्नांडींस के नेतृत्व में जनता दल से अलग हो गये। नाम पड़ा जनता दल (ज),31 अक्टूबर 1994 को जनता दल (ज) का नाम समता पार्टी रख दिया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बीच पार्टी को एक बार फिर सत्ता में आने का मौका मिला। कांग्रेस के सहयोग से 1996 में पहले देवेगौंड़ा और फिर गुजराल देश के पीएम बने। पार्टी के नेता वीपी सिंह के पास पीएम बनने का प्रस्ताव ले के गये थे.. लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। कहा जाता है कि वीपी सिंह के घर पार्टी के नेता मिलने पहुंचे थे और सिंह उस दिन दिन भर कार में बैठ कर रिंग रोड पर घूमते रहे। वीपी सिंह के कहने पर ही देवेगौड़ा को पीएम बनाया गया।&lt;br /&gt;(जबकि उस समय भी शरद यादव, लालू यादव और मुलायम सिंह उसी जनता परिवार के देवेगौड़ा और गुजराल से कहीं ज्यादा कद्दावर नेता थे। लेकिन उनके आपसी अहं के टकराव ने एक बार फिर जनता सरकार अपनी मियाद पूरी किए बिना सिधार गई। )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्ता में रहते ही 5 जुलाई 1997 को जनता दल में एक और विभाजन हुआ, 3 जुलाई 97 को हुए अध्यक्ष के चुनाव को लेकर लालू यादव खेमा नाराज हो गया,  और 5 जुलाई में लालू की अध्यक्षता में आरजेडी अस्तित्व में आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1997 में बीजेपी से तालमेल को लेकर पार्टी उड़ीसा में भी टूट गई। उड़ीसा के नेता बीजेपी से तालमेल के पक्ष में थे, लेकिन शरद यादव खेमा राजी नहीं था. नतीजा बीजू जनता दल अस्तित्व में आया और उड़ीसा से पार्टी खत्म हो गई।&lt;br /&gt;1997 में ही कर्नाटक में भी पार्टी को झटका लगा। पार्टी के सबसे पुराने नेताओं में से एक रामकृष्ण हेगडे ने लोक शक्ति के नाम से नई पार्टी बना ली। 1998 में लोक शक्ति ने बीजेपी से मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ा।&lt;br /&gt;पार्टी को सबसे बड़ा घाटा हुआ 1999 में। जब बीजेपी से तालमेल को लेकर पार्टी दो खेमे में बंट गया। नतीजा हुआ कि बीजेपी के साथ नहीं जाने वाले नेताओं ने देवगौड़ा के साथ मिलकर जनता दल सेक्यूलर नाम से नई पार्टी बना ली। हालांकि विभाजन के बाद देवगौड़ा असली जनता दल का दावा करते रहे। मामला चुनाव आयोग में गया और फिर आयोग ने चुनाव चिन्ह चक्र को जब्त कर लिया। इसी विवाद के साथ जनता दल का अंत हो गया। न नाम रहा और न पार्टी। शरद यादव की पार्टी का नाम जनता दल यूनाइटेड पड़ा और देवगौड़ा की पार्टी का जनता दल सेक्यूलर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1999 में जनता दल यू और समता पार्टी का विलय हो गया। दोनों दल के नेताओं ने तीर चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा। लेकिन नतीजों के बाद एकता नहीं रही। अध्यक्ष के सवाल पर पार्टी फिर से जनता दल यू और समता पार्टी में बंट गई।&lt;br /&gt;हालांकि वाजपेयी सरकार में दोनों दलों के नेता मंत्री बने रहे। 2000 के बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए में बीजेपी, समता पार्टी, जेडीयू और बीपीपा नाम के चार दल थे। चुनाव नतीजों के बाद नीतीश कुमार 7 दिनों के लिए सीएम बने। लेकिन मामला जमा नहीं। इसी साल जनता दल यू में एक और विभाजन हो गया। राम विलास पासवान चार सांसदों के साथ अलग हो गये। नई पार्टी बनी लोक जनशक्ति पार्टी।&lt;br /&gt;2004 के चुनाव से पहले एक बार फिर जनता दल यू और समता पार्टी का विलय हो गया। जॉर्ज अध्यक्ष बने। शरद संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष, पार्टी का झंडा समता पार्टी के रंग का। लेकिन निशान जेडीयू का तीर। 2004 में लोकसभा चुनाव साथ लड़ा गया। नवंबर  2005 में पार्टी बिहार में सत्ता में आ गई। इस बीच जॉर्ज को साइड लाइन किया जाने लगा।  अध्यक्ष पद के चुनाव में शरद यादव ने जॉर्ज को हरा दिया। जॉर्ज दरकिनार हो गये। 2009 के लोकसभा चुनाव में जॉर्ज को टिकट तक नहीं दिया गया। पार्टी संगठन पर शरद यादव की पकड़ मजबूत होती चली गई, नीतीश सरकार में मशरूफ रहे. संगठन का फायदा&lt;br /&gt;शरद यादव को हुआ 2009 के संसदीय चुनाव में शरद यादव ने अपने समर्थकों को टिकट दिया और वो जीतकर आए। 22 सांसदों वाली इस पार्टी में 15-16 सांसद शरद यादव खेमे के हैं। &lt;br /&gt;लेकिन अहं का टकराव एक बार फिर शुरू हो चुका है। महिला आरक्षण विधेयक का मतभेद तो लोगों ने देख लिया। ललन सिंह जो कभी नीतीश की परछाई माने जाते थे. नीतीश के खिलाफ बोल रहे हैं। नए चेहरे (विजय चौधरी) को नीतीश के कहने पर बिहार का अध्यक्ष बनाया गया है। ललन सिंह, प्रभुनाथ सिंह खुलकर खिलाफ में हैं। पार्टी के सांसद जगदीश शर्मा, पूर्णमासी राम पहले से निलंबित चल रहे हैं। उपेंद्र कुशवाहा की वापसी, लालू के पुराने दरबारियों की नीतीश के दरबार में बढती इज्जत से पार्टी का एक बड़ा तबका नाराज है। अभी तो कोई बोल नहीं रहा लेकिन कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर दो-तीन महीने बाद लोग जोर जोर से बोलने लगे। पार्टी के भीतर के लक्षणों को देखे तो नीतीश की कार्यशैली से कार्यकर्ता खुश नहीं हैं। उसमें भी टिकट को लेकर खेल तो शुरू हो गया है। नीतीश और शरद यादव के बीच अब सीधी लड़ाई होने वाली है। वैसे समाजवादियों के चरित्र और इतिहास को देखे तो बंटवारा हमेशा अहं को लेकर हुआ है.... और संगठन पर कब्जा इसकी एक बड़ी वजह है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी बिहार, यूपी, कर्नाटक, उड़ीसा, गुजरात, हरियाणा जैसे प्रदेशों में सबसे ताकतवर रही इस पार्टी का बंटवारे के बाद क्या हाल है देख लीजिए। आने वाले दिनों में अगर अपने अहं को छोड़कर ये पुराने समाजवादी एक झेडे और एक निशान के साथ आ जाए तो देश की राजनीति की दिशा क्या होगी आकलन लगाने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-7160730471620814141?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/7160730471620814141/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=7160730471620814141' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/7160730471620814141'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/7160730471620814141'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='फिर टूटेगा जनता दल!'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-7419730943160592871</id><published>2010-01-30T20:58:00.000+05:30</published><updated>2010-01-30T21:12:24.879+05:30</updated><title type='text'>खबर का असर....!</title><content type='html'>13 जनवरी को मैने एक खबर दी थी... शीषर्क था... खबर पक्की है? अब प्रश्नवाचक चिन्ह का मतलब नहीं रह गया..&lt;br /&gt;हालांकि हटा नहीं रहा हूं...शरद यादव ने आज ललन सिंह के इस्तीफे की खबर की पुष्टि कर दी.. खुद ललन सिंह भी&lt;br /&gt;सामने आ गए। सच्चाई से पर्दा उठा दिया। राहुल गांधी का बिहार दौरा 1 फरवरी से शुरू हो रहा है... चर्चा तो होगी, लेकिन&lt;br /&gt;अभी कोई फैसला होगा साफ-साफ कह नहीं सकते। नीतीश कुमार और ललन सिंह के बीच बातचीत की गुंजाइश नहीं बची है। ललन विरोधी खेमा लगातार इस प्रयास में है कि ललन सिंह को राहुल गांधी का आदमी घोषित कर दिया जाए। कमोबेश मामला मुकाम तक पहुंचता दिख रहा है... वैसे समाज के लोग भी मानते हैं कि ललन सिंह के जाने से फायदा होगा.... अऱुण कुमार सिंह पब्लिक के नेता हैं। ललन सिंह हाल की राजनीति के उपज है... मैं जब 1995 में पार्टी में आया था तब ललन जी पार्टी के प्रदेश के कोषाध्यक्ष हुआ करते थे... हालांकि नीतीश कुमार का फाइल वही डील करते थे.. हाल तक करते रहे हैं...अब कांग्रेस में जाएंगे अगर तो.. कैसे एडजस्टमेंट होगा कह नहीं सकते। वैसे नीतीश कुमार की राजनीति क्लियर नहीं है...पार्टी का एक बड़ा तबका... कार्यकर्ताओं का खुद को बड़ा ही असहाय महसूस कर रहा है... राज्य में काम हुआ है हर कोई मान रहा है लेकिन कार्यकर्ता खुश नहीं हैं... इस साल चुनाव है... और चुनाव तो कार्यकर्ताओं को ही लड़ना है...अभी कई मोर्चों पर मारामारी होगी...पार्टी में एक बड़ा वर्ग बीजेपी से अलग चुनाव लड़ने का पक्षधर है.. नीतीश कुमार वोट के हिसाब से समाज को बांट भी रहे हैं...नीतीश कुमार को फायदा भी है तो नुकसान भी....अब भरपाई के लिए क्या रणनीति है उनके पास नहीं बता सकता...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-7419730943160592871?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/7419730943160592871/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=7419730943160592871' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/7419730943160592871'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/7419730943160592871'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/01/blog-post_30.html' title='खबर का असर....!'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-5184054670159932769</id><published>2010-01-25T20:03:00.000+05:30</published><updated>2010-01-25T20:59:56.844+05:30</updated><title type='text'>फिल्म सिटी के नजदीक न होता तो ?</title><content type='html'>रात के बारह बजे थे, कटवारिया सराय से घर लौटना था, हां-ना करते करते साढ़े बारह का वक्त भी बीत गया...इधर लौटने वाले तीन लोग थे. मैं, निप्पू और विवेक। ऑटो से लौटने की तैयारी थी, फिर हुआ कि देर हो गई है ऑटो मिले न मिले.. नवीन सर ने अपनी बाइक दे दी. चेक चाक करके। निप्पू पीछे बैठा, मैं बीच में और विवेक चलाने लगा.. करीब एक बज गए होंगे.. चल दिये तीनों...एक किलोमीटर बाद ही गाड़ी बीच सड़क पर बंद.. तीनों उतरे.. दायां-बांया करके फिर से गाड़ी को निप्पू ने स्टार्ट कर दिया.. विवेक ने चलाना शुरू किया.. वाया एम्स, साउथ एक्स होते हुए डीएनडी की ओर चल पड़े। डीएनडी से पहले भारी कोहरा... हाथ को हाथ न सूझे..विवेक चलाए जा रहा था...कभी आगे चल रहे ट्रक की रोशनी में तो कभी ऐसे ही... रोड समझकर चले जा रहे थे..डीएनडी पर टोकन लेने-देने के बाद आगे बढ़े.. आगे ऑटो, पीछे बाइक... निप्पू ने कहा कि देखना रास्ता न गड़बड़ा जाए.. दिखाई तो दे नहीं रहा था.. अचानक ऑटो ने ब्रेक लिया.. हो गया कन्फ्यूजन..जाना था जिस रास्ते उस रास्ते न जाके फिल्म सिटी के सामने वाले रोड पर आ गए... सामने स्पीड ब्रेकर था...फिल्म सिटी के गेट पर...बाइक की रफ्तार कम क्या हुई.. बीच रोड पर स्टार्ट बाइक न आगे जा रही है न पीछे.. अभी दो बजने वाले थे रात के। कोहरा बढ़ते ही जा रहा था...बाइक का इलाज शुरू किया गया.. बीमारी समझ में नहीं आ रहा था... न आगे जाए न पीछे...पंद्रह मिनट बाद नवीन जी को फोन किये..." sir..bike bich road per kharab ho gai...kya baat kar rahe ho...ji sir..ligiye nippu se baat kijiye"&lt;br /&gt;nippu- bhaiya, samjh me aa gaya, chain tut gai... gadi ko wahi sadak pe chhod k tum log chale jao.." लास्ट वाला बयान नवीन सर का था। तभी जिस रास्ते से हम लोग आए थे उसी रास्ते से एक मारुति ओमनी (टैक्सी) वाला आया... दोनों के हाथ देने पर बेचारा रूक गया... उस बेचारे ड्राइवर को दिल्ली जाना था, रास्ता भूल गया था, उसकी जरूरत ये थी ये लोग मुझे रास्ता बता देंगे...बेचारे का एक हाथ नहीं था..लेकिन यहां तो तीन-तीन लोग थे.. साथ में मोटरसाइकिल जो न आगे जाने का नाम ले.. न पीछे, ठेलने पर भी। निप्पू और विवेक टैक्सी में बैठ गये.. और बाइक लादने की जिद करने लगे... बेचारा टैक्सी वाला रात के दो बजे अकेले छटपटा रहा था... हमलोगों की जिद भी जायज थी... परेशान थे भाई.. बहुत देर से... ऊपर से कोई आशंका दिख नहीं रही थी कि यहां से कटे कैसे।&lt;br /&gt;मैंने पहले मुकेश पराशर जी को फोन लगाया.. ये पता करने के लिए कि क्या अमित गुप्ता जी दफ्तर में है..पराशर जी ने फोन नहीं उठाया... मेरा एक दोस्त है प्रभात, न्यूज 24 में.. फिर उसको मिस कॉल दिया..जगा है कि सोया है.. कौन सी शिफ्ट है.. नहीं मालूम था...इसलिए मिस कॉल देकर छोड़ दिया... उसका कॉल तुरंत आ गया... लेकिन रिसीव करने के बजाए मेरे हाथ से कट गया.. मैंने कॉल बैक किया.. बात की मालूम हुआ उसकी नाइट शिफ्ट है और वो दफ्तर में है...तब तक इधर निप्पू और विवेक टैक्सी वाले को छोड़ने को तैयार नहीं है... दोनों उसी टैक्सी में जाकर बैठे हैं... बाइक के लिए जगह बना रहे थे दोनों... प्रभात से बात करने के बाद फिर मैंने दोनों को कहा कि टैक्सी वाले को जाने दो.. और गाड़ी को किसी तरह से ठेल-ठाल के न्यूज 24 के दफ्तर के पास ले चलो। (निप्पू और विवेक को नहीं मालूम चल पा रहा था कि हम लोग फंसे कहां हैं... ये बात मैं नहीं जान रहा था... मुझे मालूम था कि हमलोग फिल्म सिटी के मेन गेट पर फंसे हुए हैं...)टैक्सी वाला चला गया.. जाना था दिल्ली बेचारा कहां गया पता नहीं... निप्पू और विवेक के जान में जान आई कि वो लोग फिल्म सिटी के पास फंसे हैं.. खैर दोनों ठेल-ठाल के बाइक को फिल्म सिटी ले गये...चेन अंदर फंसने के चलते आवाज... कल्पना कर लीजिए... बताएंगे तो बोर हो जाइएगा... दफ्तर से प्रभात नीचे आया... बाइक पार्क की गई...सुबह वापस ले जाने का आश्वासन देकर... अंदर-अंदर हमलोग आईबीएन की तरफ पहुंच गये... यहां और कन्फ्यूजन.. कोहरे के चलते जाना किधर है... पते न चले... पास में एक ड्रॉपिंग की गाड़ी थी... विवेक ने जाकर बात की...बुजुर्ग आदमी थे...अपना दुखड़ा सुनाने लगे... लेकिन फिर बोले कि मेन रोड पर छोड़ देता हूं... हमलोग बैठे और&lt;br /&gt;फिल्म सिटी के दूसरे वाले गेट पर पहुंच गये... यहां से हमलोगों को अट्टा पहुंचना था... चलने लगे...रास्ते में लिफ्ट मांगने की कोशिश करते रहे... निप्पू और विवेक...बीच पुल पर जो फिल्म सिटी और अट्टा के बीच है, फ्लाइओवर से पहले, एक कार रुकी, चौबीस-पच्चीस साल का लड़का चला रहा था. पिकअप-ड्रॉपिंग का मामला था...तीनों बैठ गये.. इससे पहले कि वो कहे जा रहा था कि मैं तो रजनीगंधा जाऊंगा... फाइनली वो रजनीगंधा के रास्ते नहीं मुड़ा... अट्टा की तरफ बढ़ते- बढ़ते नीचे से होते हुए बढ़ने लगा... सेक्टर 27 के सामने पूछा कि, कहां जाओगे...57 के थाने... हमलोगों ने बताया नहीं-58 के थाने...कार के ड्राइवर से बातचीत में मालूम चला कि वो पास के गांव का ही रहने वाला है... अभी तीन नहीं बजे थे...जैसे जैसे कार बढ़ रही थी रफ्तार कम होती जा रही थी... कोहरा इतना बढ गया था कि कुछ नहीं दिख रहा था...शॉप्रिक्स के कट से हमलोगों को मुड़ना था... ड्राइवर को समझ में नहीं आ रहा था... उसका वश चलता तो चार कट पहले ही मुड़ जाता.... जैसे तैसे शॉप्रिक्स के कट के पास पहुंचे तो उसने कार रोक दी...कहा रिक्शे वाले को जैकेट दूंगा अपना... हम तीनों में से किसी ने रिक्शे वाले को देखा नहीं था... कार से ड्राइवर उतर गया... बगल में खड़ा हो गया... हम तीनों कार में...भाई ये क्या माजरा है.. समझ में किसी को नहीं आ रहा था...तभी पीछे एक रिक्शावाला दिखा... पास आने पर ड्राइवर ने अपनी जैकेट उसे दे दी...न रिक्शेवाले को समझ में आया और ना ही हम लोगों को। फाइनली हमलोग अगले तीन-चार मिनट में सेक्टर 58 के थाने पहुंच गये...कार वाले को धन्यवाद किया... निप्पू ने कुछ पैसे दिए...लेने के बाद उसने कहा... दोस्त ये अच्छा नहीं किया...खैर फिर किसी तरह उसे समझाकर वापस भेज दिया।&lt;br /&gt;हम तीनों वहीं कॉफी वाले के पास उतरे, सुबह के तीन बजने वाले थे। पिछले दो तीन घंटों को याद कर करके भगवान का शुक्रिया जता रहे थे। निप्पू ने कहा कि ये कार वाला वहां हमलोगों के लिए भगवान बनकर आया था... नहीं तो इस कोहरे में कहां टपला खा रहे होते पता भी नहीं चलता....निप्पू की बात में सच्चाई थी...वैसे एक बात और अगर फिल्म सिटी की जगह डीएनडी या फिर बीच में कहीं और बाइक का माचो हुआ होता तो क्या होता?&lt;br /&gt;उस रात की ये तो एक कहानी है जिसमें हम तीनों किरदार थे.. एक और कहानी ठीक उसी रात और उसी वक्त की है... उसमें अभिनित और रश्मि के साथ साथ नवीन सर और रवींद्र जी भी भूमिका निभा रहे थे...इस कहानी को जानने के लिए&lt;br /&gt;ब्लॉग बदलना पड़ेगा...दूसरी वाली कहानी भी पहली वाली कहानी से कम नहीं है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-5184054670159932769?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/5184054670159932769/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=5184054670159932769' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/5184054670159932769'/><link rel='self' type='application/atom+xml' 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में विभाजन के संकेत मिल रहे हैं। दो जिस्म और एक जान कहे जाने वाले नीतीश और ललन सिंह के बीच इन दिनों पटरी नहीं बैठ रही। बिहार से जो खबरें आ रही हैं उसके मुताबिक ललन सिंह और नीतीश कुमार के बीच&lt;br /&gt;इन दिनों छत्तीस का रिश्ता बन गया है। दोनों में बातें भी नहीं हो रही है। नीतीश जहां जहां सभा करने जा रहे हैं वहां प्रदेश अध्यक्ष ललन सिंह साथ नहीं जा रहे... जा भी रहे हैं तो नीतीश के आने से पहले ही वहां से निकल जा रहे हैं.. दोनों नेता&lt;br /&gt;एक-दूसरे के आमने-सामने नहीं आ रहे। खबर तो ये भी है कि ललन सिंह अपने खेमे के साथ कांग्रेस का दामन थाम सकते हैं... पिछले साल हुए विधानसभा उपचुनाव के बाद पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते तीन सांसदों को जेडीयू ने निकाल दिया था। इन तीनों सांसदों के साथ बाइस सांसदों वाली इस पार्टी के एक दर्जन सांसद अभी नीतीश के खिलाफ खड़े हैं..सूत्र बताते हैं कि विद्रोही एक दर्जन सांसद इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस का दामन थाम सकते हैं... सूत्रों के मुताबिक ललन सिंह की राहुल गांधी के साथ कई दौर की बातचीत हो चुकी है। ललन सिंह की राजनीतिक पहचान नीतीश कुमार के साथ आने के चलते हुई थी। जेडीयू में ललन सिंह के विकल्प के रूप में भूमिहार नेता की तलाश भी तेज हो गई है।&lt;br /&gt;जहानाबाद के पूर्व सांसद अरुण कुमार को जेडीयू में लाने की मुहिम चल रही है। अरुण कुमार अभी नीतिगत रूप से लोजपा में हैं.. अरुण कुमार पहले भी जेडीयू में रह चुके हैं... जहानाबाद के पूर्व सांसद अरुण कुमार बिहार युवा समता (अब जेडीयू) के अध्यक्ष रह चुके हैं...हाल के दिनों में नीतीश के पुराने सेनापती उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी में वापसी भी हुई है... कहा जा रहा है कि उपेंद्र कुशवाहा की वापसी ललन सिंह की मर्जी के खिलाफ हुई है...महाराजगंज के पूर्व सांसद प्रभुनाथ सिंह भी&lt;br /&gt;खुलकर नीतीश के खिलाफ में खड़े हैं...एक बात यहां साफ करना जरूरी होगा कि ये खबर पार्टी के कुछ नेताओं से हुई बातचीत के आधार पर लिखी जा रही है। इस खबर पर नीतीश कुमार या फिर ललन सिंह की कोई प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है। अगर इस खबर में सच्चाई है तो आने वाले कुछ दिनों के लिए बिहार की राजनीति में खासी सरगर्मी रहेगी। हमें भी इस खबर की पुष्टि का इंतजार है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-6438358139111657304?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/6438358139111657304/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=6438358139111657304' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/6438358139111657304'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/6438358139111657304'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2010/01/blog-post_13.html' title='खबर पक्की है...?'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-8901558395444593284</id><published>2009-12-23T15:08:00.000+05:30</published><updated>2009-12-23T15:38:00.231+05:30</updated><title type='text'>मैच में मारपीट</title><content type='html'>मैच में मजा आ रहा था.. विपक्षी टीम के खिलाफ हमारे खिलाड़ियों ने अच्छा खासा स्कोर खड़ा किया था। पिछला मैच हमलोग हार चुके थे.. इसबार जीत के प्रति निश्चिंत थे, फिर भी तनाव था। थोड़ी देर पहले दो महिलाएं(मजदूर)मैदान पर मिट्टी डाल रही थी, (घास जमाने का काम चल रहा था) जिस पिच पर खेल चल रहा था उसी पिच पर घास डालने आ पहुंचीं दोनों...लोगों ने मना किया.. हां-ना करते करते मान गई। मैच चल रहा था। तभी फिल्डिंग करते वक्त एक गेंद मैच देख रहे शख्स को लगी। बेचारे की हालत खराब हो गई.. जोर से गेंद लगी थी.. लेकिन यहां तो मामला मैच में जीत को लेकर ज्यादा उत्सुकता से भरा था, फिर किसको चोट लगी और कौन घायल हुआ.. इसकी चिंता किसको थी। खैर... नहीं मालूम था हमलोगों को कि जिसे चोट लगी है वो कौन है। तभी वो दोनों महिलाएं एक बार फिर से मिट्टी लेकर पिच की तरफ बढ़ी चली आ रही थी। जिस बेचारे को गेंद से चोट लगी थी, दुखी था, गुस्से में भी..उसने महिलाओं से कहा- यहीं पिच पर मिट्टी डालो...जहां मिट्टी डालने को लेकर बहस चल रही थी, वहीं निप्पू फिल्डिंग कर रहा था। महिलाओं ने मिट्टी डालकर खेल में खलल डाल दिया। तभी.. निप्पू ने उस शख्स को एक थप्प़ड़ लगा दिया जिसको कुछ देर पहले गेंद से चोट लगी थी। बेचारा चोट लगने की घटना को सीरियसली लेकर चल रहा था। कहा सुनी तेज हो गई... मामला बिगड़ने लगा...बैट, विकेट सब उखड़ गया। सब लोग वहां पहुंच गये... वो दोनों महिलाएं जो बवाल की मुख्य किरदार थीं...एक की उम्र 70 से ऊपर की रही होगी जबकि दूसरे की 45-50 के आसपास...दोनों क्या कुछ बोल रही थी.. हमलोग नहीं समझ रहे थे, इतना जरूर था कि हमलोगों के बारे में कुछ गलत-सलत बोल रही है... लेकिन स्थानीय बोली के जानकार विमल जी को उनकी बातें समझ में आ रही थी.. दोनों महिलाएं गालियां दे रही थी (लोकल)...विमल ने भी महिलाओं को जवाब देकर वहां से हटाने की कोशिश की..लेकिन दोनों मानने वाली नहीं थी। मामले की गंभीरता को समझते हुए दर्जनों की संख्या में काम कर रही महिला मजदूर मौके पर पहुंच गई। तब तक 'बेचारा' दो तीन थप्पड़ खा चुका था। मुकेश जी भी बैट लेकर पहुंच गये। मैच का मजा किरकिरा हो रहा था। जैसे तैसे करके उनलोगों को वहां से हटाया गया। जो मार खाया था उसका घर वहीं पास में था.. महिलाओं की 'गिरोह' के साथ ठेकेदार से शिकायत करने चला गया। हमलोग फिर से मैच खेलने लगे। तय दस ओवर में विपक्षी टीम को हार का सामना करना पड़ा। टीम जीत गई। हमलोग घर लौटे। लेकिन मैच में मारपीट के चलते मजा किरकिरा हो गया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-8901558395444593284?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/8901558395444593284/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=8901558395444593284' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/8901558395444593284'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/8901558395444593284'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2009/12/blog-post_23.html' title='मैच में मारपीट'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-5606317787979798828</id><published>2009-12-02T05:41:00.000+05:30</published><updated>2009-12-02T06:29:43.045+05:30</updated><title type='text'>गजब हैं सर!</title><content type='html'>निखिल जी गजब के आदमी हैं। उस वक्त भी मेरी नाइट शिफ्ट ही थी, मई-जून का महीना था साल दो हजार छे में। निखिल सर ने ज्वाइन ही किया था। एसोसिएट प्रोड्यूसर थे तब। मैं चैनल में उनसे पांच-सात महीना सीनियर था वैसे था ट्रेनी ही। हम दोनों की जब जान पहचान हुई तो उसके अगले दिन से ही हम लोग एक दूसरे से इतने घुल मिल गये कि लगा ही नहीं कि हम लोगों की कल ही मुलाकात हुई है। प्योर देसी अंदाज में हमलोगों ने मुंबई के न्यूज रूम का माहौल बदल दिया। मैं उस समय वाशी में रहता था, निखिल सर हीरानंदानी में। रात में हमलोग एक ही गाड़ी से दफ्तर आते थे। उनके काम करने का अंदाज उनके वीओ का अंदाज.... आप तुलना नहीं कर सकते। जुलाई में हमलोग मुंबई से दिल्ली आ गए। सबसे पहले अपनी शिफ्ट में मैं आया, फिर बाकी लोग। अरुण सर के नेतृत्व में हमलोगों ने काम करना शुरू किया, डीएलएफ से सुबह का बुलेटिन लॉन्च हुआ। करीब सवा महीने तक हमलोगों ने कोई ऑफ नहीं लिया। उसी दौरान नवीन सर भी नाइट की शिफ्ट में आ गए थे।  डीएलएफ में निखिल सर को सुबह साढ़े सात का प्रोग्राम मिला। आधे घंटे की बड़ी खबर। यकीन नहीं करेंगे। पांच बजे खबर तय होती थी, साढ़े सात में छे-सात पैकेज कटकर लगे होते थे। कुछ खबरों का वीओ तो निखिल सर बिना कॉपी के ही मुजबानी कर दिया करते थे। जबकि उस वक्त सात बजे 30-30 चला करता था। इसके बाद दफ्तर फिर नोएडा में आया। मार्च 2007 में मैं सुबह की शिफ्ट में आ गया निखिल सर कुछ दिनों के लिए रात में ही रुके। इसके बाद साथ-साथ काम करने का बहुत कम ही मौका मिला। एक बार नवरात्रि के दौरान हमदोनों कुछ दिनों के लिए सुबह की शिफ्ट में साथ थे। एक वॉकथ्रू को लेकर विवाद हो गया... ध्यान ही नहीं रहा...कि हमलोगों के बीच गर्मागर्मी तक हो गई। बाद में मैंने माफी मांगी, लेकिन उन्होंने अरुण सर से बोलकर अपनी शिफ्ट बदलवा ली,  मुझे बड़ी शर्मिंदगी महसूस हुई.....खैर कुछ हो नहीं सकता था। इसके बाद बहुत दिनों तक हमलोगों ने साथ में काम नहीं किया। नवंबर 2008-दिसंबर 2008 में एक बार फिर मुझे एक शिफ्ट में काम करने का मौका मिला। दो महीने के लिए शाम की शिफ्ट में काम करने गया था। (4 साल में 2 महीने), बड़ा अच्छा लगता है जब आप अपने ऊपर के अधिकारी के करीबी होते हैं। कभी-कभी कुछ खबरों पर काम करने की मेरी इच्छा नहीं होती तो पहले ही पूछ लेते किस खबर पर काम करना है। अच्छा लगता आप अपने हिसाब से काम करते हो। दो महीने बाद मैं नाइट में चला गया। तीन महीने की नाइट शिफ्ट हो चुकी थी अब।&lt;br /&gt;जब कई दिनों तक हमलोग नहीं मिलते तो वो रात में दफ्तर मेरे आने का इंतजार करते साथ में और साथियों को भी रोके रहते। फिर मैं भी जल्दी पहुंचता और सब लोगों के साथ करीब आधे घंटे-एक घंटे लंबी चर्चा होती। जनवरी2009 से मार्च 2009 तक मैं नाइट शिफ्ट में रहा। अप्रैल में सुबह की शिफ्ट में आया। चुनाव का वक्त था। शाम को शिफ्ट खत्म करने के बाद मैं देर तक रुकता और फिर हमलोग 7-7.30 बजे चाय पीते और मैं निकलता और बाकी लोग अपने काम में लग जाते। तीन महीने बाद निखिल जी की नाइट लगी। सुबह हमलोगों की मुलाकात होती, खबरों पर चर्चा होती, लेकिन ज्यादा देर तक वो नहीं रुकते। जब वो शाम की शिफ्ट में आए तो मेरी नाइट फिर से लग गई। मुलाकात के लिए वो देर तक रुकते और मैं जल्दी आता। घर जाने का कभी कभी तो मौका मिलता है। निखिल जी के साथ जिसने भी काम किया उनकी शिफ्ट में उसका वो हमेशा ख्याल रखते। सत्येश हो तब या फिर गोकर्ऩ जी। हाल में शीतल मणि और विनयश्री, अमित भी उनके साथ नाइट की टीम में थे। इन लोगों के ऊपर भरोसा करके उन्होंने पूरी जिम्मेदारी दे रखी थी। अभिनित, रश्मि, यश, विवेक और निप्पू की बात ही छोड़ दीजिए। विवेक और अमित भाटिया जब चैनल में पहले दिन आए थे तो सबसे पहला परिचय ही आउटपुट में निखिल सर से हुआ था। अब जब निखिल सर ने चैनल को अलविदा कह दिया, ये लोग कैसे रह पाएंगे, और कैसे काम कर पाएंगे... बेहतर यही बताएंगे। गाली देना उन्होंने इधर शुरू किया है। पहले वो गाली नहीं देते थे, चिल्लाते भी नहीं थे। समय के साथ का बदलाव है ये। कुछ लोगों को गाली देकर ही उन्होंने इंडस्ट्री में काम का तरीका बताया। इस कला को भी पसंद करते हैं लोग। एक चेले ने तो जात-पात करने का भी आरोप लगा दिया। लेकिन ऐसा बिल्कुल ही नहीं है। वैसे सिर्फ यही लोग कमजोर नहीं हुए हैं। मैं तो ये समझता हूं कि निखिल जी के जाने से अरुण सर को भी व्यक्तिगत रूप से घाटा हुआ है। निखिल सर जैसे लोग सफर में बहुत कम मिलते हैं। पहले तो टाइम टेबुल की जानकारी होती थी, किस दिन छ्टुटी है, कब घर पे हैं। अब तो पता भी नहीं चलेगा। फोन करना पड़ेगा। हो सकता है कभी कहे कि अभी उपभोक्ता व्यस्त है... कभी फोन उठाए तो हो सकता हो कुछ कर रहे हो... खैर....कई लोग आए और गए लेकिन आपका जाना बहुतों पर भारी पड़ रहा है। इस उम्मीद के साथ अब उठ रहा हूं कि स्टार न्यूज तो बस एक पड़ाव था....आगे फिर मौका मिलेगा तो साथ काम करेंगे, लेकिन सब लोग शायद तब भी साथ नहीं होंगे। अंत में यही कहूंगा कि निखिल सर जैसे लोग बहुत कम मिलते हैं। लेकिन उनका फैसला कहीं से भी उचित नहीं है। और उससे भी बड़ा उन लोगों का फैसला गलत रहा जिन्होंने उनको जाने की इजाजत दी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5809507917256078763-5606317787979798828?l=samajwad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajwad.blogspot.com/feeds/5606317787979798828/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5809507917256078763&amp;postID=5606317787979798828' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/5606317787979798828'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5809507917256078763/posts/default/5606317787979798828'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajwad.blogspot.com/2009/12/blog-post_01.html' title='गजब हैं सर!'/><author><name>MANOJ KUMAR</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06189235990385042561</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-EsnOIhQ2r_g/TgSlcZ4yWGI/AAAAAAAAAEo/Kk5XST_VFGs/s220/264875_242509212427083_100000040172378_1101847_8172215_n.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5809507917256078763.post-5254948303828450366</id><published>2009-12-02T05:14:00.000+05:30</published><updated>2009-12-02T05:40:26.679+05:30</updated><title type='text'>काश! मैं दिन की शिफ्ट में होता....</title><content type='html'>दो महीने की नाइट शिफ्ट इस बार खत्म हो चुकी है। अभी एक महीने बचे हैं। लेकिन इस वक्त कोसने के अलावा कुछ नहीं कर सकता। अगर नाइट की शिफ्ट नहीं होती और मैं दिन की शिफ्ट में होता तो&lt;br /&gt;शायद निखिल सर को नहीं जाने देता। शुक्रवार की रात यश ने फोन किया, मैं सोया हुआ था, बताया कि&lt;br /&gt;एक गड़बड़ हो गई है सो निखिल सर ऑफिस छोड़कर घर चले गये हैं, शाम को कुछ विवाद हुआ था।&lt;br /&gt;मैंने निखिल सर को फोन किया,  लंबी बातचीत हुई...लेकिन सर अड़े हुए थे। रात में ऑफिस गया काम निपटाने के बाद सुबह सीधा उनके घर चला गया। करीब दो-तीन घंटे तक साथ रहे, बातचीत हुई, इस बीच दफ्तर से कई लोगों के फोन भी उनके मोबाइल पर आते रहे, बातचीत चलती रही। अंत में सहमति बन चुकी थी। मैं घर आ गया। रात में कोई बात नहीं हुई। रविवार की सुबह नवीन सर को फोन किया... नवीन सर उनके घर पर थे। उन्होंने बताया कि सब सामान्य हो चुका है। सोमवार यानी कल से मामला ठीक हो जाएगा। मैं तो निश्चिंत हो ही गया था, बाकी मित्रों को भी निश्चिंत कर दिया। सोमवार की सुबह करीब एक घंटे तक दफ्तर के बाहर हमलोगों ने बात की। नवीन सर, निखिल सर, यश तीनों ऑफिस में घुसे, हमलोग अपने घर चल दिये। सबको यकीन हो गया था कि मामला निपट गया है। अब सब ठीक है। रात में सोकर ,उठा तैयार हुआ, भूख लगी थी लेकिन घर में खाने का इंतजाम नहीं था।&lt;br /&gt;सोचा ऑफिस जाकर खाऊंगा। जल्दी ऑफिस निकल गया था। जैसे ही स्कूटर से अंदर घुसा सामने अभिनित और प्रवीण जी मिल गये। मुझे किसी तरह की कोई आशंका नहीं थी, सिर्फ भूख लगी थी इसलिए थोड़ी चिंता थी, कि कैंटीन जाकर कुछ खा लूं, लेकिन प्रवीण जी ने चर्चा शुरू कर दी। मैं अब अनमने तरीके से सुन रहा था, क्योंकि ताजा सच्चाई से मैं अवगत नहीं था। अंत में उन्होंने कहा....&lt;br /&gt; "और इन लोगों ने इस्तीफा उनका मंजूर भी कर लिया.." मैं सुनकर अवाक रह गया, कुछ बोल नहीं पाया। फिर मैंने पूरी जानकारी उनसे ली। भूख तो खत्म हो चुकी थी। अभिनित ने बताया कि अब कोई गुंजाइश नहीं है। अंदर ऑफिस में 
